नीतिवचन 22:21

कि मैं तुझे सत्य वचनों का निश्चय करा दूँ, जिससे जो तुझे काम में लगाएँ, उनको तू सच्चा उत्तर दे सके।

सत्य निरपेक्ष, परम और अंतिम है। यह सापेक्ष नहीं है, न ही चर्चा के लिए खुला है, यह किसी की राय का मोहताज नहीं है, इसे किसी मनुष्य की व्याख्या की आवश्यकता नहीं है, और न ही यह किसी की व्यक्तिगत पसंद का मसला है। सत्य एक सुलझा हुआ और स्थापित तथ्य है। यह समय के साथ न तो बदलता है, और न ही भिन्न भिन्न समयों की नई प्रचलित विचारधारा या नए दौर के अनुकूल चलता है, और न ही विभिन्न संस्कृतियों या परिस्थितियों के साथ अपना सामंजस्य स्थापित करता है। सत्य भावुक कार्यक्रमों, जनमत सर्वेक्षणों, राजनीतिक बहसों, या शैक्षनिक संगोष्ठियों से नहीं ढूंढा या पाया जाता है।

सत्य केवल वही है जो किसी भी विषय के संबंध में यहोवा परमेश्वर का संप्रभु चुनाव, घोषणा या आदेश है।

सुलैमान ने नीतिवचन क्यों लिखें (नीतिवचन 22:20)? इसलिए कि अपने पाठक को सत्य के वचनों की निश्चितता का ज्ञान दे, ताकि पाठक भी उन्हें दूसरों को सिखा सके! परमेश्वर ने बाइबल क्यों दी? इन्हीं कारणों से (मलाकी 2:7-9; 2 तीमु 3:16-17)! परम सत्य यहाँ है। सत्य वस्तुनिष्ठ, पहचानने योग्य और संचारनीय है। इसका अध्ययन किया जा सकता है, इसे सीखा जा सकता है और दूसरों को सिखाया जा सकता है।

मनुष्य भ्रांत और चकराया हुआ है, क्योंकि उसका मन कपट और धोखेबाज प्रवृत्ति के कारण अत्यंत विकृत हो चूका है (यिर्मयाह 17:9-10; रोमियों 3:9-18)। चूंकि उसने बनाई हुई वस्तुओं में प्रकट किए गए सत्य को नहीं माना, इसलिए परमेश्वर ने साफ़ साफ़ दिखाई देनेवाली बातों को भी समझने की उसकी क्षमता को ही मिटा दिया (रोमियों 1:18-32; यशा 44:20)। इस कारण, मनुष्य अपनी नीच वासनाओं को सही ठहराने और उनका बचाव करने के लिए सही और गलत के सम्बंध में अपनी परिभाषा और अपने नियम बनाता है (भजन 36:1-2; लूका 16:15; इफि 4:17-19)।

यह पीढ़ी सबसे अधिक भ्रमित, और चकराई हुई है। अनिवार्य शिक्षा और तरह-तरह के ऑडियो, अखबार, किताबे और वीडियो-मीडिया पूरी दुनिया को अहंकारी विचारकों की भ्रष्ट बातें सुनने के लिए मजबूर करते हैं, और ये लोग मानव-भ्रष्टता की नई गहराई को दिखाते हैं। परमेश्वर ने मनुष्य के शैक्षिक प्रयासों को शापित किया है, और उसका शाप वर्तमान सोच की अराजकता में स्पष्ट दिखाई देता है (1 कुरिन्थ 1:19-20; 3:19-20; 1 तीमु 6:20)।

अपने घर पर ही शिक्षा पाया हुआ किसान, जो अपनी बाइबल से परमेश्वर को जानता आया है और प्रत्येक दिन उसकी सृष्टि के साथ काम करता है, उसका स्थान एक विकृत सोचवालों की भीड़ ने ले लिया है, जिन्हें बन्दर से मानव के उद्विकासवादियों, परमेश्वर से नफ़रत करने वाले समाजवादियों द्वारा शिक्षित किया गया है, और जिनका दलालों तथा अराजक मूर्खों द्वारा सत्कार किया जाता है। दुनिया आज इन सामाजिक प्रयोगो, जो नैतिक भ्रम और भ्रष्टता को ही उत्पन्न करते हैं, के अंत (शाब्दिक) तक पहुंच रही है। वे व्यभिचार को प्रेम, समलैंगिकता को स्नेह, परस्त्रीगमन को पार्टी, और बद्तमीज़ बच्चों को केवल शरारती कहते हैं।

