नीतिवचन 22:6

लड़के को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिसमें उसको चलना चाहिए, और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा।

बच्चों को शिक्षा देना सफ़ल होता है। आप अपने बच्चों को परमेश्वर और मनुष्यों की दृष्टि में महान बना सकते हैं। यदि आप उन्हें प्रशिक्षित नहीं करते हैं, तो आपके लिए बेऔलाद होना बेहतर होता। जिन बच्चों को प्रशिक्षित नहीं किया जाता है तो वे जिस मूर्खता और पापी स्वभाव के साथ वे पैदा हुए थे, वे उसी को अपनाकर अपना जीवन-निर्माण करेंगे, जो ज़िन्दगीभर के लिए उनके दर्द और परेशानी का कारण बनता है।

बच्चों को शिक्षा देना सफ़ल होता है। लेकिन अवश्य है कि आप यह फैसला समय रहते ही कर लें। इस के लिए बुद्धि का उपयोग और कठोर परिश्रम ज़रूरी होता है। इसके लिए नीतिवचन की इस पुस्तक में पाई जानेवाली परमेश्वर और सुलैमान की शिक्षाओं को अपनाना आवश्यकता होता है। इसपर तुरन्त अमल किया जाना आवश्यकता होता है, इसलिए आपके बच्चों को जिस भी शिक्षा की आवश्यकता हो, उसमें विलंब न करें।

जिस भी बच्चे को उचित रूप से प्रशिक्षित किया जाता है वह परमेश्वर का भय मानेगा और बड़ा हो जाने पर बुद्धिमानी और धार्मिकता का जीवन जीएगा। जिस भी बच्चे को उचित रूप से प्रशिक्षित नहीं किया जाता है वह न तो परमेश्वर का भय मानेगा और न ही बड़ा हो जाने पर बुद्धिमानी और धार्मिकता का जीवन जीएगा। केवल अनुग्रह का चमत्कार ही अप्रशिक्षित बच्चे को सुधार सकता है, परन्तु परमेश्वर ने ऐसा कोई वादा नहीं किया है। इस नीतिवचन में परमेश्वर ने जो वादा किया है उस पर सवाल मत उठाइये। जिन अपवादों की मिसालें आपने देखी है उनसे यह नियम बदल नहीं जाता। इस पर विश्वास करें, और अमल करें।

यहां कोई रहस्य या पहेली नहीं है। लापरवाह और ढीले माता-पिता अपने बच्चों को प्रशिक्षित करने के लिए बाहरी विशेष तरीकों की ताक में रहते हैं। वे हमेशा चिंता करते रहते हैं, बच्चों की परवरिश पर किताबें खरीदते और पढ़ते हैं, और सेमिनारों में भाग लेते हैं, लेकिन वे शायद ही कभी अपने बच्चों को प्रशिक्षित कर पाते हैं। तकनीक की तुलना में हरकत में आना कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है। भावनिक आवेग की तुलना में अथक प्रयास कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आसान या बेहतर तरीकें ढूंढना बंद करें। शिक्षा में व्यस्त हो जाएँ।

यह नीतिवचन एक आदेश है, सुझाव नहीं। यह एक प्रतिज्ञा है, संभावना नहीं। जो माता-पिता बाइबल की बातों पर विश्वास करते हैं, वे इस नियम पर उतना ही भरोसा करते हैं जितना किसी अन्य वचन पर। वे अपनी ज़िम्मेदारी से भयभीत नहीं होते। वे परमेश्वर के अनमोल धर्मशास्त्र पर भरोसा करते हैं, और वे आज से ही इस काम में लग जाते हैं। वे जानते हैं कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर और राजा सुलैमान अन्य सभी की तुलना में बच्चों की शिक्षा के बारे में अधिक जानते हैं। दुनिया के विशेषज्ञ क्या सोचते हैं इसकी उन्हें कोई परवाह नहीं थी।

सुलैमान ने कहा, “शिक्षा दे ।” उसने “उन्हें बड़ा करो” नहीं कहा। आप सब्जियों को बड़ा करते हैं, लेकिन जब बच्चों की बात आती है, आप उन्हें शिक्षा देते हैं। बच्चे को पौष्टिक भोजन खिलाना, गर्म कपड़े देना, उसे अपना खुद का बेडरूम देना और उसे गुड-नाईट पप्पी देना शिक्षा नहीं है। जानवरों की लगभग हर प्रजाति अपने बछड़ों के साथ भी ऐसा ही करती है। बच्चे को शिक्षा देना या प्रशिक्षित करने का अर्थ है उसे परमेश्वर के भय में और पवित्रशास्त्र के ज्ञान में एक ऐसा चरित्रवान और बुद्धिमान व्यक्ति बनाना तो चिरस्थायी हो, और यह सुनियोजित तरीके से दी जानेवाली शिक्षा और अनुशासन है।

