नीतिवचन 22:18
क्योंकि यह मनोहर बात है कि तू उन्हें अपने हृदय में धारण करे, और उससे अधिक वे तेरे होठों में सजेंगे।
परमेश्वर के वचन अद्भुत बातें हैं! यह आपका कर्तव्य है कि आप अपने कान लगाए और उनकी सुने (नीतिवचन 22:17)। यह आपका कर्तव्य है कि आप अपना मन लगा कर उनसे प्रेम करें (नीतिवचन 22:17)। वे आपकी आत्मा को अत्यन्त मनभावने होंगे, और आप उन्हें दूसरों को बताने के लिए तैयार रहेंगे।
परमेश्वर के वचनों को अपने हृदय में धारण करना आपकी आत्मा के लिए मनोहर बात होगी। वे मधु से भी बढ़कर मीठी होंगे (भजन 119:103), आपके हृदय का आनन्द ठहरेंगे (भजन 119:111), और बड़ी लूट के तुल्य ठहरेंगे (भजन 119:162)। यिर्मयाह ने कहा कि वे उसके मन के हर्ष और आनन्द का कारण हैं (यिर्मयाह 15:16)।
क्या आप परमेश्वर के वचनों के लिए लालायित हो? अय्यूब ने कहा, “उसकी आज्ञा का पालन करने से मैं न हटा, और मैं ने उसके वचन अपनी इच्छा से कहीं अधिक काम के जानकर सुरक्षित रखे” (अय्यूब 23:12)। आप कब तक बिना भोजन के रह सकते हैं? क्या आप परमेश्वर के वचनों की वैसे ही लालसा करते हैं जैसे भोजन की?
क्या परमेश्वर के वचनों का प्रचार सुनना आपके सप्ताह का सर्वोत्तम समय है? या क्या खाने के लिए बाहर जाना आपके सप्ताह का सर्वोत्तम समय है? क्या आप परमेश्वर के वचनों का उपदेश सुनने जाते हो? क्या आपका पास्टर मानता भी है कि उसके पास परमेश्वर के वचन हैं? क्या वह उन्हें परमेश्वर के मुख से निकले एक एक रत्न के रूप में प्रस्तुत करता है? आपने पास्टर से उनकी मांग करो!
क्या आपके पास परमेश्वर के वचन हैं? आज बहुत सी भिन्न भिन्न बाइबल हैं, सभी परमेश्वर का वचन (एकवचन) होने का दावा करते हैं। लेकिन किस बाइबल में परमेश्वर के वचन (बहुवचन) हैं? यीशु मसीह और उसके प्रेरितों के पास पवित्रशास्त्र था जिससे उन्होंने एक वचन से महत्वपूर्ण धर्म-शिक्षाओं पर वाद-विवाद किए (मत्ती 22:31-33,41-46; यूहन्ना 8:58; 10:33-36; गला 3:16; 4:9; इब्रानी 8 :13; 12:26-27).
क्या आप उस दिव्य पुस्तकालय से प्रेम करते और उसका मूल्य समझते हैं जो परमेश्वर ने आपको दिया है? क्या वह आपके लिये चोखे सोने से अधिक मूल्यवान और मधु के छत्ते से अधिक मधुर है (भजन 19:10)? क्या आप विस्मय और श्रद्धा के साथ इसके पन्ने खोलते हैं, और परमेश्वर से विनती करते हैं कि आप पर नई बातें प्रकट करें (भजन 119:18)? इस पुस्तकालय में सभी प्रकार की 66 पुस्तकें, 1189 अध्याय, 31,102 वचन और 788,280 शब्द हैं!
परमेश्वर के कुछ निश्चित वचनों को जानने पर ही हम दूसरों को उत्तर देने के लिए उनका उपयोग कर सकते हैं, क्योंकि सुलैमान ने कहा, “कि मैं तुझे सत्य वचनों का निश्चय करा दूँ, जिससे जो तुझे काम में लगाएँ, उनको तू सच्चा उत्तर दे सके” (नीति 22:21)। हमें केवल सत्य के ही वचन सुनने चाहिए, और केवल वे ही हैं जिन्हें हमें दूसरों को बताना है।
यदि आप इन अनमोल वचनों को अपने भीतर धारण करते हैं, उन पर मनन करते हैं और उन्हें अपने जीवन और अपने आसपास की बातों पर लागू करते हैं, तो वे आपके होठों पर सजेंगे। इससे वे आपकी जीभ पर इतने निकट होंगे कि आप सत्य की खोज करने वालों को आसानी से उन्हें बता पाएँगे। आप उनके कठिन सवालों का जवाब देने में सक्षम होंगे, क्योंकि सत्य के वचन आपके मन के लिए बहुत परिचित हो चूंके होंगे।
परमेश्वर के वचन उसके बच्चों के होठों पर सजे हुए रहते हैं, और वे बहुतों का पालन-पोषण करते हैं (नीतिवचन 10:21; 15:7)। वे यीशु मसीह को अपने हृदयों में सब के सर्वोच्च प्रभु के रूप में ऊंचा उठाते हैं, और जो कोई उन से उनकी आशा के विषय में कुछ पूछता है, तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहते हैं (1 पतरस 3:15)। पाठक, यदि आपके विषय में यह सच नहीं है, तो आप सोचकर देखें कि आप कहाँ विफल रहे हैं? क्या आपको एक बेहतर शिक्षक की, अधिक ध्यान से सुनने की, बार बार पढ़ने की, या अधिक मन लगाकर चिंतन करने की आवश्यकता है? जो भी आवश्यक हो, वही करो!
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