नीतिवचन 2:17

जो अपनी जवानी के अगुवे को त्याग देती है, और अपने परमेश्वर की वाचा को भूला देती है। (केजेवी)

लड़कियां यदि आज्ञाकारी हो तो उनके तीन रक्षक होते हैं। वे तीन रक्षक हैं परमेश्वर, पिता और पति हैं। यदि लड़कियां अपने इन तीन रक्षकों का उनके उचित क्रम में आज्ञापालन करती हैं, तो वे कई पीड़ादायक संकटों से बच सकती हैं और बचेंगी। यद्यपि किसी लड़की का पिता एक अच्छा पिता न हो, फिर भी परमेश्वर की आज्ञाओं को मानने से उसे एक अच्छा पति मिलेगा।

पराई स्त्री, चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाली वेश्या या व्यभिचारिणी, इस नीतिवचन का विषय है जिसका सन्दर्भ नीति 2:16 में है। नीतिवचन की पुस्तक अपने शुरुआती अध्यायों में इस घातक फुसलानेवाली स्त्री के विरोध में बार-बार चेतावनी देती है। सुलैमान यहाँ दो बड़े अपराधों का उल्लेख करके ऐसी स्त्री के चरित्र की भर्त्सना करता है। प्रत्येक जवान पुरुष और जवान स्त्री ने एक पवित्र तिरस्कार सहित ऐसे चरित्रवाली स्त्री का द्वेष करना चाहिए।

स्त्री और पुरुष के बीच बिना विवाह के या विवाहेत्तर शरीरभोग इस संसार में अब इतना स्वीकार्य हो गया है जितना पहले कभी न था, परन्तु परमेश्वर का भय मानने वाली स्त्रियां इन दोनों पापों से घृणा करेगी। हर एक पिता को चाहिए कि वह अपनी बेटी में ऐसे घिनौने पापों के विचार के भय को कम करने वाले हर प्रभाव को निष्फल करे और उसकी रखवाली करे। आप के बच्चों के जीवन में दो मुख्य बातें जो उन्हें पथभ्रष कर सकती है – मित्र और मनोरंजन; जैसे किताबे, साप्ताहिक पत्रिकाएं, टीवी चैनल्स, संगीत, फिल्में, इंटरनेट, और वौट्एप, तथा फेसबुक जैसे सोशल मिडिया। बुरी संगति सचमुच अच्छे आचरण को बिगाड़ देती हैं (1 कुरिं 15:33)।

“अपनी जवानी का अगुवा” उसका पति है। जब वह किसी और पुरुष के साथ यौनाचार करती है, तब वह बड़े ही भयानक तरीके से अपने पति का त्याग कर देती है। ऐसी बेवफाई घिनौनी है, क्योंकि वही उसकी जवानी के दिनों से उसका साथी और अगुवा रहा है। उन्होंने एक दुसरे के साथ जवानी में किए अपने विवाह के अद्भुत सुखानंद को आपस में बांटा है। यौन सुख के विषय में पिता के नियमों का शायद त्याग कर दिया जाता हो, परन्तु जब उसकी विवाहित बेटी व्यभिचार करती है तब यह वास्तव में पिता नहीं है जिसका त्याग किया जाता है।

बाइबल जवानी की पत्नी का वर्णन करती है (नीति 5:18; यशा 54:6; योएल 1:8; मल 2:14-15)। लड़का और लड़की सयाने हो जाने पर यदि विवाह में विलम्ब न किया जाए, तो इससे लड़का और लड़की दोनों को एक जवान जीवनसाथी मिल जाता है। इस नीतिवचन में यहूदी विवाह की परम्परा का उल्लेख हो रहा है, जब बेटा या बेटी के सयाने होते ही समय पर विवाह किया जाता था। आज के समय के उम्र बढ़ जाने पर होने वाले विवाह मूर्खतापूर्ण सोच और बच्चों की घटिया परवरिश का नतीजा है, जिस कारण उम्र में बढ़ चुके पुरुष और स्त्रियां कई वर्षों की यौन इच्छा से कुंठित होकर परीक्षा में पड़ जाते हैं। आज के ज्यादातर युवा विवाह के लिए पर्याप्त रूप से सयाने या परिपक्व नहीं हैं।

