नीतिवचन 20:9

कौन कह सकता है कि मैं ने अपने हृदय को पवित्र किया; अथवा मैं पाप से शुद्ध हुआ हूँ?

आप किस पर पूरा भरोसा कर सकते हैं? किसी पर नहीं, खास तौर पर आप पर! बुद्धि में यह ज्ञान शामिल है कि आपका हृदय नैतिक रूप से भ्रष्ट है (नीतिवचन 28:26)। जैसे जैसे आप खुद पर भरोसा न रखना सीखते जाते हैं, आप बुद्धि में बढ़ते जाते हैं।

केवल मूर्ख ही अपने मंसूबों और सोच पर भरोसा करते हैं (नीतिवचन 12:15; 14:12; यिर्मयाह 17:9; 1 कुरिंथ 3:18-20)। यह महत्वपूर्ण तथ्य आपको विवश करता है कि जब जब आप पर कोई निर्णय लेने की नौबत आती है तो आप परमेश्वर और अन्य बुद्धिमान लोगों से सलाह लें, साथ ही, यह तथ्य आपको दूसरों की आलोचना करने से रोकता है, और अनुग्रह के लिए परमेश्वर को पुकारने आपको प्रेरित करता है।

क्या आप इस नीतिवचन के सवाल का जवाब दे सकते हैं? जवाब नकारात्मक है : कोई भी व्यक्ति अपने हृदय के बारे में ये दो कथन नहीं कर सकता। यह एक साहित्यिक शैली है कि सकारात्मक प्रश्न एक शक्तिशाली नकारात्मक निष्कर्ष को जन्म देता है। मनुष्य का हृदय स्वभाव ही से भ्रष्ट है, और उसके मन की अभिलाषा अशुद्ध हैं। सुलैमान ने यहाँ मनुष्य की इसी भ्रष्टता को सिखाने के लिए बयानबाजी की नकारात्मक शक्ति का उपयोग किया।

बाइबल, जो मसीहियों की परमेश्वर-प्रेरित पवित्र पुस्तक है, सिखाती है कि सब मनुष्यों के हृदय में विकृत और स्वार्थी इरादे होते हैं। समस्त मानवताजाति के पिता, आदम ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया और मानव जाति को बर्बाद कर दिया (रोमियों 5:12-14)। अदन की वाटिका से ही, सब मनुष्य स्वभाव से परमेश्वर और धार्मिकता से नफ़रत करते हैं और पाप और बुराई से प्रेम करते हैं (भजन 14:1-3; 51:5; 58:3; रोमियों 3:9-18; तीतुस 3:3)।

अय्यूब इसी सत्य को सिखाने के लिए एक अलंकारिक प्रश्न का उपयोग करता है। “अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं” (अय्यूब 14:4)। और उसका मित्र एलीपज पूछता है, “मनुष्य है क्या कि वह निष्कलंक हो? या जो स्त्री से उत्पन्न हुआ वह है क्या कि निर्दोष हो सके?” (अय्यूब 15:14)। और उसका मित्र बिलदाद पूछता है, “फिर मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी कैसे ठहर सकता है? जो स्त्री से उत्पन्न हुआ है वह कैसे निर्मल हो सकता है?” (अय्यूब 25:4)।

मनुष्य का हृदय सब वस्तुओं से अधिक धोका देनेवाला और अत्यन्त दुष्ट है, इतना कि आप समझ ही नहीं सकते (यिर्मयाह 17:9)। इस आहत करनेवाले सत्य पर विश्वास रखें! इंसान की सोच को विकृत करनेवाले और दुष्ट इरादों को जन्म देनेवाले इस आंतरिक अभिशाप पर कोई भी मनुष्य विजय नहीं पा सकता (1 यूहन्ना 1:8-10)। केवल यीशु मसीह की उस सामर्थ्य से जिसके उपयोग से उसने इस सृष्टि की उत्पत्ति कीं, मनुष्य को धार्मिकता और पवित्रता का नया हृदय प्राप्त हो सकता है, जो उसे सच्ची बुद्धि पाने की योग्यता देता है (रोमियों 8:7-8; 1 कुरिं 2:14-16; इफिसियों 2:10; 4:24; फिलिप्पियों 2:12-13)।

सबक क्या है? सिद्धांत स्पष्ट है – मनुष्य पूरी तरह से भ्रष्ट, मूर्ख, पापी और दुष्ट है, और वह खुद को सुधार नहीं सकता। लेकिन यह नीतिवचन यहाँ बिना संदर्भ के क्यों है (नीतिवचन 20:8-10)? इसे हम रोमियों की पत्री से समझ सकते हैं! युवा पुरुषों को विवेक और बुद्धि सिखाने के सुलैमान के उद्देश्य को याद करें (नीतिवचन 1:1-4)। यहाँ दो महत्वपूर्ण सबक हैं – पहला, दूसरों पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता कि उनके इरादे शुद्ध हैं, और दूसरा, न ही आपको मूर्ख बनकर यह कहना चाहिए कि आपके अपने इरादे शुद्ध हैं।