आज का मनुष्य अपनी गुफ़ा में रहनेवाले बन्दर की शक्ल के अपने पूर्वजों की तुलना में और ज्यादा भ्रमित और चकराया हुआ है। वह सोचता है कि वह एक बंदर से आया है, किसी भी पशु के बछड़े के साथ संभोग करता है, सुअर की तरह खाता है, शुतुरमुर्ग की तरह अजन्मे बच्चों को मारता है, जो उसे सिखाया जाता है उसे तोते की तरह दोहराता है, कॉमेडी शो देखकर मूर्खतापूर्ण बातों पर लकड़बग्घे की तरह ठहाके लगाता है, मुर्गे के समान संगीत पर थिरकता है, और लंगूर की तरह नाचता है। वह माँ-बाप और शिक्षकों द्वारा दिए जानेवाले शारीरिक दण्ड और न्यायियों द्वारा दिए जानेवाले मृत्युदंड को ठुकरा देता है, जबकि बच्चों का गर्भपात करता है और ऐसे नरसंहार को अपनी मरी हुई आत्मा से देखता है। वह कट्टर बाइबल प्रचारकों का उपहास उड़ाता है, जबकि बन्दर से उद्विकास पर सवाल उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को फटकार लगाता है।

परन्तु इस विश्व में परम सत्य मौजूद है, और जिन भ्रमित जानवरों का अभी अभी वर्णन किया गया है, वे इसे कभी नहीं खोज पाएंगे। सुलैमान के पास यह परम सत्य था, और उसने इसे अपने बेटे और अपने पाठकों को दे दिया। बाइबल सत्य है, और जो कोई इसके और इसके रचयिता के सामने थरथराने को तैयार है, वह सिद्ध और परिपूर्ण ज्ञान तथा समझ को पाएगा। सत्य का अस्तित्व है; इसे सिखाया जाना चाहिए; इसका बचाव, और पैरवी की जानी चाहिए।

यीशु ने कहा, ”तेरा वचन सत्य है” (यूहन्ना 17:17)। पतरस ने कहा कि बाइबल स्वर्ग से सुनाई देनेवाली परमेश्वर की वाणी से भी अधिक दृढ़ है (2 पतरस 1:16-21)। यशायाह ने लिखा है कि पवित्र शास्त्र के विपरीत कोई भी विचारधारा केवल अंधकार ही साबित हुई है (यशा 8:20)। दाऊद ने सभी विषयों पर चर्चा के लिए केवल परमेश्वर के वचन को ऊंचा उठाया, और वह किसी भी भिन्न मत से घृणा करता था (भजन 119:128)। पौलुस ने कहा कि इस संसार का विज्ञान सच्चा विज्ञान नहीं था और कौन-सी चीजें अच्छी हैं या बुरी हैं, साबित की जा सकती हैं और की जानी चाहिए (1 तीमु 6:20; 1 थिस्स 5:21)।

क्योंकि स्वाभाविक प्रवृत्ति का मनुष्य शैतान का दास है, जो सब झूठ का पिता है, अत: उसे सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है (यूहन्ना 8:44-45)। यीशु जानता था कि वह झूठ बोलकर अपने लिए एक बड़ी भीड़ इकट्ठी कर सकता था। परन्तु वह आप ही सत्य है, इसलिए उसने सत्य को इतने अधिकार और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया कि लोग अपने स्त्रियोचित और अज्ञानी शिक्षकों के ऊपर उसकी श्रेष्ठता से चकित थे (मत्ती 7:28-29)।