आप उन्हें “ऊपर” आने की शिक्षा देते हैं। इसमें जन्म से लेकर परिपक्वता तक की अवधि का समय निहित है। शिक्षा को समय रहते बाल-अवस्था से ही शुरू किया जाता है, क्योंकि शिशुओं को खाने-पीने की नियमावली सिखायी जा सकती है और उनके हर बार और हर चीज के लिए रोने की ओर तुरंत ध्यान नहीं दिया जाता है। यह नियंत्रण चरण की ओर से शिक्षा के चरण की ओर बढ़ना है और फिर परामर्श चरण की ओर आगे बढ़ना है। यह एक ऐसा चरण है जो युवावस्था और अगले चरण की नयी बातों की शिक्षा से होते हुए जारी रहता है। यह परिपक्वता तक जारी रहता है, जब एक जवान युवा पुरुष अपना खुद का नया परिवार बनाता है और बच्चों को शिक्षा देने की प्रक्रिया को आगे बढाने फिर से शुरू करता है।

आप उन्हें ” उसी मार्ग की” देते हैं। माता-पिता हर कदम की की शिक्षा नहीं दे सकते, लेकिन वे मार्ग की शिक्षा दे सकते हैं (उत्पत्ति 18:19)। जब परमेश्वर माता-पिता को बच्चे देता है, उस समय उनका दिमाग खाली अवस्था में होता है। आप उस दिम्माग को परमेश्वर के ज्ञान और बुद्धि से भर देते हैं। क्योंकि धर्मग्रंथ आपके जीवन के हर कदम को निर्देशित नहीं करता है, और व्यक्तिगत को लागू करता है, इसलिए आप उन्हें धार्मिकता के मार्ग की शिक्षा देते हैं।

उन्हें “उसी मार्ग की शिक्षा” देनी है जिसमें उन्हें “चलना चाहिए।” यह उस मार्ग की शिक्षा नहीं हो सकती जिस पर वे चलना चाहते हैं। आदम में जन्म एक एक बच्चा मूर्खता और पाप का दोषी होता है। उसे उस जन्मजात प्रवृत्ति के विरुद्ध शिक्षा दिए बिना, वे और भी समर्पित और कठोर पापी बन जायेंगे। कोई भी शिक्षा जन्मजात शिक्षा नहीं होती है – आपका बच्चा एक मूर्ख बच्चा है (नीतिवचन 29:15)। जिस मार्ग पर उन्हें चलना चाहिए वह धार्मिकता का मार्ग है जिसका नक्शा पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से दिया गया है (व्यवस्थाविवरण 6:4-9; 29:29; इफि 6:4)। यह वह मार्ग नहीं होना चाहिए जिसपर यह दुनिया उन्हें चलाना चाहती है, क्योंकि उनका मार्ग शैतान का मार्ग है (इफि 2:1-3)।

जब वे “बूढ़े” हो जाएंगे, तो वे उसी शिक्षा का पालन करेंगे। यहां विश्वास करने योग्य एक वादा है, लेकिन उनके “बूढ़े” होने से पहले इस मार्गे में बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था के वर्षों के दौरान उन्हें कई संभावित कठिनाइयों का भी सामना करना होगा। अगर एक बच्चे को बाल-अवस्था से ही उचित रूप से शिक्षा मिल जाए, तो उसे किशोरावस्था में शिक्षा को ग्रहण करने में कोई भी कठिनाई नहीं होगी। शिक्षा यदि लगातार दी जाए, तो वे एक वयस्क हो जाने पर अपनी शिक्षा की ओर वापस लौट आएंगे। इस पर विश्वास करो। उस पर भरोसा करो।