जीवन को उम्र के अलग अलग पड़ाओं में विभाजित किया जा सकता है। जन्म से लेकर पांच वर्ष तक बाल्यावस्था; पांच वर्ष से लेकर युवावस्था तक बचपन का समय; और युवावस्था से लेकर परिपक्वता तक जवानी; जब अधिकतर 30 वर्ष की उम्र तक पहुँच जाते हैं; वे 18 के नहीं होते जैसा कि आज कई सोच बैठते हैं (गिनती 4:3; 1 इति 23:3; लूका 3:23)। यहूदियों में विवाह इसी दौरान, जिसे जवानी का समय कहा जाता है, होते थे (लैव्य 27:1-7; व्यव 1:39; 1 शमू 12:2; सभो 11:10; योना 4:11; 1 कुरिं 7:9, 36; 1 तीमु 4:12)।

एक पिता अपनी पुत्री को परमेश्वर का भय मानना सिखाकर और बाइबल में सिखाए गए धर्मी सद्गुणों के नियमों की तालीम देकर बचपन से ही उसका मार्गदर्शन करता है (नीति 4:1; 17:6; 22:15; भजन 34:11; इफि 6:4)। विवाह तक अपने बेटी के कौमार्य की रक्षा करना उसका कर्तव्य है (व्यवस्थाविवरण 22:13-21; 1 कुरिं 7:36-38)। इसका बोझ लड़की पर नहीं, बल्कि पिता पर होना चाहिए, क्योंकि अवश्य है कि वह पुरुषों की वासनाओं से और उसे जाल में फसाने वाले तौर तरीकों से, जिनसे वह ज्ञात है, उसकी रखवाली करे। यदि कोई पुरुष उसकी पुत्री के साथ विवाह करने का प्रस्ताव ले आता है, तो उसने पहले पिता से संपर्क करना है, न कि सीधा लड़की से।

बेटियों को अच्छे संस्कारों में निपुण बनाने पिता की एक बड़ी भूमिका होती है, क्योंकि वही परिवार का मुख्य अगुवा और शिक्षक है (उत्पत्ति 18:19; यहोशू 24:15; इफि 6:4)। एक माँ इस भूमिका को इतना बखुबी नहीं निभा सकती, भले ही प्रेम, वैवाहिक जीवन और यौन-सहवास को लेकर उसका अपना दृष्टिकोण, और अनुभव होता है। पिता भी अपनी बेटियों को सद्गुणी आचरण की शिक्षा दे, और दुष्ट पुरुषों के विषय में प्रेम और कोमलता से उन्हें चितौनी दें, क्योंकि पिताओं के पास ऐसी बातों की सहज और प्रेरितीय बुद्धि होती है, और वे अपनी बेटियों के भविष्य के लिए ज्यादा परवाह करते हैं।

पिताओं ने अपनी बेटियों की लड़कों से अकेले में मिलने-जुलने की गतिविधियों पर लगाम लगाना चाहिए, ताकि वे उन्हें ऐसे हालातों से सुरक्षित रख सके जहां उन्हें यौनाचार के पाप में पड़ने मजबूर होना पड़े, या उन्हें लुभाया जाए। याकूब अपनी पुत्री के मसले में विफल हुआ (उत्पत्ति 34:1-5)। परन्तु जब पुत्रियों का विवाह सही समय पर हो जाए, जैसा कि यहूदियों में होता है, तो पुत्रियों के जवान रहते ही पिताओं का प्रशिक्षण और रखवाली का दायित्व समाप्त हो जाएगा, क्योंकि तब पति उनके नए अगुवे बन जाते हैं।

