नीतिवचन 2:11

विवेक तुझे बचाए रखेगा, समझ तेरी रखवाली करेगी :

क्या आप सुरक्षित हैं? क्या आप की रखवाली की जा रही है? राजा सुलैमान ने अपने नीतिवचन इसलिए लिखे ताकि आप को दुख और मुसीबतों से बचाकर सुरक्षित रखे। बहुत से लोगों को जीवन में कठिनाइयों और परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है, जिनकी उन्हें कई प्रकार से भारी किमत चुकानी पड़ती है। विवेक और समझ आपको सुरक्षित रख सकते है।

लोग अपने आप को खतरों से बचाने कई सावधानियां बरतते हैं। वे चार-पहियों वाले वाहनों में पेटी बांधते हैं, पोषक तत्वों की गोलियां खाते हैं, रात को घरों में अन्दर से ताले लगाते हैं, कसरत करते हैं और अच्छा आहार लेते हैं, समय समय पर बिल्डिंग की मरम्मत करते हैं, स्वास्थ बीमा खरीदते हैं, मौसम विभाग की चेतावनियों पर ध्यान देते हैं, अपने शहर के गुंडागार्दिवाले इलाको से दूर रहते हैं, नियमित रूप से डॉक्टर से चेक-अप कराते हैं, पैदल चलते हैं, और बहुत कुछ।

वे अपने बच्चों की सुरक्षा करने का भी हर सम्भव प्रयास करते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि उनके बच्चे तीनों समय का संतुलित भोजन करें, जोखिम से भरे खेल-कूद से बचें रहे, धारदार वस्तुओं से न खेलें, अजनबियों से बचें रहे, अपनी साइकिल रास्ते पर न चलाए, ठंड के मौसम में गरम कपड़े पहने, समय पर सो जाएं, पेड़ों पर ऊँची चढ़ाई भी न करें, दबंग बच्चों से दूर रहें, इत्यादि।

किन्तु इन सभी प्रयासों का ज्यादा मूल्य नहीं है, और ये केवल शरीर को सुरक्षित रखते हैं। आप अपने प्राण के लिए क्या कर रहे हैं? अपने तथा अपने बच्चों के प्राण के लिए क्या कर रहे हैं? आप स्वयं विवेक और समझ को पाने के लिए और फिर उन्हें अपने बच्चों के चित्त में बिठाने के लिए कितना परिश्रम कर रहे हैं? सांसारिक शिक्षण संस्थाएं और अन्य माध्यम यकिनन ऐसी बातों की शिक्षा नहीं देते हैं, और आधुनिक कलीसिया में उन्हें शायद ही कभी सिखाया जाता है। परन्तु परमेश्वर ने उन्हें आप के लिए सुलैमान के नीतिवचनों में रख छोड़ा है।

अपने प्राण को बचाए रखने और उसकी रखवाली करने के लिए ऊपर वर्णित बातों से भी भिन्न परिश्रम की आवश्यकता होती है। और आपको तय करना है कि सबसे ज्यादा मूल्यवान क्या है, शारीरिक स्वास्थ्य या आपका प्राण? अधिक महत्वपूर्ण क्या है, वित्तीय संपत्ति या आपका प्राण? यीशु मसीह ने आपके प्राण को समस्त जगत को पाने से बढ़कर मूल्यवान जाना (मत्ती 16:26)। उसने स्पष्ट रूप से आपके सामने प्राथमिकताओं को रखा है।

विवेक और समझ आपके प्राण को बचाए रखेंगे, और वे आपके जीवन और संपत्ति की भी रखवाली करेंगे। जैसा कि इस उपदेशक ने अन्य स्थान पर लिखा है, “बुद्धि मूल वास्तु है; सो तू बुद्धि प्राप्त कर : और अपनी समस्त उपलब्धियों में समझ को प्राप्त कर” (नीति 4:7)। नीतिवचन की पूरी पुस्तक ही विवेक और समझ को प्राप्त करने के मूल्य की शिक्षा देती है।

विवेक जानता है कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में क्या करना है, उसे कब करना है और उसे कैसे करना है। समझ किसी परिस्थिति को परखना है, उसके छिपे हुए खतरों को, बारीक तथा जटिल ग़लतियों को जानना है, और फिर सही-सही कार्य करने का गुण है। ये दोनों शब्द, अर्थात् विवेक और समझ, अपने अर्थ में एक जैसे ही लगते हैं, किन्तु उनके अपने भिन्न-भिन्न अर्थ भी हैं। संदर्भ प्रकट करता है कि उनका सम्बन्ध बुद्धि और ज्ञान से हैं (नीति 2:10)।

