नीतिवचन 22:25

कहीं ऐसा न हो कि तू उसकी चाल सीखे, और तेरा प्राण फन्दे में फँस जाए।

पाप संक्रामक है, परन्तु यह कोई सामान्य नैतिक सद्गुण नहीं। आप दूसरों तक अपनी बीमारी फैलाते हैं, परन्तु स्वास्थ्य नहीं फैला सकते। बुरे दोस्तों की बुरी संगत आपको तो बिगाड़ देगी, परन्तु आप शायद ही कभी अपने बुरे दोस्तों को अपनी अच्छाई से बदल पाएंगे। यह बुद्धि और प्रकृति का नियम है। मनुष्य स्वभाव ही से आप ही पाप की ओर प्रवृत्त हो जाता है, परंतु भलाई की ओर आप ही प्रवृत्त हो पाता। पापियों के साथ मित्रता और संगति आपको भी उनकी सी बुरी आदतें सिखाती है और आपके प्राण को फन्दे में फँसा देती है। आप जैसी संगति रखते हैं, खुद भी वैसा ही बनते हैं।

यह नीतिवचन इसके पहले के नीतिवचन के सन्दर्भ में है, जो क्रोधी लोगों के साथ मित्रता रखने और झट से क्रोध करनेवाले लोगों के संग चलने से मना करता है (नीतिवचन 22:24)। क्रोध और रोष मूर्खता की निशानियाँ हैं, जो उन मनुष्यों के दुष्ट चरित्र को प्रकट करती हैं जो अपनी भावनाओं पर क़ाबू नहीं रख सकते (नीतिवचन 14:17; 16:32; सभोपदेशक 7:9; याकूब 1:19-20)। धर्मीजन ऐसे व्यक्तियों से बहुत दूर रहेंगे।

क्रोध और रोष की आग में जलनेवाले लोगों के ज्यादा मित्र नहीं होते हैं। उनसे कोई प्रसन्न नहीं होता, यहां तक कि गैर-मसीही भी उनसे अप्रसन्न रहते हैं। परन्तु मित्रता उन नैतिक बुराईयों को नज़रअंदाज़ कर देती है या माफ़ कर देती है जिन्हें आप कभी तुच्छ समझते थे। जब प्रेम अन्धेपन में किया जाता है तो दूसरों में पनपनेवाला पाप आपके आचरण को भी संक्रमित कर देता है। शुरू में तो आप उसे टालने के बहाने बनाते हैं, फिर ज़रा लापरवाह हो जाते हैं, और जल्द ही उसके साथ घुलने-मिलने लगते हैं, फिर उसे पसंद करने लगते हैं। अब आपका प्राण फँसकर भ्रष्ट होने लगता है और इस नई पापी आदत में अन्दर धँसता जाता है।

बुद्धि में बढ़ते जाने के लिए सुलैमान का एक प्रमुख सबक अधर्मी और दुष्ट लोगों की संगति से बचना है (नीतिवचन 1:10-19; 4:14-17; 9:6; 13:20; 19:27)। नीतिवचन 13:20 पर मेरी शिक्षा देखें। यह नियम सबसे पहले उसे उसके पिता दाऊद ने सिखाया था (भजन 1:1; 26:4-5; 101:3-8; 119:63)। यहां तक कि बड़े चरित्र और सर्वोच्च अधिकार वाले शासकों को भी दुष्ट सलाहकारों के बुरे प्रभाव से बचना चाहिए (नीतिवचन 25:5)।

विवेकशील लोग जीवन भर इसी ज्ञान पर चले हैं। बिना नीतिगत वसूलों वाले मित्र धर्मियों की सत्यनिष्ठा को नष्ट कर देते हैं। उनकी संगत में रहकर विश्वासी लोग भी जीवन के प्रति सांसारिक दृष्टिकोण सीखने लगते हैं, और अपने प्राण को दोस्तों के दबाव में फंसा लेते हैं। इज़राइल ने कनान के सभी मूर्तिपूजक राष्ट्रों को नष्ट नहीं किया, जिसकी उन्हें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी (भजन 106:34-40)।

सुलैमान और उसके बहु-विवाहों पर विचार करें। उसने फिरौन के साथ घनिष्ठ मित्रता स्थापित की और उसकी बेटी से विवाह किया (1 राजा 3:1)। और यद्यपि यह मनुष्य महान बुद्धि से संपन्न था और उसने नीतिवचन की पुस्तक के साथ साथ बाइबल की अगली दो किताबें भी लिखीं, फिर भी उसके जीवन में जो दुष्ट स्त्रियाँ थीं उन्होनें मिलकर उसकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया और उसके प्राण को फँसाकर को बर्बाद कर दिया (1 राजा 11:1-11; सभोपदेशक 7:26-29) )। उसने अपने जीवन का जहाज़ खुद ही डुबो दिया।

