नीतिवचन 2:1
हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचनों को ग्रहण करेगा, और मेरी आज्ञाओं को अपने पास छिपा रखेगा; (केजेवी)
यहाँ यहोवा के भय को समझने और परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने की दो शर्तें दी गई है (नीति 2:5)। इस नीतिवचन में वर्णित ये दो लक्षण बुद्धिमान मनुष्यों को मूर्ख मनुष्यों से अलग करते हैं; वे धर्मी मनुष्यों को अधर्मी मनुष्यों से अलग करते हैं। पाठक, आप स्वयं का आत्म-परिक्षण करें यह आपके लिए महत्वपूर्ण है, ताकि बुद्धि की प्राप्ति के लिए यह निर्धारित कर सकें कि आप में ये दोनों गुण हैं या नहीं, और आप इन दोनों शर्तों को पूरा करने में सक्षम हैं या नहीं।
इस नीतिवचन के संदर्भ में सुलैमान ने अपने पुत्र के लिए बुद्धि की छह शर्तें सूचीबद्ध कीं (नीति 2:1-5)। परमेश्वर ही बुद्धि देता है। इसे पाने के लिए, आपको उसकी शर्तों को पूरा करना होगा (नीति 2:6-9)। यदि उच्च शिक्षा की अधर्मी शिक्षण संस्थाएं अपनी ईश्वर-रहित मूर्ख बातों को सिखाने के लिए पहले से ही शर्तें रख सकती हैं, तो फिर अवश्य है कि ईश्वरीय बुद्धि की प्राप्ति के लिए प्रस्तुत इन शर्तों पर आप ध्यान दे, और उन्हें पूरा करने के लिए परिश्रम करें।
“यदि तू मेरे वचनों को ग्रहण करेगा” यह पहली शर्त है। बुद्धि पाने के लिए किसी और की शिक्षा को सुनना आवश्यक होता है। यदि आपको लगता कि आप पहले से ही बुद्धिमान हैं, तो आप दूसरों से सीखने के लिए अपने आप को दीन नहीं करेंगे। सीखने के लिए ज़रूरी है कि आप में सिखने की भावना हो, आप शिक्षा को ग्रहण करनेवाले हो। अधिकांश मनुष्य अपनी बुद्धि को लेकर घमंडपूर्ण रूप से भ्रम में होते हैं, इस कारण जब कोई और उन में सुधार लाने या उन्हें सिखाने का प्रयास करता है, तब वे उन का विरोध करते हैं।
सुलैमान ने अपने पुत्र से अनुरोध करके समझाया कि वह नम्र होकर अपने पिता की श्रेष्ठ बुद्धि और अनुभव से शिक्षा प्राप्त करे। जो कोई पुत्र बुद्धिमान बनना चाहेगा, उसे इसी चेतावनी पर ध्यान देना ज़रूरी है। युवावस्था की पापपूर्ण मूर्खता के कारण प्रत्येक पीढ़ी अपने माता-पिता की बुद्धि को ठुकरा देती है। पिता की बुद्धि परिमाण और श्रेणी में उस के पुत्र से बहुत अधिक होती है।
सब प्रकार के ज्ञान के लिए शिक्षा आवश्यक होती है, फिर भी मनुष्य को दूसरों से शिक्षा सुनना मुश्किल लगता है। उन्हें लगता हैं कि उन के विचार दूसरों से बेहतर हैं। वे सुनना नहीं, पर पढ़ाना अधिक पसंद करते हैं। उन्हें सवाल करना, वाद-विवाद करना, बहसबाजी करना, या विरोध करना ज्यादा अच्छा लगता है। कुछ ही ऐसे कुलीन और समझदार लोग होते हैं जिन्हें सुनना और शिक्षा को ग्रहण करना अच्छा लगता है। सब प्रकार की उन्नति के लिए परिवर्तन आवश्यक होता है, पर फिर भी बहुत कम लोग होते हैं जो दूसरों की शिक्षा के द्वारा बदलाव के लिए इच्छुक होते हैं।
बिरिया के मनुष्यों ने बड़े ही तत्पर मन से प्रेरित पौलुस की शिक्षा को ग्रहण किया, इस कारण पवित्र आत्मा ने उन्हें कुलीन मनुष्य कहकर उनकी प्रशंसा की (प्रेरितों के काम 17:11)। कुरनेलियुस पतरस से वे सब बातें सुनने के लिए समर्पित हुआ जो जो बातें पतरस उसे सिखाने जा रहा था (प्रेरित 10:33)। और लुदिया ने फिलिप्पी में एक नदी के किनारे पौलुस की कहीं बातों पर मन लगाया (प्रेरितों के काम 16:14)। हे प्रभु परमेश्वर, सुननेवाले ऐसे और मनों को तैयार कर!
“और मेरी आज्ञाओं को अपने पास छिपाए रखेगा” यह दूसरी शर्त है (नीति 2:1)। एक बार जब आपको कुछ सिखाया जाता है, उसके बाद आपको इसे अपने चित्त में रखना है। बहुत से लोग अद्भुत बातें सुनते तो हैं, परन्तु सुनी हुई बातें उनके खाली दिमाग के ऊपर ही से चली जाती हैं; उन बातों को वहा चिरस्थाई रूप में ठहरने का स्थान नहीं मिलता। जब आप परमेश्वर के वचनों को स्मरण रखने के लिए उन पर गहराई से मनन करते हैं, तब आप उन्हें अपने पास छिपाते हैं (भजन 1:2; 119:11; लूका 2:19, 51)।
सुलैमान ने शिक्षा मानने के इस नियम को कई बार दोहराया (नीति 3:1; 4:4; 6:20; आदि)। आप जो जो अच्छी बातें सुनते हैं, उन्हें यूं ही लुप्त न होने दे (इब्रानियों 2:1-3), अन्यथा आपको उनसे कोई लाभ न मिलेगा (1 कुरिं 15:2), और आप इस लापरवाही के परिणामस्वरूप परमेश्वर के न्याय को भुगतेंगे। पौलुस ने इब्रानियों को फिर से सुसमाचार के मूल सिद्धांतों को सुनने की उनकी आवश्यकता के लिए फटकार लगाई (इब्रानियों 5:12-14)। दाऊद ने कहा, “मैं….स्मरण करूंगा” (भज 77:10-11)। इसी प्रकार, आप को भी यही कहना चाहिए! चौकस रहो और सुनी हुई बातों को अपने मन में रखनेवाले बनो!
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