नीतिवचन 2:14

जो बुराई करने से आनन्दित होते हैं, और दुष्टों की हठीली बातों से प्रसन्न होते हैं; (केजेवी)

पापी लोग पाप में आनंद लेते हैं। उनका विवेक शायद ही कभी दुखी होता है, और उनका प्राण शायद ही कभी खेदित होता है। जब जब उन्हें पाप करने का अवसर मिलता है, वे उत्साह से भर जाते हैं और वे अपने साथी पापियों की घिनौनी हरकते देखना एक बड़ी बहादुरी का काम समझते हैं। वे बुराई करते हैं, और अन्य लोगों की बुराई में आनंद लेते हैं। अधर्मियों का यही चरित्र है, और जो बुद्धिमान हैं वे हर हाल में उनसे बचे रहेंगे।

सुलैमान ने अपने पुत्र को बुद्धि, ज्ञान, विवेक और समझ के विषय में शिक्षा दी (नीति 2:10-11)। ये आशीषें उसे दुष्ट मनुष्यों और दुष्ट स्त्रियों से बचाएंगी (नीति 2:12-19)। वे उन्हें धर्मी जनों की संगति में ले जाएगी और उनकी आशीषों का हिस्सेदार बनाएगी (नीति 2:20-21), और वे उसे दुष्टों पर आनेवाले न्याय से बचाएगी (नीति 2:22)।

दुष्ट जन कभी परमेश्वर का विचार नहीं करते : उनके सारे विचारों में उसे कोई स्थान नहीं है (भजन 10:4)। वे जीवन भर केवल अपने आप को खुश करने की ही सोचते रहते हैं। वे परमेश्वर की चितौनियों पर थरथरातें नहीं हैं। वे पाप को लेकर हमेशा सरगर्म रहते हैं। अहाब के समान, वे यहोवा की दृष्टी में जो बुरा है वही करने अपने को बेच डालते हैं (1 राजा 21:25-26)। उनका विनाश तेजी से आ रहा है (2 पतरस 2:3)।

ये दुष्ट मनुष्य लूत के समान नहीं हैं, वह अब्राहम का धर्मी और न्यायी भतीजा था। जब वह एक शारीरिक मन के साथ सदोम नगर में रह रहा था, तब वह हर दिन अपने सच्चे मन को पीड़ित करता था (2 पतरस 2:6-8)। परन्तु पापी केवल तब पीड़ित होते हैं जब वे कोई पाप नहीं कर पाते (नीति 4:16; मीका 2:1)! वे पाप से प्रीति रखते हैं और दूसरों को पाप करते हुए देखना पसंद करते हैं, यहाँ तक कि अति घिनौने पाप भी। बॉलिवुड के विषय में सोचकर देखें!

यह संसार ऐसे पागलों से भरा पड़ा है। पौलुस ने उनका वर्णन ऐसे लोग कहकर किया जो “अपने मन की अनर्थ की रीतियों पर चलते हैं,” और “जिनकी बुद्धि अंधेर हो गई है…. और परमेश्वर के जीवन से अलग किये हुए हैं….और लुचपन में लग गए हैं” (इफि 4:17-19)। उनकी यह भयावह दशा इसलिए है क्योंकि उन्होंने अपने मन व्यर्थता में लगा दिए हैं, उनकी समझ अंधकारमय हो गई है; और हृदय अंधेर कर दिए गए हैं। परमेश्वर ने उनके जैसे आचरण रखने के विरुद्ध चिताया।

मनुष्यों ने परमेश्वर के उस सत्य का जो निर्मित वस्तुओं में प्रकट है, इन्कार कर दिया, इस कारण उसने उन्हें अंधा कर दिया (रोमियों 1:18-21)। उन्होंने अपनी मूर्खता में अपनी समानता के ईश्वरों को बनाया (रोम 1:22-23), इस कारण परमेश्वर ने उनके मनों को और भी अधिक अंधा कर दिया, कि वे आपस में ही सब प्रकार के घृणित और लज्जाजनक कार्य करें (रोम 1:24-31)। यद्यपि वे जानते थे कि ऐसे पाप मृत्युदण्ड के योग्य हैं, वे पाप करते रहते हैं और दूसरों को भी पाप करता देख आनंदित होते हैं (रोमियों 1:32)।

यह कुटिल पीढ़ी दुष्टों की चापलूसी करती है। नतीजा चाहे जो भी हो पाप अब उनके लिए भयानक बात नहीं रहा। मनोरंजन करने के लिए पाप हंसी-मज़ाक और चुटकुलें सुनाने के लिए एक अच्छी विषयवस्तु बनकर रह गया है। परन्तु केवल मूर्ख ही पाप का उपहास करते हैं (नीति 10:23; 14:9)। पाप केवल मनुष्यों का नाश ही नहीं करता, बल्कि यह एक पवित्र और न्यायी परमेश्वर को भी दुखी करता है।

ऐसे दुष्टों से छुटकारा पाने की दृष्टी से बुद्धि मूल्यवान है (नीति 2:10-15)। हे जवानों, बुद्धि से प्रीति रखो और यत्न से उसकी खोज में रहो कि तुम उनकी जीवन शैली और उन पर आनेवाले भयानक न्याय से बच जाओ। परमेश्वर को अपने सुख का मूल जानो, और उसी में आनंदित रहो (भजन 37:4)। जवानी की वासनाओं से दूर भागो (2 तीमुथियुस 2:22)। उसके बदले, धार्मिकता का पीछा करों (तीत 2:6)।

नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।