विवाह केवल प्रभु में होना चाहिए (1 कुरिन्थ 7:39; 11:11)। विश्वासियों को विश्वासियों से विवाह करना चाहिए, और दोनों पति-पत्नी को पवित्रशास्त्र के अनुसार यीशु मसीह के लिए समर्पित, पूरी तरह से समर्पित शिष्य होना चाहिए। अतीत में परमेश्वर ने पृथ्वी को जलप्रलय से इसलिए नष्ट कर दिया क्योंकि परमेश्वर के पुत्रों ने इस संसार की पुत्रियों से विवाह रच लिए थें (उत्पत्ति 6:1-3)। किसी अविश्वासी से विवाह करना मूर्खतापूर्ण पाप है।

पौलुस ने चिताया, “धोखा न खाना, बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है (1 कुरिन्थ 15:33)। उसने धोखे की चेतावनी क्यों दी? क्योंकि आपका अपना धोखेबाज दिल आपसे कहेगा (जैसा कि आजकल प्रचलन है कि अपने मन की सुनों) कि आप एक बिगडैल मित्र की संगत में रहकर भी अपने वसूलों पर कायम रह सकते हैं। परन्तु आप ऐसा नहीं रह सकते, और आप रहेंगे भी नहीं। आप सिर्फ़ अपने मूर्खतापूर्ण मोह के विनाशकारी नतीजों के पूर्व-दर्शन से बचने का प्रयास कर रहे हैं। भोलों का संग छोड़ो, और जीवित रहो (नीतिवचन 9:6)।

अधिकांश ख्रिश्चन राष्ट्र अब कई धर्मों और सैद्धांतिक मान्यताओं के बीच विश्वव्यापी संगति की महामारी से ग्रस्त हो गएँ हैं, और ये सब परमेश्वर के लिए घृणास्पद हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि 15,000 मूर्तिपूजकों द्वारा गाया “बैतलहम में चमका सितारा” या “अमेज़िंग ग्रेस” गाना कैसा मधुर लगता है। परमेश्वर ऐसी संगतियों की भर्त्सना करता है। यदि कोई मनुष्य या स्वर्गदूत पौलुस के सुसमाचार के अनुसार आराधना नहीं करता है, तो उससे कोई संगति न रखें (गला 1:6-9)। प्रभु खुद उन्हें जल्द ही अपनी उपस्थिति से निकाल देगा, जिसका पहला स्वाद आपको ही मिलेगा (1 कुरिन्थ 16:22)।

अपने बच्चों को बुरी संगतियों से बचाना माता-पिता की गंभीर ज़िम्मेदारी है। उन्हें अपने बच्चों के दोस्तों की जांच करनी चाहिए और ऐसे किसी भी मित्र को उनसे दूर कर देना चाहिए जो उनके चरित्र और आचरण को बिगाड़ दे। भोलों का मित्र भी भोला ही हो यह ज़रूरी नहीं। यदि माता-पिता इस नियम को समझते हैं, तो मूर्खों का कोई मित्र नहीं होगा, जो उनके बच्चों के लिए सुरक्षित है और उन मूर्खों के लिए उचित दण्ड।

आप अपने दोस्तों और परिचितों के प्रति कितने सावधान, चुनने में सतर्क और अनुशासित हैं? इससे आपका भविष्य तय होगा। दाऊद, जो परमेश्वर के मन के अनुरूप मनुष्य था, इस बात का उदाहरण देता है कि हमें मित्रों के मामले में कितना सख्त होना चाहिए (भजन 101:3-8; 119:63,79,115)। सुलैमान ने इन नीतिवचनों में यही मानक सिखाया (नीतिवचन 1:10; 14:7; 19:27)। अच्छे मित्र बनाकर अपनी उन्नति करें (नीतिवचन 2:20)।

क्या आप ऐसा मित्र चाहते हैं जो आपको केवल धार्मिकता और पवित्रता का मार्ग सिखाए? प्रभु यीशु मसीह को अपना मित्र बनाएं और उसकी संगत में रहें (प्रकाशितवाक्य 3:20)। वह आपके प्राण को मधुर शान्ति, अनन्तकाल का विश्राम और बुद्धिपूर्ण मंत्रणा देगा। और वह आपको न कभी छोड़ेगा, और न त्यागेगा। परमेश्वर के सामने उसकी धार्मिकता के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के लिए आज ही उसपर विश्वास रखें।

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