नीतिवचन 19:19
जो बड़ा क्रोधी है, उसे दण्ड उठाने दे; क्योंकि यदि तू उसे बचाए, तो बारम्बार बचाना पड़ेगा।
कुछ लोग झगड़ा करने या परेशानी खड़ी करने से बाज नहीं आते। जब भी आप उन्हें देखते हैं, वे किसी न किसी से वाद विवाद या झगड़ा कर रहे होते हैं। यदि आप उन्हें एक झगड़े से बाहर निकालते हैं, तो वे अगले ही दिन किसी और झगड़े में फंस जाते हैं। वे गर्म स्वभाव के होते हैं और अपनी भावनाओं को वश में नहीं रख पाते, इसलिए उनके लिए कोई उम्मीद नहीं है। उनका जीवन हमेश किसी न किसी झंझट भरा रहता है, उनके रिश्ते टूट जाते हैं, मित्र उन्हें छोड़ जाते हैं और फिर अन्त वे अकेले मर जाते हैं।
इस नीतिवचन का सबक समझने में बिलकुल सरल हैं। सबसे पहले, यदि आप अपने क्रोध को वश में नहीं रखते हैं, तो परमेश्वर और मनुष्य आपको आपके गुस्से के लिए दंडित करेंगे। जो बुद्धिमान है वह मान लेता है कि वह एक गुस्सैल स्वभाव वाला व्यक्ति है, वह छुटकारे के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करेगा, और जो जो नीतिवचन क्रोध पर शिक्षा देते हैं, उनपर चिंतन करेगा और उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करेगा। दूसरा, यदि आप किसी गर्म स्वभाव वाले व्यक्ति की किसी झगड़े से निपटाने में मदद भी करते हैं, तौभी आपको अगले ही दिन उसकी किसी और झगड़े से छुड़ाने फिर से मदद करनी होगी, क्योंकि वह दूसरों के साथ मिल-जुलकर रहना सीख ही नहीं सकता। उसकी स्वार्थी भावना और क्रोधी स्वभाव किसी न किसी मामूली बात पर फिर से फूट पड़ेगा।
क्रोध करना अच्छा नहीं है और न ही गुस्सा करना अच्छा है। यह मर्दानगी या अधिकार का प्रतीक नहीं है। यह व्यक्ति के बलवान होने प्रमाण नहीं है – यह एक कमज़ोर मूर्ख व्यक्तित्व का प्रमाण है (सभोपदेशक 7:9)। जो कुलीन और पराक्रमी है वह अपनी आत्मा को वश में रखता है और अपने क्रोध पर नियंत्रण रखता है; मूर्ख अपनी भावना के चलाएँ चलते हैं और क्रोध उन्हें अपने वश में रखता है। क्रोध अँधा कर देता है और गुलाम बना देता है, इसलिए एक क्रोधी व्यक्ति को उसके क्रोध के कारण होने वाली परेशानी से बाहर निकालने में मदद करना इस बात की कोई निश्चयता नहीं देता कि वह लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा; वह शीघ्र ही क्रोध करके फिर से पाप करेगा।
क्रोध हिंसक भडकाव या आग है। यह भावनात्मक ज्वालामुखी है जो किसी मूर्ख के दिल में तब फूटता है जब वह नाराज होता है या जब चीजें उसके तरीके से न हो। यह एक भयानक बुराई है। क्रोध के कारण आप अपने विचारों, जीभ और अपने कर्म से अनेक पाप कर बैठते हैं। यीशु जानता था कि हत्या की जड़ यही है, इसलिए उसने अनुचित क्रोध की यह कहकर भर्त्सना कीं कि यह परमेश्वर की दृष्टि में हत्या है (मत्ती 5:21-22)। क्रोधी मनुष्य को बहुत-से पापों के लिए दोषी ठहराया जाएगा (नीतिवचन 10:12; 12:16; 14:17; 15:18; 17:19; 22:24-25; 26:21; 29:22; 30:33)।
जब आप की पहचान का कोई व्यक्ति अपनी आत्मा को वश में रखना नहीं सीख लेता है, तो आपको उसके क्रोध के कारण उठनेवाले झगड़ों से उसे बार-बार बचाना पड़ता है (नीतिवचन 27:3)। उससे निपटना एक बोझ है, क्योंकि आपको लगातार उसकी मूर्खतापूर्ण क्रोधी भावनाओं को दबाना या सुधारना ज़रूरी बन जाता है। आज अगर आपने उसके गुस्से के कारण पैदा हुई किसी मुसीबत से छुडा भी लिया, तौभी आपका यह काम कल किसी काम नहीं आएगा – क्योंकि वह ऐसा दोबारा करेगा। बुद्धिमान व्यक्ति क्रोधी लोगों से दूर रहता है, क्योंकि वे ऐसे मित्र हैं जो ज्यादातर समय आपकी परेशानियों का कारण बनते हैं (नीतिवचन 13:20; 21:24; 22:24-25; 29:22)।
क्रोध से नफ़रत करना सीखें, क्योंकि आप उसे सम्भाल नहीं सकते (नीतिवचन 27:3-4)। क्रोध आपके पापी शरीर और पुराने मनुष्यत्व का काम है, न कि परमेश्वर की संतान के नये मनुष्यत्व का (इफि 4:31; कुलुस्सियों 3:8)। अपने आवेग को धीमा करें, विशेष रूप से क्रोध को (नीतिवचन 16:32)। बलवान लोग क्रोध से बचते हैं (नीतिवचन 19:11)। केवल मूर्ख ही अपने ख्रोध को फटने देते हैं (सभो 7:9)। क्रोध पर शीघ्र काबू पाना और झगड़ों को समाप्त करना सीखें, क्योंकि अनसुलझा क्रोध शैतान को जगह देता है (इफि 4:26-27)। इसके बजाय कृपा से प्रीति रखें (नीतिवचन 3:3; 21:3; मीका 6:8)।
प्रेम करना सीखें, जो कि आपके प्रति परमेश्वर का सबसे बड़ा अनुग्रह है, और सबसे बड़ी कृपा जो आप दूसरों को दिखा सकते हैं (1 कुरिन्थ 13:4-7,13)। यह अनंत जीवन और आपके जीवन में परमेश्वर की उपस्थिति का सबसे बड़ा प्रमाण है। प्रेम आपको लंबे समय तक धीरज धरना, सहन करना, और कष्ट सहना सिखाता है और शक्तिशाली बनाता है; यह आपको संयम सिखाता है। परमेश्वर प्रेम है। क्या आप परमेश्वर को जानते हैं (1 यूहन्ना 4:7-8,16)? यदि आप परमेश्वर को जानते हैं, तो आप अपने जीवन से दूसरों के प्रति क्रोध के बजाय प्रेम को दिखाएंगे।
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