नीतिवचन 20:3

मुक़द्दमे से हाथ उठाना, पुरुष की महिमा ठहरती है; परन्तु सब मूढ़ झगड़ने को तैयार होते हैं।

झगड़ना बंद करो! जिंदगी बहुत छोटी है। शांति मूल्यवान है। सज्जन मनुष्य झगड़े और कलह को ख़त्म करते हैं। प्रेम और एकता धार्मिकता हैं और उनसे उन्नति होती है। क्या आप मेलमिलाप करानेवाले मनुष्य हैं? क्या आप ‘तू तू, मैं मैं’, कलह और हंगामा खड़ा करने से घृणा करते हैं? क्या आप को सामाजिक स्थिरता, शांति और सद्भाव प्रिय हैं? हो सके तो हर प्रकार का रगड़ा-झगड़ा खत्म करो।

धर्मीजन लड़ाई-झगड़ों से घृणा करते हैं; वे ऐसे झगड़ो से पीछे हट जाते हैं जिनमें उन्हें शामिल होने की नौबत आती है; जब दूसरे लड़ रहे हों तो वे सुलह और मेलमिलाप कराने में मदद करते हैं। ऐसा वे अपनी प्रतिष्ठा और धर्मपरायणता के कारण करते हैं। यह उनकी महिमा ठहरती है (नीतिवचन 19:11)। लेकिन मूर्ख, जिनमें कोई धार्मिक चरित्र और सत्यनिष्ठा नहीं होती है, झगड़े और कलह को जारी रखने के लिए दूसरों को विभिन्न पैतरें आज़माकर भड़काते हैं। ये वे हैं जो इस संसार में आपत्तिजनक उपद्रव मचाते हैं।

इस नीतिवचन के खंडो में मौजूद विषमताएं शब्द “परन्तु” के उपयोग से दिखाई गई हैं। दूसरे खंड के मूढ़ व्यक्ति की तुलना प्रथम खंड के बुद्धिमान व्यक्ति से की गई है। पहला खंड यह नहीं बताता है कि उसमें वर्णित मनुष्य बुद्धिमान व्यक्ति है, क्योंकि यह अनावश्यक है जैसा कि दूसरे खंड से स्पष्ट है। विषमता दिखाने की इसी पद्धति का उपयोग करने पर, दूसरे खंड का आशय एक ऐसे मूर्ख के आचरण और बोलचाल से है जो झगड़ों का कारण बनता है या उन्हें और भड़काता है। इसके अलावा, बुद्धिमान व्यक्ति के उचित ही सम्मान पाने की योग्यता के विपरीत, मूर्ख का तिरस्कार किया जाना चाहिए।

कलह झगड़ा करना होता है। बुद्धिमान व्यक्ति लड़ाई-झगड़ों से दूर रहता है। वह जानता है कि झगड़ा, फिर चाहे वह केवल उसके मन में ही चल रहा हो, शैतानी भ्रम और नरक से आनेवाली बुराई है (याकूब 3:14-16)। वह जानता है कि परमेश्वर झगड़े की निंदा करता है और मेलमिलाप करने की आज्ञा देता है (रोमियों 13:13; गला 5:19-23; इफि 4:1-3; फिलि 2:3; याकूब 3:17-18)। वह अच्छे से जानता है कि लड़ाई-झगड़ा सांसारिक मनवाले क्रिश्चन व्यक्ति की पहचान है, लेकिन सबसे अधिक संभावना यह होती है कि ऐसा मनुष्य नरक का पुत्र है (1 कुरिन्थियों 3:3; तीतुस 3:3; याकूब 4:1)। वह मेलमिलाप करनेवाली धन्य जीवनशैली चुनता है (मत्ती 5:9)।

एक बुद्धिमान व्यक्ति झगड़ो में न पड़ने के कारण सम्मान पाता है। अपराध से बचना (नीतिवचन 19:11), विलम्ब से क्रोध करना (नीतिवचन 14:29), अपने मन को वश में रखना (नीतिवचन 16:32), झगड़े से फिर किसी दिन निपटने के बजाय उसे तुरन्त पूरी तरह ख़त्म करना (नीतिवचन 17:14), विरोधियों के साथ झगड़ा करने में जल्दी न करना (नीतिवचन 25:8), और अगर किसी से आपसी मतभेद हो तो दूसरों को बताए बिना अकेले में व्यक्तिगत अपराधों पर चर्चा करना (नीतिवचन 25:9-10) यह सब उसकी महिमा होती है।

परन्तु क्योंकि मूर्ख विवाद उत्पन्न करता है, इस कारण उसका तिरस्कार किया जाना चाहिए। उसके शीघ्र क्रोधी स्वभाव (नीतिवचन 14:17), अहंकार (नीतिवचन 13:10), बहुत झगड़े को उठाने (नीतिवचन 17:9), और उनके विषय में दूसरों के साथ कानाफूसी करने (नीतिवचन 16:27-28) इन सारी बातों के कारण उससे घृणा की जानी चाहिए। भले लोग इन उपद्रवियों को पकड़कर उन्हें कोड़े लगाना चाहते हैं (नीतिवचन 18:6)। ऐसे मूर्ख लोग बातों का बतंगड़ करने के लिए दो लोगों की आपसी रंजिश में हस्तक्षेप करते हैं, जिसे अन्यथा सुलझाकर शान्त किया जा सकता है।

