नीतिवचन 19:22
मनुष्य कृपा करने के अनुसार चाहने योग्य होता है, और निर्धन जन झूठ बोलनेवाले से उत्तम है।
यह सोच है जो मायने रखती है! यह कहावत आपने पहले भी सुनी होगी। इसका मतलब यह है कि किसी दूसरे व्यक्ति के लिए कुछ अच्छा करने की सच्ची इच्छा उतनी ही अच्छी या बेहतर है जितना उसे वास्तव में करना, विशेषकर ऐसी परिस्थिति में जब कोई व्यक्ति चाहते हुए भी उस अच्छे काम का बोझ सह नहीं कर सकता।
यह अस्पष्ट नीतिवचन एक अनमोल रत्न है; क्या आप इसे से शिक्षा पाएंगे? बहुत से लोग इससे नहीं सीखना चाहेंगे; और इसके बावजूद वे बाइबल की यह कहकर आलोचना करेंगे कि यह समझने में कितना कठिन है। सुलैमान की चेतावनी पर ध्यान दें: ये नीतिवचन आपके चरित्र और विवेक को चुनौती देने वाली गहन बातें हैं (नीतिवचन 1:1-6; 24:10; 2 तीमुथियुस 2:15)।
जैसा कि कई नीतिवचनों के साथ है, यहाँ भी एक तुलना की जा रही है। निर्धन मनुष्य झूठ बोलनेवाले मनुष्य से उत्तम है। यदि निर्धन व्यक्ति झूठा है तो वह किसी भी झूठे व्यक्ति से अच्छा नहीं है, क्योंकि निर्धन होने का अर्थ धर्मी होना नहीं है। परन्तु एक निर्धन मनुष्य जो सच्चाई से किसी पर कृपा करने की इच्छा रखता है, वह उस धनवान मनुष्य से बेहतर है जो अपने स्नेह और सद्भावना का दावा तो करता है परन्तु वास्तव में कभी कुछ नहीं करता।
आपके जीवन में ऐसे कई लोग रहे होंगे जो आपके लिए कुछ अच्छा करना चाहते रहे होंगे, फिर भी आप जानते थे कि उन्हें खर्च का बोझ नहीं उठाना चाहिए, क्योंकि वे आर्थिक रूप से संपन्न नहीं थे। हो सकता है कि बाहर खाने के लिए जाने पर आपने स्वयं ही खाने के बिल का भुगतान किया हो, जैसे किसी रेस्तरां में रात के खाने के लिए, और उन्हें यह कहा हो कि वे आपको खाने पर लेकर आना चाहते थें बस उतना ही काफी था। कृपा का ऐसा आदान-प्रदान ही इस नीतिवचन का अर्थ और उद्देश है।
मनुष्य दयालु और मददगार बनने की इच्छा कर सकता है, लेकिन इससे आगे कुछ नहीं कर पाता, क्योंकि उसके पास कोई प्रयोजन नहीं है। फिर भी ऐसे लोग भी हैं जिनके पास बहुत कुछ करने का प्रयोजन तो होता है, पर फिर भी वे केवल खोखले दावें या वादे करने से ज्यादा कभी कुछ नहीं करते। यद्दपि इन दोनों में से एक निर्धन है, फिर भी वह मन का धनवान है; और यद्यपि दूसरा बड़ा धनवान है, उसका दुष्ट मन उपहार देने और भाईचारे की कृपा से रहित है। वह झूठा और लोभी है।
बहुत से लोग धर्मी होने के बड़े-बड़े दिखावे करते हैं, लेकिन कितने लोग हैं जिन्होंने दाऊद के समान परमेश्वर के लिए मंदिर बनाने की कोशिश कीं है (2 शमूएल 7:1-5; 2 इतिहास 6:7-9)? परमेश्वर ने दाऊद की ऐसी इच्छा को ही पर्याप्त माना और उसे इसका प्रतिफल दिया, हालाँकि उसने दाऊद को यह मंदिर बनाने नहीं दिया। जवाब में, दाऊद ने मंदिर के लिए दान दिया। उस अति कंगाल विधवा पर भी विचार करें, जिसने अपनी सारी कमाई परमेश्वर को दे दी (लूका 21:1-4)।
जो दूसरों पर कृपा करने की बात तो करते हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं करते उनके विषय में परमेश्वर यह कहता है: “यदि कोई भाई या बहिन नंगे–उघाड़े हो और उन्हें प्रतिदिन भोजन की घटी हो, और तुम में से कोई उनसे कहे, “कुशल से जाओ, तुम गरम रहो और तृप्त रहो,” पर जो वस्तुएँ देह के लिये आवश्यक हैं वह उन्हें न दे तो क्या लाभ?” (याकूब 2:15-16)। कितना शर्मनाक झूठ है!
दयालु होने की केवल एक इमानदारीपूर्ण और सच्ची इच्छा ही परमेश्वर या पुरुषों की दृष्टी में मायने रखती है। ईमानदारी को कैसे मापा जा सकता है? आसान है! जब आपके पास प्रयोजन थे तो आपने कृपा दिखाने के लिए क्या क्या किया? अब आप अपने प्रयोजनों को लेकर कितने उदार हैं? आपका आचरण कितना अनुग्रहपूर्ण है?
यहाँ ये सबक हैं: (1) जब भी आप दूसरों को कही बाहर खाने पर ले जाए तो यदि आप सक्षम हैं तो बिल का भुगतान खुद ही करें; (2) हमेशा दूसरों की मदद करने की इच्छा रखें, भले ही आपके पास कोई प्रयोजन न हों; (3) उन लोगों के प्यार को पहचानें जो ईमानदारी से कृपा करने की इच्छा रखते हैं और कृपा करने का भी प्रयास करते हैं, लेकिन ऐसा करने के प्रयोजनों की उनके पास कमी है; (4) कुछ अच्छा करने की कामना करना, लेकिन वैसा करने में सक्षम न हो पाना ताकद होते हुए भी कुछ भी न करने से कहीं अधिक बेहतर है।
यदि आप वह परोपकारी व्यक्ति हैं जिसका इस नीतिवचन में वर्णन किया गया है जो दूसरों पर कृपा करने की इच्छा रखता है, तो ध्यान रखें कि परमेश्वर को और दूसरों को देना आपको और कड़ी मेहनत करने का सबसे बड़ा प्रोत्साहन देता है। आपकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी हो जाने के बाद, और कौन-सा मकसद बराबरी कर सकता है? यदि परमेश्वर ने आपको क्षमताएं और अवसर दिए हैं, तो आप जो कर सकते हैं, उसे कमाए और फिर उसे दूसरों के साथ बाटें।
परमेश्वर अनन्त धन की प्रतिज्ञाओं के सम्बन्ध में जो निश्चित रूप से सच हैं, पूरी तरह से विश्वासयोग्य और सच्चा है। वह इस नीतिवचन के अनुसार करने में बहुत आगे निकल जाता है, क्योंकि इच्छा और उपलब्ध प्रयोजन ही एक सच्चा परोपकारी बनाते हैं। देखो, यीशु ने किस प्रकार स्वयं को प्रतिबद्ध किया, “मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते तो मैं तुम से कह देता; क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ” (यूहन्ना 14:2)। आमीन।
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