नीतिवचन 22:17
अपने कान को झुका, और बुद्धिमानों के वचन सुन, और मेरे ज्ञान पर अपना मन लगा।
सत्य और बुद्धि को सीखने की तीन शर्ते हैं। और वे कॉलेज की किसी भी क़िताब में सूचीबद्ध नहीं हैं। आपको यह मानने के लिए कि आप अज्ञानी हैं, सबसे पहले दीन होना होगा; फिर आपको सोचना और बोलना बंद कर देना होगा, ताकि जो लोग आप से अधिक बुद्धिमान हैं वे आपको सिखा सके; और फिर, जो कुछ आपको सिखाया जाता है आपको उससे प्रेम करना और उसके प्रति समर्पित रहना है। यह प्रक्रिया ज्ञान प्राप्ति की निश्चयता देती है।
यह नियम किसने दिया? क्या वह जानता था कि वह क्या कह रहा था? सुलैमान ने ये तीन बातें परमेश्वर की प्रेरणा से और अपने अनुभव से सिखाईं। जब उसके पिता राजा दाऊद की मृत्यु हुई, तो सुलैमान को राजा बनाया गया, हालाँकि वह अभी भी एक युवा और सुकुमार था। अगर यीशु मसीह के अपवाद को छोड़ दिया जाए, तो उसने आज तक का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बनने के लिए इन चरणों का पालन किया (1 राजा 3:5-28; 4:29-34)।
स्वभाव ही से, सब मनुष्य इन तीनों चरणों के विरुद्ध विद्रोह करते हैं, इसलिए उनमें से अधिकांश लोग मूर्खों के रूप में जीते हैं और उसी स्थिति में मर जाते हैं। सबसे पहले आपको यह जानना ज़रूरी है कि, आप का जन्म एक अहंकारपूर्ण स्वाभाव के साथ हुआ जो दूसरों से शिक्षा पाने के लिए अपने को नम्र नहीं करेगा। दूसरा, आप दूसरों की बात सुनने के बजाय अपनी स्वयं की विचारधारा विकसित करना और उसे अभिव्यक्त करना अधिक पसंद करेंगे। और तीसरा, आपका हृदय अपनी ही मूर्खतापूर्ण धारणाओं से प्रेम करता है और सत्य व ज्ञान के द्वारा बदलना नहीं चाहता।
अपने कान झुकाना अपने आप को नम्र करना और अज्ञानता को स्वीकार करना है। दाऊद ने कहा, “हे यहोवा, न तो मेरा मन गर्व से और न मेरी दृष्टि घमण्ड से भरी है; और जो बातें बड़ी और मेरे लिये अधिक कठिन हैं, उनसे मैं काम नहीं रखता” (भजन 131:1)। सुलैमान ने कहा, “और अब, हे मेरे परमेश्वर यहोवा! तू ने अपने दास को मेरे पिता दाऊद के स्थान पर राजा किया है, परन्तु मैं छोटा लड़का–सा हूँ जो भीतर बाहर आना जाना नहीं जानता” (1 राजा 3:7)। उन्होंने हर प्रकार के अभिमान से छुटकारा पाया।
इन दोनों पुरुषों ने किस स्तर के सत्य और बुद्धि को पाया? किसी भी अन्य स्वाभाविक पुरुषों से बढ़कर! और जो उनके आदर्शों पर चलेंगे उन्हें भी वही प्रतिफल प्राप्त होगा। अपने स्वयं के विचारों पर भरोसा रखने के कर विचार को ठुकरा दो; स्वीकार करें कि आप अज्ञानी हैं; और इस मूर्ख की सहायता करने के लिए परमेश्वर और अपने शिक्षकों से विनती करें (नीति 30:2-3; भजन 32:8-9; 119:18; यशा 66:1-2; 1 कुरिं 3:18)। बुद्धि के इस मूल मन्त्र को सीख लो – जैसे आकाश पृथ्वी से ऊँचा है, वैसे ही उसके विचार आपके विचारों से ऊँचे हैं (यशा 55:8-9)।
बुद्धिमानों की बातें सुनने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें है। आपको परमेश्वर के ज्ञान के विरोध में उठनेवाली अपनी विरोधाभासी सोच का त्याग करना होगा, ताकि आपका दिमाग शिक्षा को ग्रहण कर सके (2 कुरिं 10:4-6)। आपको अपनी कल्पनाओं और विचारों का प्रचार करना रोकना होगा, ताकि आप अपने से अधिक बुद्धिमान लोगों से सत्य की विचारधारा को सीख सकें (नीति 18:2; 26:12)। और अपना शिक्षक होने के लिए केवल बुद्धिमानों को चुने (नीति 19:27; सभो 7:5; यशा 3:12)।
बच्चों को लगता है कि वे अपने माता-पिता से अधिक जानते हैं। वाह! उन्हें अपने माता-पिता की सुनने के महत्व को समझने की ज़रूरत है। नागरिकों को लगता है कि वे सरकारी अधिकारियों से ज्यादा जानते हैं। वाह! उन्हें सुनने की जरूरत है। चर्च के सदस्य मानते हैं कि वे अपने पास्टर से ज्यादा जानते हैं। किस आधार पर? एक अध्ययन बाइबल, या किसी प्रसिद्ध लेखक द्वारा लिखी किसी बाइबल-टिका के आधार पर? सुनो और सीखों!