सांसारिक सुखविलासी पुरुष लड़ाई-झगड़े को मर्दाना बात मानते हैं, क्योंकि वे कबाड़खाने के कुत्तों से ऊंचा नहीं सोच सकते। लड़ाई का विरोध करने के लिए बचकानी भावनाओं और शैतानी उकसाव के आगे घुटने टेकने की तुलना में कहीं अधिक चरित्र, अनुशासन और शक्ति की आवश्यकता होती है। बेशक, इस नीतिवचन को लिखने के लिए सुलैमान को परमेश्वर ने ही प्रेरित किया। लोग सोचते हैं कि सम्मान की रक्षा के लिए लड़ना आवश्यक होता है, परन्तु परमेश्वर उस मनुष्य का सम्मान करता है जो युद्ध नहीं करता। केवल अभिमानी, दुष्ट पशुओं को ही लगता है कि उन्हें दूसरे पर एक और प्रहार करना चाहिए।

फरीसी, अर्थात धार्मिक कट्टरपंथी जो व्यक्तिगत वासनाओं के लिए आधारस्तंभ थें, उन्होंने एक नागरिक कानून लाकर, “आँख के बदले आँख, और दाँत के बदले दाँत,” का प्रचार किया (मत्ती 5:38)। परन्तु यीशु ने उस भक्त पुरुष की प्रशंसा की, जो दूसरा गाल उसके मारने वाले की ओर फेर देता है (मत्ती 5:39)। केवल नीच मूर्ख ही सोचते हैं कि उन्हें अपने व्यक्तित्व और प्रतिष्ठा की रक्षा चोट पहुँचानेवाले व्यक्ति को काट-खाकर ही करनी चाहिए। कुलीन मनुष्य मेलमिलाप से विवादों को निपटा देते हैं, चोट पहुँचानेवालों को क्षमा करते हैं और शत्रुओं को भी अपना मित्र बनाते हैं।

आपके जीवन के कौन-से क्षेत्र में लड़ाई और कलह चल रहा है? क्या झगड़ा आपके वैवाहिक जीवन में चल रहा है, क्योंकि न तो पति अपनी गलती मानने को तैयार है, न ही पत्नी, ताकि घर में शांति रहे? इस नीतिवचन के पाठ को सीखें और ऐसा कुछ करें जो आपके लिए शोभायमान हो – अपने को मन का दीन करें और मेल-मिलाप करें। क्या आपके और आपके बच्चों के बीच कोई विवाद चल है? आप माता पिता हैं! सयाने बनें और मेल-मिलाप कराकर झगड़ा ख़त्म करें।

आप कितने सम्माननीय हैं? क्या आप किसी क्रोधी व्यक्ति को उसके गलत होने पर भी कोमल स्वर में उत्तर दे पाते हैं (नीतिवचन 15:1)? क्या आप बुराई में बालक हैं (1 कुरिन्थ 14:20)? क्या आप सब को क्षमा कर सकते हैं, यहाँ तक कि उन्हें भी जो आपसे झगड़ते हैं (कुलु 3:12-15)? क्या आप कड़वाहट से घृणा और कोमलता से प्रेम करते हैं (इफिस 4:31-32)? क्या आप पहचान सकते हैं कि मूल्यों के लिए अधिकांश झगड़े वास्तव में केवल अपने अहंकार के कारण किए जाते हैं (नीतिवचन 13:10; 21:24)? क्या आप अन्याय सहने और अपनी ही हानि सहने के लिए तैयार हैं (1 कुरिन्थियों 6:7)? क्या आप अपने स्वर्गीय पिता का अनुसरण करते हैं और अपने शत्रुओं का भला चाहते हैं (मत्ती 5:43-48)?

यदि आप जानते हैं कि आपने बहुत पहले ही किसी के विरुद्ध अपराध किया है, तो रिश्ते को सुधारने के लिए उसके पास जाएं (मत्ती 5:23-26)। जब तक आप ऐसा नहीं करेंगे तब तक आपकी आराधना परमेश्वर को मान्य नहीं है। यदि किसी ने आपके विरूद्ध अपराध किया है, तो सबसे अच्छा विकल्प केवल उसे क्षमा कर देना और उसकी ग़लती को भूल जाना है (नीतिवचन 19:11; कुल 3:13)। परन्तु यदि आप उन्हें क्षमा नहीं कर सकते हैं, तो उनसे अकेले में मिलकर उस अपराध के विषय में बात करें और कोमलता से उत्तर दें (मत्ती 18:15-18)।

विश्व के इतिहास में सबसे बड़ी मध्यस्थता, शांति की स्थापना, और मेल-मिलाप पर विचार करें। स्वर्ग का पवित्र और न्यायी परमेश्वर सभी मनुष्यों पर उनके पापों के कारण क्रोधित था (भजन 5:4-6; 7:11; 11:4-6)। और मनुष्य उसके विरुद्ध घमण्ड और अनादर से भर गए, क्योंकि उन्होंने उसके बदले उसके शत्रु शैतान के पीछे हो लेने को चुना था (भजन 10:4; 14:1-3; इफि 2:1-3)। अनंत बुद्धि वाले धन्य परमेश्वर ने मनुष्य मसीह यीशु को भेजा, जिसने परमेश्वर और मनुष्य दोनों के बीच हस्तक्षेप किया और उस पूरे क्रोध को जो परमेश्वर का उनके विरोध में था, अपने ऊपर ले लिया, जिससे उसने परमेश्वर और उसकी चुनी हुई संतानों के बीच युगानुयुग के लिए मेल-मिलाप कराया (इफिसियों 1:3-14; रोमियों 5:6-11)।

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