नीतिवचन 24:14

इसी रीति बुद्धि से प्राप्त ज्ञान तेरे प्राण को वैसा ही मीठा लगेगा; यदि तू उसे पा जाए तो अन्त में उसका फल भी मिलेगा, और तेरी आशा न टूटेगी।

केवल कुछ ही चीज़ें निश्चित और अटल हैं – बुद्धि का फल उनमें से एक है। यदि आप अपने जीवन में होनेवाली बातों से निराश हैं, तो बुद्धि का पीछा करें। यदि आपको संदेह है कि क्या बुद्धि इस योग्य है कि उसे पाने के लिए इतना परिश्रम किया जाना चाहिए, तो आप गलत हैं। जब आप बुद्धि प्राप्त करते हैं, तो आपके पास एक ऐसा खजाना होता है जो आपके प्राण को मीठा लगेगा और फल भी मिलेगा। इससे आपको जो लाभ प्राप्त होगा उसे कोई नहीं रोक सकता। बुद्धि को प्राप्त करें!

क्रिया-विशेषण ‘इसी रीति’ नीतिवचन 24:13 के सन्दर्भ में प्रयुक्त हुआ है, उसमें लिखा हैं, “हे मेरे पुत्र, तू मधु खा, क्योंकि वह अच्छा है, और मधु का छत्ता भी, क्योंकि वह तेरे मुँह में मीठा लगेगा।” सुलैमान ने मधु और बुद्धि की तुलना करने के लिए एक रूपक का उपयोग किया। मधु पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है (नीतिवचन 16:24; 1 शमू 14:27)। बुद्धि से प्राप्त ज्ञान प्राण के लिए उतना ही सुखद और लाभदायक है, जितना कि मधु शरीर के लिए अच्छा और मीठा होता है।

मधु का यह रूपक बाइबल पर इसलिए लागू होता है, क्योंकि मधु की श्रेष्ठता और मिठास उस आनन्द और सुख के लिए एक उचित उपमा है जो परमेश्वर का वचन प्राण को देता है (भजन 19:10; 119:103)। अपने प्राण में परमेश्वर को जानने की तुलना स्वादिष्ट और समृद्ध चर्बी और चिकने भोजन से भी की गई है, जो एक स्वादिष्ट व्यंजन है (भजन 63:5-6)। ख्रिश्चन पाठक, क्या आप अनुभव से इन तुलनाओं को समझ पा रहे हैं?

बुद्धि मूंगे से अधिक अनमोल है (नीतिवचन 3:15; 8:11; 20:15; अय्यूब 28:18)। बुद्धि से प्राप्त ज्ञान सोने या चाँदी से अधिक अनमोल है (नीतिवचन 3:14; 8:10,19; 16:16; अय्यूब 28:14-19; भजन 119:72)। आप इस दुनिया की जिस किसी भी चीज़ को पाना चाहते हैं, बुद्धि उन सब चीजों से कहीं अधिक अनमोल है (नीतिवचन 3:15; 4:7; 8:11)। यदि किसी मूर्ख ने ये तुलनाएँ की होतीं, तो आप उसकी अज्ञानता के कारण उसकी राय को तुच्छ समझकर दुत्कार देते, लेकिन ये तुलनाएं सबसे बुद्धिमान राजा सुलैमान ने कीं हैं।

चूँकि बुद्धि प्राण के लिए इतनी महत्वपूर्ण और मूल्यवान है, इसलिए उसे खोजने और प्राप्त करने के आपका परिश्रम भी कितना अधिक कड़ा होना चाहिए? क्या आपने इसकी नींव, अर्थात् यहोवा का भय मानना, को अपनी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा बनाई है (नीतिवचन 1:7; 9:10)? क्योंकि परमेश्वर का वचन ही हमें बुद्धि दे सकता है तो क्या आप प्रतिदिन उसे पढ़ते हैं (भजन 19:7; 119:130)? क्या आपने ऐसे शिक्षकों की तलाश की है जो बुद्धिमान बनने में आपकी सहायता कर सकें (प्रेरितों 8:30-31)?

परमेश्वर हमें बुद्धि और उससे प्राप्त होनेवाला ज्ञान मुफ़्त में और बड़ी उदारता से देना चाहता है (नीतिवचन 8:1-5; 9:1-6)। अपनी इस इच्छा को वह अपनी रचाई हुई सृष्टि, अपने करुणामय प्रयोजन और उसने जो विवेक दिया है, उसके माध्यम से प्रकट करता है (नीतिवचन 20:27; रोमियों 1:20-22; 2:15; प्रेरितों 14:17)। परन्तु वह इसे किसी पर थोपता नहीं है। आपको परिश्रम करना होगा और उसकी खोज इस रीति के कठोर परिश्रम और जोशीले समर्पण के साथ करनी होगी जिस रीति से छिपे हुए खज़ाने की खोज की जाती है (नीतिवचन 2:1-9; 18:1)।

बुद्धि से प्राप्त ज्ञान उन लोगों के लिए बड़ा फल है जो उसका व्यावहारिक उपयोग करते हैं, लेकिन उनके लिए नहीं जो उसे दूर से केवल देखते हैं, या सुनते हैं (भजन 19:11; लूका 8:18; याकूब 1:21-25)। पृथ्वी की सारी वस्तुएँ निराशाजनक हैं, परन्तु बुद्धि तुम्हें कभी निराश नहीं करेगी। बुद्धि का फल निश्चित और अटक है, और आपकी सफलता और समृद्धि की आशा पूरी होगी (यहोशू 1:7-8; भजन 1:1-3)।

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