आज की पीढ़ी नहीं चाहती कि कोई उन्हें सिखाए, इसलिए वे अपने लिए ऐसे शिक्षकों की भीड़ लगाते हैं जो उन्हें दंतकथाएं सुनाकर उनका मनोरंजन करें (2 तीमु 4:1-4)। भावनाप्रधान मंडलियाँ अपने यहाँ ऐसा वातावरण पैदा करती हैं जहां विनाश के लिए ठहराए गए ये विद्रोही चाय-बिस्किट खाने और एक भावनाप्रधान सत्र में शामिल होने के लिए इकट्ठा होते हैं। हालांकि यह परिस्थिति पहले की तुलना में आज अधिक व्यापक बन गयी है, मूल चरित्र-दोष पुराना ही है (यशा 30:9-10; यहेज 33:30-33; आमोस 2:12; 7:12-17)।
सुलैमान सुनने के महत्व पर बल देकर अक्सर अपने बेटे को प्रोत्साहित करता था (नीति 1:5,8; 4:1,10; 5:7; 8:6,33; 19:20; 23:19)। साथ ही साथ, आपको झूठी शिक्षा को ठुकराना आवश्यक है (नीति 14:7; 19:27)। कुरनेलियुस में सुनने की एक अद्भुत् मानसिकता थीं (प्रेरितों के काम 10:33), और बिरीया के कुलीन मनुष्य सुनने में तत्पर थे (प्रेरितों 17:11)। आप किस रीति से सुनते हैं इस विषय में प्रभु यीशु ने कड़ी चेतावनी दीं (लूका 8:18)। सुनने से इन्कार करके परमेश्वर को तुम्हारे विरुद्ध शपथ खाने को मत उकसाओ (भजन 95:7-11; इब्रा 3:7-19)।
ज्ञान पर अपना मन लगाने के लिए पुरानी मानसिकता, लक्ष्यों और अभिमतों को ठोकर मारो, ताकि आप बाइबल से नयी मानसिकता, नए लक्ष्य, और नई विचारधारा को सीख सको। उन बातों से प्रीति रखना जिन्हें आप सीखते हैं, और विपरीत विचारों से घृणा करना एक चुनाव है (भजन 119:113,128)। यह आपकी आत्मा के लिए सच्चे ज्ञान को सबसे बढ़कर महत्वपूर्ण समझना है, और इसे प्राप्त करने और इसकी रक्षा करने हर क़ीमत चुकाने की तत्परता है (नीति 2:1-5; 18:1; 23:23)। इसका अर्थ है बुद्धि के लिए उत्साहित होना और आभारी रहना (नीति 2:10; भजन 119:47; यिर्म 15:16)। इसका अर्थ अपने जीवन के लिए इसे प्रिय जानकर दृढ़ता से थामे रहना भी है (नीति 4:4; 6:21; 7:3)।
शिक्षा के लिए आपका प्रेम या आपकी नफरत आपके चरित्र के विषय में बहुत कुछ प्रकट करता है (नीति 10:8; 12:1; 15:5)। और दोनों ही दिशाओं से आनेवाले परिणाम आजीवन हैं (नीति 8:36; 13:13,18; 15:10; 28:14)। अय्यूब और दाऊद परमेश्वर के वचनों से सुधार और शिक्षा पाने से प्रीति रखते थें (अय्यूब 23:12; भजन 119:162-163)। सत्य और बुद्धि उत्सव मनाने के लिए सबसे उचित कारण होना चाहिए (नेह 8:10-12)।
बच्चों, अपने माता-पिता के लिए अपना कान झुकाओं, उन्हें ध्यान से सुनें, और उनके अनुभव और ज्ञान से प्यार करना और भरोसा रखना चुनों। यह तुम्हारे जीवन के लिए है! वे इस दुनिया के बारे में तुम्हारी कल्पना से कहीं ज्यादा जानते हैं। वे तुम्हारी भविष्य की शांति, सुख और समृद्धि के लिए तुमसे कहीं अधिक चिंतित हैं। उनकी शिक्षा को ठुकरा कर तो देखो, कब्र तुम्हें भरी जवानी में ही निगल लेगी (नीति 30:17; इफ़ि 6:1-3)।
वयस्कों, तुम्हें सबसे पहले तो परमेश्वर के ऐसे जन को खोजने की आवश्यकता है जो तुम्हें बिना किसी अफ़सोस के, बिना कोई समझौता किए, या बिना किसी ग़लती के परमेश्वर का वचन सिखा सके (1 राजा 22:7; मलाकी 2:7; गला 1:6-9)। तो फिर, तुम्हें अपने पास्टर की ओर कान लगाना है, उसे ध्यान से सुनना है, और परमेश्वर के उस वचन के सामने जो जिसका वह प्रचार करता है थरथराना है (यशा 66:2; I थिस्स 2:13; 5:20; इब्रा 13:7)। जो इन तरीकों को पसंद नहीं करते हैं, उन्हें परमेश्वर और बुद्धिमान लोग अज्ञानता और संकट के सागर में डूबता हुआ देखेंगे (नीति 13:15; 1 कुरिन्थ 14:37-38)।
शैतान और तुम्हारा देह-स्वभाव बाइबल के प्रचार से घृणा रखते हैं। आपको एक नये जन्मे हुए बच्चे के समान निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करनी चाहिए (1 पतरस 2:2) और युद्ध की पहचान करनी है (2 कुरिन्थ 10:4-6)। क्या आप अपनी अज्ञानता को स्वीकार करने के लिए स्वयं को दीन और नम्र कर सकते हैं? क्या आप दूसरों को अनुमति देंगे कि वे आपको सुधारे, निर्देश दे, डांटे और सिखाए? क्या आप अपनी आदतों, विचारों, प्राथमिकताओं और परंपराओं को तुच्छ समझेंगे ताकि हर विषय पर परमेश्वर के वचन को अपना सके? यही आपका सबसे बड़ा लक्ष्य है, क्योंकि यही सत्य और बुद्धि का माध्यम है।
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