प्रत्येक बेटी जो परमेश्वर का भय मानती है, उसे तत्पर मन से अपने पिता के निर्देशों को ग्रहण करना चाहिए। और प्रत्येक विवाहित स्त्री ने अपनी जवानी के अगुवे और साथी को तथा उस वाचा को जो उसने परमेश्वर की उपस्थिति में बान्धी थी, स्मरण रखना चाहिए। सृष्टि में उसके स्थान, तथा परमेश्वर द्वारा उसे सौपी गई भूमिका के कारण उसका यौनाचार के विश्वासघात के लिए कठोरता से न्याय किया जाएगा। परन्तु पश्चात्ताप करनेवाली प्रत्येक मरियम के लिए एक क्षमाशील उद्धारकर्ता है!

परमेश्वर पतियों से चाहता है की वे अपनी अपनी पत्नियों की अगुवाई करें (उत्पत्ति 3:16; 1 कुरिं 11:3)। एक पति अपनी पत्नी की मन्नतों को उतनी ही आसानी से रद्द कर सकता है, जितनी आसानी से बेटी की (गिनती 30:8), और उसको शिक्षा देना उसका कर्तव्य है (1 कुरिं 14:35)। घर में पुरुष ही अपने परिवारों के लिए सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे, जैसा कि होना ही चाहिए (उत्पत्ति 18:19; यहोशू 24:15)। एक जवान विवाहित जोड़े में यदि पत्नी सम्पूर्ण इच्छा और तत्परता से अपने धर्मी और निपुण पति के पीछे चलती है तो यह एक अद्भुत बात है, हालांकि ऐसे विवाह-बंधन ढूंढ पाना इन दिनों बहुत दुर्लभ है।

पराई स्त्री का विकृत चरित्र ही उसे अपने जवानी के पति के साथ ऐसे पीड़ायुक्त तरीके से बेवफाई करने की सामर्थ्य देता है। बहुत सी स्त्रियां तो ऐसा करने की कल्पना भी नहीं कर सकती। परन्तु एक व्यभिचारिणी की आत्मा विकृत और कुरूप होती है, जिससे वह ऐसा घिनौना पाप कर बैठती है, और उस पर उसे अफसोस भी नहीं होता, और न कोई अपराध बोध होता है (नीति 30:20)। मूर्ख व्यभिचारी पुरुष चौकस हो जाए, क्योंकि यदि किसी बेवफा स्त्री ने आप के साथ सम्बन्ध बनाने अपने पति से विश्वासघात किया है, तो कल वह किसी तीसरे पुरुष के साथ हो लेने के लिए आप के साथ भी विश्वासघात कर सकती है।

“अपने परमेश्वर की वाचा” उसकी विवाह की वाचा है (मला 2:14; यहेज 16:8)। एक व्यभिचारी स्त्री अपने पति को छोड़ देती है, और साथ ही वह अपने परमेश्वर को और उस वाचा को जो उसने उससे बाँधी कि अपने पति से विश्वासयोग्य रहेगी, भूला देती है। बाइबल के समय विवाह एक रुढी-परम्परा या रस्म-रिवाज न होकर एक वाचा और महोत्सव हुआ करता था। धार्मिक और उपरी रस्म-रिवाज पर ज़ोर देना रोमन कैथोलिक कलीसिया और विवाह के लिए मानव निर्मित धर्म-संस्कारों से उत्पन्न हुए हैं।

अय्यूब जब विवाहित था, उसने अपनी आँखों से वाचा बाँधी (अय्यूब 31:1)। प्रत्येक वर और वधु ने अपनी कसमें खाते समय यही करना चाहिए (नीति 6:25; मत्ती 5:28)। क्योंकि स्त्री को पुरुष के लिए बनाया गया था, इस कारण यौन-आचरण को लेकर उसकी विश्वासयोग्यता और भी ज्यादा बंधनकारक है (1 कुरिं 11:9; उत्पत्ति 2:18-25)। क्या यह सोच आपको अचम्भित कर रही है? उन भिन्नताओं पर ध्यान दे जो परमेश्वर ने स्त्री और पुरुष के मध्य स्थापित की हैं (उत्पत्ति 38:8, 24; निर्ग 21:10; व्यव. 21:10-14; 22:20; 24:1-4; 25:11-12)।