विवेक और समझ को पाने के अतिरिक्त लाभ भी इस नीतिवचन के संदर्भ में पाए जाते हैं (नीति 2:12-22)। वे आपको दुष्ट मनुष्य और पराई स्त्री की पापमय जीवन शैली और चुनाव करने से बचाएंगे, वे दोनों अपने ही विनाश के मार्ग पर हैं और जितना सम्भव हो सके उतनों को अपने साथ ले जाने की खोज में रहते हैं। इस कारण विवेक और समझ आपके लिए ज़रूरी है।

नीतिवचन की पुस्तक विवेक सिखाती है (नीति 1:4)। यह सिखाती है कि कब बोलना है, और कब चुप रहना है (नीति 26:4-5; 15:28; 29:11), कब क्रोध करना है और कब क्रोध नहीं करना है (नीति 25:23; 19:11)। आपके काम-काज का सही सही मार्गदर्शन किया जाना ही विवेक है (भज 112:5)। विवेक के बिना एक स्त्री सोने की नाथ पहने हुए सुअरी के समान है (नीति 11:22; तीतुस 2:5)। बिज कैसे बोया जाता है, कटनी कैसे की जाती है, और विभिन्न प्रकारों के अनाज के दानों को कैसे झाडा जाता है, यह सब जानना ही विवेक है (यशा. 28:26)। इस विवेक के कारण यूसुफ को ऊँचे पद पर बिठाया गया था (उत्पत्ति 41:33-40)।

नीतिवचन की पुस्तक समझ की शिक्षा देती है (नीति 1:2)। पशुओं में समझ नहीं होती (अय्यूब 39:17; भज 32:9)। पवित्र का ज्ञान उसकी बुनियाद है (नीति 9:10), और परमेश्वर के वचन पर इसे स्थापित किया गया है (भज 111:10; 119:98-100, 104, 130)। ये तब ही मिलता है जब मनुष्य अपनी ही समझ का त्याग कर देता है (नीति 3:5)। व्यभिचार करना, व्यर्थ बड़बड़ करनेवालों की सुनना, और आसानी से किसी का जमानतदार बनना, समझ की ग़ैरमौजूदगी का प्रमाण है (नीति 6:32; 12:11; 17:18)। समझ में धीरज धरना और आत्म-संयम रखना (नीति 14:29) तथा ज्ञान की खोज में रहना शामिल है (नीति 15:14)। यह धन्यता का उगम है (नीति 3:13), फलवंत जीवन की ओर ले जाती है (नीति 13:15; 16:22), और मनुष्य को एक उत्तम आत्मावाला व्यक्ति ठहराती है (नीति 17:27)। दानिय्येल में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी (दानिय्येल 1:20; 5:11-14; 6:3-4), परन्तु अन्यजातियों में समझ नहीं है (रोमियों 1:31)।

विवेक और समझ आपके प्राण को बचाए रखेंगे और आपके जीवन की रखवाली करेंगे। ये पवित्र बुद्धि के पहलू हैं जो आपको मूर्खतापूर्ण त्रुटियों, दुष्ट मनुष्यों, और पाप से बचाएंगे। वे आपको आत्मिक और सांसारिक दोनों ही प्रकार की सब मुसीबतों से बचाएंगे। वे आपको शांति, सुरक्षा, सफलता और सुख देंगे। इनके बिना जीवन कठिन और संकटों से भरा है (नीति 13:15; 22:5)।

उन्हें पाना आसान है बशर्ते आप खुद को परमेश्वर के वचन की शिक्षा में लगा देते हैं। आपको ऐसी किसी कलीसिया में नियमित रूप से जाना आवश्यक है जहां परमेश्वर के वचन की शिक्षा ईमानदारी और नियमित रूप से दी जाती हो, और साथ ही ज़रूरी है कि आप स्वयं भी व्यक्तिगत अध्ययन, मनन, प्रार्थना और पढ़ाई में अपने को समर्पित करें। और फिर आप जो भी ज्ञान प्राप्त करते हैं उसका आपको अपने जीवन की परिस्थितियों में व्यवहारिक उपयोग करना है जिन्हें परमेश्वर आपके जीवन में ले आएगा (इब्रानियों 5:12-14)।

परमेश्वर ने आपके जीवन को दुख, संकट, और कठिनाईयों से बचाए रखने के मार्ग दिए हैं। उसने आनंद और सफलता के लिए निर्देश दिए हैं। आप जिस परिश्रम से अपने शरीर और धन की आप रक्षा करते हैं, क्या आपने उसी परिश्रम के साथ इन दोनों बातों को पाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया है? सुनिश्चित करें कि आप जीवन में बड़ी सफलता पाने के लिए परमेश्वर और सुलैमान की प्राथमिकताओं को अपनी प्राथमिकताएँ बना रहे हैं।

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