सुलैमान ने अपने दर्शनशास्त्र की पुस्तक – सभोपदेशक में मानवीय भ्रष्टता के सिद्धांत का यही तर्क दिया। उसने लिखा, “नि:सन्देह पृथ्वी पर कोई ऐसा धर्मी मनुष्य नहीं जो भलाई ही करे और जिस से पाप न हुआ हो” (सभोपदेशक 7:20)। फिर से, ऐसा लगता है कि इस कथन में पर्याप्त सन्दर्भ की कमी है या कोई संदर्भ ही नहीं है (सभोपदेशक 7:19-21)। लेकिन अगर आप करीब से देखें, तो आप पाएंगे कि सुलैमान उस प्रवृत्ति के खिलाफ चेतावनी दे रहा था जिसमें मनुष्य खुद को धर्मी समझता है और दूसरों के प्रति हीन भावना रखता है (सभोपदेशक 7:16-22)।

बुद्धि की प्राप्ति के लिए एक शर्त है, और वह है मनुष्य के स्वभाव को जानना – यह असाध्य रूप से मूर्ख और भ्रष्ट है। मानवीय समस्याओं से निपटने के लिए एक ऐसी समीक्षा की ज़रूरत होती है जो पूरी तरह से बेदाग हो। इसलिए, आपको दूसरों की राय और विचारों का मूल्यांकन पवित्रशास्त्र की कसौटी पर करना ज़रूरी है (भजन 119:98-100,128; अय्यूब 32:7-9; यशायाह 8:20)। जैसा कि पौलुस ने बाद में लिखा, “परमेश्वर सच्चा, और हर एक मनुष्य झूठा ठहरे” (रोमियों 3:4)!

लेकिन आप अपनी राय या विचारों पर भी भरोसा नहीं कर सकते। इसलिए आपको अपने विचारों को भी पवित्रशास्त्र से परखना ज़रूरी है (भजन 19:7-11; 2 तीमुथियुस 3:16-17)। अपने स्वयं के उद्देश्यों और विचारों के बारे में शुद्ध संदेह करते हुए, आप अपनी सुरक्षा के लिए बहुत से सलाहकारों से पूछताछ करने के सुलैमान के उपदेश पर अधिक ईमानदारी से ध्यान देंगे (नीतिवचन 11:14) और अधिक विनम्रता से सुधार स्वीकार करेंगे (नीतिवचन 27:5-6)।

इसके अलावा, जब दूसरे लोग कोई तर्क देते हैं और शिकायते करते हैं तो आपको संयमी होना ज़रूरी है, जबकि अतीत में आप बहुत अहंकारी और जल्दी से प्रतिक्रिया देनेवाले इंसान थें (नीतिवचन 18:13)। आखिरकार, आपके भ्रष्ट हृदय के कारण आपकी परख और आपका निर्णय बहुत गलत हो सकता है। इस नीतिवचन की बुद्धि को अपने हृदय में दृढ़ता से थामे रखें, तो आप अपनी प्रतिक्रियाओं को धीमा करेंगे और उत्तर देने से पहले सोचेंगे (नीतिवचन 15:28)।

अपने आप को धर्मी समझना बन्द करें (नीतिवचन 20:6)। अपने चालचलन से अपनी ईमानदारी को साबित करें (नीतिवचन 20:7)। यदि कोई अधिकारी आपको सुधारे, तो उसे मूर्खता में आकर उसे न ठुकराएँ (नीतिवचन 20:8)। जीवन के छोटे-छोटे पहलुओं की भी जाँच करें (नीतिवचन 20:10)। एक बच्चा भी अपने कार्यों से जाना जाता है, न कि उसके शब्दों से (नीतिवचन 20:11)। यदि आपके पास समझ के साथ सत्य को देखने या सुनने की क्षमता है, तो यह परमेश्वर के अनुग्रह से है (नीतिवचन 20:12)।

आपके या किसी अन्य व्यक्ति के लिए एकमात्र आशा परमेश्वर का अनुग्रह और यीशु मसीह के पुनरुत्थान की सामर्थ्य है जिससे आपको एक नया हृदय मिलता है (रोमियों 8:7-8; 1 कुरिंथ 2:14-16; 2 तीमुथियुस 2:24-26)। मानव-हृदय का पुनर्वास नहीं होता है; इसे फिर से बनाया जाना आवश्यक होता है। इस संसार में रहते पूर्णता प्राप्त नहीं की जा सकती; इसके लिए आपको स्वर्ग की प्रतीक्षा करनी होगी (इब्रानियों 12:23)। यहाँ तक कि सबसे अच्छे मनुष्य और उनके सबसे महान कार्य भी उनके सांसारिक ढाँचे में बचे हुए भ्रष्टाचार से कलंकित होते हैं और नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए, ज्ञान और बुद्धि प्राप्त करने के लिए अपनी नज़रों में दीन होना आवश्यक है। न तो आप पर और न ही किसी अन्य व्यक्ति पर पूरी तरह से भरोसा किया जा सकता है। आपको अपनी दयनीय स्थिति पर परमेश्वर से दया की भीख माँगनी चाहिए, और आपको अपने किसी भी विचार से ज़्यादा परमेश्वर के हर वचन पर भरोसा करना चाहिए (भजन 119:113)। चूँकि आप अपने हृदय को शुद्ध नहीं कर सकते या पाप से शुद्ध नहीं हो सकते, इसलिए ज़रूरी है कि आप आप अनन्तकाल का जीवन पाने के लिए यीशु मसीह में प्रकट परमेश्वर के अनुग्रह पर खुद को सौंप दें और इस वर्तमान जीवन के लिए उसकी अचूक बाइबल पर भरोसा रखें।

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