प्रेरितों ने दंतकथाओं का प्रचार नहीं किया। उन्होंने परम सत्य का प्रचार किया, जिसे परमेश्वर के चुने हुओं के विश्वास के रूप में जाना जाता है (लूका 1:1-4; तीतुस 1:1)। उन्होंने वाक्पटुता की कला का उपयोग करने से इन्कार कर दिया ताकि दुनिया के लोगों को इस समझ या विश्वास से रोक सके कि प्रस्तुतीकरण की शैली या कला मायने रखती है (1 कुरिन्थियों 2:1-5)। वे यीशु मसीह के पुनरुत्थान के चश्मदीद गवाह थे, जिसने कई अचूक प्रमाणों को देकर अपने पुनरुत्थान को प्रमाणित किया (प्रेरितों के काम 1:3,22; 1 कुरिन्थियों 15:3-8)। उन्होंने इस तथ्य और पूरी बाइबल को ही परम सत्य के रूप में सिखाया।

व्यभिचार मृत्युदण्ड के योग्य अपराध है, और समलैंगिकता भी मृत्युदण्ड के योग्य ही अपराध है, लेकिन समलैंगिकता एक अप्राकृतिक विकृति है। गर्भपात बाल-हत्या है, और बच्चों पर यदि छड़ी का उपयोग किया जाए तो उनमें पनपती बदतमीज़ी को आसानी से हल किया जा सकता है। केवल विवाह ही एक पुरुष और एक स्त्री के बीच यौन-सम्बन्ध के लिए एकमात्र आधार और समाज की बुनियाद है। स्त्रियों को अपने पतियों की आज्ञा का पालन करना और उनका सम्मान करना है, और उन्हें कलीसिया में बोलने की अनुमति नहीं है। ये तथ्य और इनके जैसी कई हजारों बातें परम सत्य हैं, क्योंकि वे सार्वभौम प्रभु परमेश्वर की घोषणाएँ और आदेश हैं।

परमेश्वर का हर एक वचन पवित्र है (नीति 30:5)। इस संसार में अच्छे शब्द केवल यीशु मसीह के वचन हैं (1 तीमु 6:3)। प्रत्येक पाठक को पता होना चाहिए कि जब लोग उनसे उनकी आशा के विषय में पूछते हैं तब उन्हें किस प्रकार सत्य का उत्तर देना है (1 पतरस 3:15), और यह सच्चे पवित्रजनों का कर्तव्य है कि वे विश्वास के लिए दृढ़ता से संघर्ष करें – अर्थात् परम और अंतिम सत्य – जो पवित्र लोगों को एक ही बार सदा के लिए सौंपा गया था (यहूदा 1 :3). सभी मनुष्यों की विचारधाराएं – चाहे मसीही विश्वासी हो या न हो -मूल्यहीन हैं। आपको सभी प्रश्नों के बाइबल से सच्चे उत्तर देने होंगे।

परमेश्वर सच्चे आराधकों को खोजता है, जो उसकी आराधना आत्मा और सच्चाई से करेंगे (यूहन्ना 4:23-24)। बहस करने, चर्चा करने, आविष्कार करने या संशोधित करने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। उसने मनुष्य पर अपनी सिद्ध इच्छा प्रकट की है कि वह जान ले कि उसे क्या करना है, और आपको इसी दिव्य-प्रकाशन को अपने पूरे मन से खोजना है (व्यव. 4:5-10; 6:24-25; 29:29; 32:46-47)। यदि कोई इस वचन को छोड़ अन्य शिक्षा देता है तो आपको उसे अपनी संगति और कलीसिया से बाहर कर देना है (नीति 9:6; 14:7; व्यवस्था 13:6-18; भजन 101:3; रोमि 16:17-18; इफिसियों 5:11; 2 थिस्स 2:15) 3:6,14; 1 तीमु 6:3-5; 2 तीमु 3:1-5; तीतुस 3:10-11)।

अपने सभी प्रश्नों के उत्तरों की तलाश बाइबल में करें, और इससे कम पर समझौता न करें। परमेश्वर के प्रकट उपदेशों की बड़ाई करो, और सब मिथ्या मार्गों से बैर रखो (भजन संहिता 119:128)। किसी भी मनुष्य या सभी मनुष्यों की राय एक जैसी होती है – भ्रम। दूसरों के किसी भी प्रश्न का उत्तर केवल बाइबल से दें। सत्य के दृढ़ वचन को ही अपने मुँह के शब्द होने दें। सभी अवसरों पर पूरे यत्न से सत्य के लिए खड़े रहें।

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