नीतिवचन 2:2
ताकि तू बुद्धि की ओर अपना कान लगाए, और समझ की ओर अपना मन लगाए;
सुनना और प्रीति रखना, समर्पण और सरगर्मी, ये चारों बुद्धि और समझ की कुंजियाँ हैं। क्या आप इसके लिए कीमत चुकाने को तैयार हैं? सुलैमान ने बुद्धि को सीखने के लिए आवश्यक व्यक्तिगत योग्यताओं को सूचीबद्ध किया, और इस वचन में उन में से दो योग्यताओं का उल्लेख है – समर्पण और सरगर्मी (नीति 2:1-4)। क्या आप सुधार की बातें और शिक्षा को सुनने के लिए अपना कान लगाएंगे? क्या आप इसका पीछा करने के लिए अपनी महत्वाकांक्षा को इसी में लगा देंगे?
बुद्धि की ओर कान लगाना क्या है? इसका अर्थ है, दूसरों की मौखिक शिक्षा के अधीन हो जाना। अधिकतर लोग ऐसा नहीं करेंगे। वे इतने घमण्डी होते हैं कि दूसरों से शिक्षा सुनने से उन्हें छोटापन महसूस होता है, वे अपने ही मार्गों में इतने दृढ़, अटल और स्थापित होते हैं कि बदल नहीं सकते; इतने व्यस्त कि दूसरों से शिक्षा पाने के लिए उनके पास समय ही नहीं होता, इतने आलसी कि मौखिक सबक को सिखने वे मन नहीं लगा पाते। वे दूसरों की शिक्षा को कान लगाकर सुनने और उसका पालन करने अपने आप को समर्पित नहीं करेंगे।
इस्राएल ने परमेश्वर के भविष्यवक्ताओं की बातें सुनने की ओर अपने कान नहीं लगाए, इस कारण बेबीलोन द्वारा उनका विनाश हुआ (2 इति. 24:19; 33:10; नेह 9:29-30; यिर्म 13:11)। यहूदियों ने प्रेरितों और स्तिफनुस की बातें सुनने से अपने कान बंद कर लिए (प्रेरित 5:33; 7:57), इस कारण रोमियों द्वारा उनका विनाश हुआ। दोनों ही घटनाओं में उन्होंने परमेश्वर की बुद्धि को न चाहा, इसलिए वे इसे सुनने से मुकर गए।
आज ज्यादातर मसीही लोग सुनते नहीं। वे बाइबल से उपदेश और बुद्धि की बातें सुनने के बजाय मनोरंजन और दंतकथाएँ सुनना ज्यादा पसंद करते हैं। पौलुस ने ऐसे लोगों के विषय में चिताया जो खरी धर्मशिक्षा को न सहकर अपने कानों की खुजली को शांत करने शिक्षकों की भीड़ इकट्ठा करेंगे, और सत्य से मुँह फेर लेंगे। आज ऐसी कलीसियाएं तेजी से बढ़ रही हैं जो अपनी आराधना की शैली से ऐसे ही लोगों को संतुष्ट करती हैं। वे सांसारिक शैली के संगीत पर तालिंया बजा-बजाकर, उसे बढ़ावा देती हैं। किन्तु वे बाइबल से उपदेश के द्वारा कोई सुधार या शिक्षा पाना नहीं चाहती। वे खरे उपदेश को तुच्छ जानती हैं, भले ही उन्हें बताया जाता है कि वे इसे तुच्छ न जाने (1 थिस्स 5:20)।
यदि आप तत्पर मन से उपदेश नहीं सुनोगे (यशा 55:3; प्रेरितों 17:11), तो आप कभी भी बुद्धि को न पाओगे, और वह आप से वह भी ले लेगा जो आप को लगता है कि आप के पास है। यदि आप इस पर विश्वास नहीं करते हैं, तो आप पहले से ही बाइबल के यीशु से अनजान हैं (लूका 8:18)। आपकी तो प्रार्थनाएँ भी घृणित ठहरेगी (नीति 28:9)। ध्यान रखें कि आप कैसे सुनते हैं! जब यीशु ने कहा, “जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले” तो इस में कोई आश्चर्य नहीं (मत्ती 13:9; प्रका. 2:7, 11, 17, 29; 3:6, 13, 22)।
यदि कोई बच्चा अपने माता-पिता की बात नहीं मानता है, तो वह अपने ही जीवन की हानि करने की ओर बढ़ रहा है। उसके माता-पिता के पास इतनी अधिक बुद्धि है जिसे वह न तो माप सकता है, और न समझ सकता है, इसे पाना तो दूर की बात है। वे उसके पहले ही उसी के समान जीवन जी चुके होते हैं, और उस पर कई वर्षों से चिंतन करते आ रहे हैं। परन्तु प्रश्न यह है, कि यदि माता-पिता ही परमेश्वर के वचन के खरे उपदेश को सुनने अपने कान न लगाए, तो एक बच्चा अपने माता-पिता की शिक्षा की ओर कान क्यों कर लगाएगा?