प्रत्येक स्त्री को गिनती 5:11-31 पढ़ना चाहिए ताकि देख सके कि परमेश्वर ने किस प्रकार विश्वासघाती पत्नियों के विरोध में पतियों का पक्ष लिया और किस प्रकार उन्हें कठोर दण्ड दिया। यह शास्त्रपाठ प्रभु के मन को प्रतिबिम्बित करता है, फिर यह संसार इसके विषय में कुछ भी सोचे। परमेश्वर के वचन के विरोध में अपने मन में किसी भी विद्रोह को न उठने दे, क्योंकि परमेश्वर के ये वचन पूर्ण रूप से सत्य हैं (भजन 119:128)। अपने पति के प्रति वैवाहिक निष्ठा और वफादारी स्त्री का दायित्व है, साथ ही उस परमेश्वर के सामने भी जिसे उसने विश्वासयोग्यता का वचन दिया है। स्त्री का पति अपने यौन विश्वासयोग्यता के लिए प्रत्यक्ष परमेश्वर के सामने उत्तरदायी है, किन्तु दोनों के अपराध बड़े हैं।

बाइबल में कभी कोई विवाह वाचा के बिना नहीं हुआ, और एक उचित विवाह की वाचा में दोनों पक्षों के लिए यौन विश्वासयोग्यता को लेकर परमेश्वर की इच्छा का पालन करना शामिल है (लैव्य 20:10; व्यवस्था 22:13-21; 23:17; इब्रा 13:4)। विवाह की वाचा में उन हल्के और घिसे-पिटे शब्दों से भी बढ़कर बातें शामिल हैं, जिन्हें आज विवाह कहे जानेवाले 5 मिनट की विधि में बुदबुदाया जाता है। विवाह की वाचा विस्तार से और स्पष्ट रूप से लिखी जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इसकी ओर संकेत किया जा सके।

प्रिय मसीही पाठक, आप परमेश्वर की एक संतान तथा मसीह की दुल्हन के रूप में, अपने पिता और पति के साथ कितने विश्वासयोग्य हैं? क्या आप ने उसके प्रति अपने पहले प्रेम को खोकर, जिसने तुम्हारे प्राणों से प्रीति रखी, अपनी जवानी के अगुवे को त्याग दिया है (प्रका 2:4)? क्या आपने अपने परमेश्वर की उस वाचा को भूला दिया जो आपने अपने बपतिस्मे के समय उससे बाँधी थी, और जब आपने अपना शेष जीवन मसीह को सौप दिया था? इस नीतिवचन को यौन-व्यभिचार तक सीमित करना आसान है, किन्तु आप अपने आत्मिक व्यभिचार को नज़रअंदाज़ न करें।

प्रभु यीशु मसीह ने व्यभिचार और सांसारिकता के घिनौने रूप की उग्रता को रेखांकित करने समझौता करनेवाले अपने लोगों को व्यभिचारी और व्यभिचारिणी कहकर पुकारा (यहेज 16; याकूब 4:4; आदि)। व्यभिचार के कारण जो दर्द, विश्वासघात और कुटिलता सामने आती है, वे केवल परमेश्वर से ही सम्पूर्ण रूप से प्रेम करने की आज्ञा से दूर ले जानेवाली स्थिति की एक उपयुक्त तुलना प्रस्तुत करते हैं। वह मांग करता है कि आप अपने पूरे मन, बुद्धि, प्राण और बल से उससे प्रीति रखे, जिसकी वह अपेक्षा करता है, और जिसके वह योग्य भी है! वह एक जलन रखनेवाला परमेश्वर है, और आप किसी अन्य तरीके से उसकी सेवा नहीं कर सकते (यहोशू 24:19)।

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