बच्चे को शिक्षा देना क्या है? यह धार्मिक जीवन का एक अखंड जीता-जागता उदाहरण है जिसे बच्चे पहले खुद देखते हैं और फिर बड़े होने पर उस पर चलते हैं। यह परमेश्वर के अस्तित्व और बाइबल के पूर्ण अधिकार की शिक्षा देना है। यह उस पर परमेश्वर की व्यवथा और माता-पिता के अधिकार को सख्ती से और गंभीरता से लागू करना है। यह डाँट और छड़ी से शिक्षा देना है। इसमें दिन भर याद दिला दिलाकर शिक्षा दी जाती है। यह व्यवहार के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के सुदृढीकरण का उपयोग करना है। यह बच्चों के साथ एक बहुत ही खुला रिश्ता है, जो उन्हें आपको जानने और आपसे अच्छी तरह से सीखने में मदद करता है।

बच्चे को शिक्षा देना क्या नहीं है? चिल्लाना बच्चों को शिक्षा देना नहीं है। उन्हें किसी ख्रिश्चन स्कूल में पढने भेजना बाल-शिक्षा का केवल एक कमज़ोर पहलू है। उन्हें डराना-धमकाना या परेशान करना बच्चों को शिक्षा देना नहीं है। नियमों का उल्लंघन करने पर दण्ड देना बच्चों को शिक्षा देना नहीं है। “टाइम आउट” कहना बच्चे को शिक्षा देना नहीं है। आँगन में उनके साथ खेलना बच्चे को शिक्षा देना नहीं है। बाहर घूमने-फिरने जाना और खिलाना बच्चों को शिक्षा देना नहीं है। माँ को जिम्मेदारी सौंपना बच्चों को शिक्षा देना नहीं है। उन्हें प्यार से झुलाना बच्चों को शिक्षा नहीं है। उन्हें बिना श्रम के इनाम देना बाल शिक्षा नहीं है।

पिछली पीढ़ियाँ खेतों में पशुओं के प्रशिक्षण को देखकर बड़ी हुईं। यदि वे कुछ पशुओं को प्रशिक्षित नहीं करते, तो परिवार या तो भूखा मर जाता या गंभीर रूप से कमज़ोर हो जाता। जब बछड़ों को मारा जाता और खच्चरों को हल चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता था तो उसके बाद बच्चों को प्रशिक्षित करना आसान हो जाता था। यहां कोई रॉकेट विज्ञान नहीं है, और नई या रचनात्मक तकनीकों की खोज इस लक्ष्य को हासिल करने से चूक जाती है। कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा दे सकते हैं, यदि वे अपने स्वार्थ और लापरवाही को त्यागकर शिक्षा देने में व्यस्त हो जाएँ। यह आज के आधुनिक समय की शर्मनाक बात है कि देखने वाली आंखों वाले कुत्तों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, लेकिन बच्चों को नहीं।

इस पीढ़ी के बच्चे एक विपत्ति हैं। ज्यादातर तो अहंकारी, मूर्ख, अज्ञानी, आलसी, नादान, अशुद्ध, विद्रोही, स्वार्थी या फिजूलखर्ची हैं। इस व्यक्तिगत एवं सामाजिक कमोजोरी का एक कारण ज़िम्मेदार है। उनके माता-पिता इतने व्यस्त, स्वार्थी या आलसी थें कि उन्हें शिक्षा देने के लिए उनके पास समय ही नहीं था। नतीजा? मूर्खों की एक पूरी की पूरी पीढ़ी, जो अपने से भी अधिक बदतर मूर्खों को जन्म देगी। आज दुनिया का भविष्य अंधकारमय हो चूका है, राजनेताओं के कारण नहीं, बल्कि मूर्ख माता-पिता के कारण।

धर्मीजन जाग जाए, और खड़े हो जाए! प्रत्येक ख्रिश्चन धर्मी माता-पिता को इस नीतिवचन के सबक को अपनाना चाहिए और काम पर लग जाना चाहिए। धर्मी और बुद्धिमान वंश की पीढ़ी सिर्फ़ एक नीतिवचन के अमल किए जाने तक दूर है (थोड़े नियमित प्रयास से)। उचित और लगातार निवेश करें, और परिणाम के लिए परमेश्वर पर भरोसा रखें (भजन 127:1-2)। वह सिर्फ़ पांच रोटियों और दो मछलियों को बहुगुणित कर सकता है, जिसमें से बची हुई टोकरियों से बहुत से लोगों का पेट भर सके। वह धर्मी बच्चों की पीढ़ी देकर आपके प्रयासों को फल देकर आशीषित कर सकता है, ताकि आपका मन प्रसन्न हो जाए। पराजित होने का कोई कारण नहीं है; ख़ुश होने का हर कारण है। परमेश्वर आपके साथ रहें।

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