समझ की बात पर मन लगाना क्या है? इसका अर्थ है, अन्य किसी भी उद्यम से बढ़कर शिक्षा, सत्य और बुद्धि से प्रीति रखना। आपका मन आपके सारे प्रेम और स्नेह का स्रोत है, और आप को स्वर्गीय वस्तुओं पर, समझ पर, और बुद्धि पर अपना मन लगाना है (नीति 8:17; कुलु 3:2)। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है, कि जो कोई अपने सम्पूर्ण मन से उसे ढूंढेगा, वह उसे पाएगा (यिर्म 29:13)।
लेकिन आज एक बड़ी समस्या है। क्योंकि अधर्म बहुत अधिक बढ़ गया है, इस कारण बहुतों का प्रेम ठण्डा हो गया है (मत्ती 24:12)। अधिकांश मसीही दुचित्ते हैं – वे मसीह और संसार दोनों ही से प्रीति रखना चाहते हैं – जो कि खतरनाक और असंभव है (याकूब 1:8)। परमेश्वर दो स्वामियों की सेवा करने की अनुमति नहीं देगा (मत्ती 6:24) और वह गुनगुने दृष्टिकोण से घृणा रखता है (प्रका. 2:4; 3:16)। वह आत्मिक व्यभिचार से घृणा रखता है (याकूब 4:4)।
बुद्धिमान लोग परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, कि वह उनका हियाव बढ़ाएं, ताकि वे सीख सकें, तथा उसके मार्ग पर और भी तेजी से आगे बढ़ सके (भजन 119:32)। वे उस से प्रार्थना करते हैं, कि वह उनके चित्त को उस के वचन की ओर फेर दे, और इस संसार से दूर कर दे (भजन 119:36; 141:4)। वे अपने प्रभु में आनंदित होते हैं, और उसी में घमण्ड करते हैं (भजन 37:4; यिर्म 9:23-24), इस कारण, वे संसार की भटकाने वाली बातों से दूर भागते हैं, और बड़ी अभिलाषा से बुद्धि का पीछा करते हैं (नीति 18:1)।
स्तिफनुस ने अपनी पीढ़ी के विषय में जो कठोर और गम्भीर शब्द कहे थें, उन पर चिंतन करें। उसने पुकारकर कहा, “हे हठीले लोगो, तुम्हारे मन और कान ख़तनारहित हैं। तुम सदा पवित्र आत्मा का विरोध करते आए हो। तुम भी वैसा ही कर रहे हो जैसा तुम्हारे पूर्वज किया करते थे” (प्रेरितों के काम 7:51)। ध्यान दे! उन्होंने सत्य के प्रति अपने मन और कान दोनों ही बंद कर लिए थे। उन में इस नीतिवचन में वर्णित दोनों ही योग्यताएं न थीं। पाठक, क्या आप अपना कान और अपनी समझ यीशु मसीह की बुद्धि की ओर लगाने के लिए तैयार हैं? यदि नहीं, तो आप मूर्ख ही बने रहेंगे।
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