नीतिवचन 19:11
जो मनुष्य सद्बुद्धि से काम लेता है, वह विलम्ब से क्रोध करता है; दूसरे के अपराध को भुलाना, उसको शोभा देता है।
ये एक शानदार नीतिवचन है। इसमें दूसरों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने के लिए लगनेवाली बुद्धि की कुन्जी है। यह सच्चे प्रेम और करुणा के एक प्रमुख पहलू को परिभाषित करता है। यह मनुष्य के चरित्र को सुशोभित कर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाएगा।
क्योंकि कोई न कोई आज आपको ठेस ज़रूर पहुँचाएगा, इस कारण आज आप के पास शोभाएमान बनने का सुअवसर है। परमेश्वर की बुद्धि से प्राप्त विवेक के इस्तमाल से, आप दूसरे पर क्रोध करना टाल सकते हैं और अपने विरुद्ध उसके अपराध को नज़रअंदाज कर सकते हैं। आप उनकी ओर दूसरा गाल फेर सकते हैं, उसके भड़काऊ आचरण को नजरअंदाज कर सकते हैं, चिडचिडाहट को नजरअंदाज कर सकते हैं और क्रोध के बजाय प्रेम और करुना का मार्ग चुन सकते हैं। लेकिन ऐसा वास्तव में केवल वही ख्रिश्चन लोग करेंगे जो पवित्र आत्मा के सिखाए हुए और चलाए चलते हैं, जो महान कहलाएंगे।
सद्बुद्धि वह है जो जानती है कि किसी भी अवसर पर केवल सही कार्रवाई कब और कैसे करनी है। ‘भुलाने’ का अर्थ है किसी चीज़ को टालना, अभिव्यक्ति में विलंब करना या स्थगित करना। जब कोई आपको ठेस पहुँचाता है तो दिव्य सुबुद्धि क्रोध करने में धीर होने या क्रोध पूरी तरह रोक देने का चुनाव करती है। यह सद्गुण एक बुद्धिमान व्यक्ति, दयालु और सौम्य आत्मा की पहचान है। यह ख्रिश्चन परिपक्वता का प्रतीक है, क्योंकि केवल दुष्ट मूर्ख ही तुरंत पलटवार करते हैं।
अधिकांश लोग, जब दूसरे लोग उन्हें आहत करते हैं, तो शत्रुता से भर जाते हैं, आहत होना चुनते हैं, क्रोधित हो जाते हैं, पीछे से वार करते हैं और प्रतिशोध लेने की साजिश रचते हैं। उनके पास कोई विवेक या सुबुद्धि नहीं है, क्योंकि ज़ज्बात ही उनके दिमाग पर राज करते हैं। वे क्रोध को टालना नहीं जानते, क्योंकि आहत होते ही वे पहले और शीघ्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, और फिर अपनी प्रतिक्रिया के बारे में बाद में सोचते हैं, कि काश मैं धीरज धरता। यह एक घमंडी और कुटिल भावना का प्रतीक है (नीतिवचन 16:28; 28:25), जो बुद्धि-ज्ञान और करुणा की भावना के सर्वथा विपरीत है।
क्रोध एक अस्थायी मानसिक विक्षिप्तता है, और इसकी अंगारपूर्ण और जल्दबाजी वाली प्रतिक्रिया के आगे झुकना निश्चित रूप से आपको अपराध का गलत आकलन करने और उस अपराध अनुपात में जवाबी कार्रवाई करने का कारण बनेगा (नीतिवचन 14:17)। एक बार जब कोई अपराध लड़ाई-झगड़े और कलह में तब्दील जाता है, तो एक ऐसा युद्ध शुरू होता है जो आसानी से समाप्त नहीं होता (नीतिवचन 17:14; 18:19)। अपना मानसिक सन्तुलन कायम रखने के लिए, किसी भी अपराध पर कार्यवाही करने से पहले सद्बुद्धि से काम लेना ही बुद्धिमानीपूर्ण फैसला है।
क्रोध अगर फट न पड़े तो जल्दी ही शांत हो जाता है; यह क्रोध जल्द ही हवा में भाफ बनकर उड़ जाएगा। हम अपने विरुद्ध किए गए किसी भी अपराध को अगले दिन मुश्किल से ही याद रख पाते हैं। लेकिन इस लाभ को पाने के लिए दो चीजों की आवश्यकता होती है – पहला, आपको अपना क्रोध फुट पड़ने से रोकना होगा, और दूसरा, दूसरों के अपराधों को क्षमा करने में जो ख़ुशी मिलती है आपको उसे विकसित करना होगा। अपने क्रोध को टालना सीखें (नीतिवचन 14:29)।
आपको एक ऐसा भाव चुनना होगा जो बुद्धि, ज्ञान, शांति और प्रेम का मार्ग चुनकर, आपको चोट पहुंचाने वालों को माफ करने में गौरव और बडप्पन महसूस करे (नीतिवचन 17:9; 1 कुरिन्थ 13:4-7; याकूब 3:17)। वह भावना जो त्वरित प्रतिशोध लेने या प्रतिकार करने में गौरव और बडप्पन महसूस करे वह नरक से है (याकूब 3:14-16), और आपको इसे दुत्कारना होगा और तुच्छ समझना होगा। मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति ऐसी है कि वह अपनी गलतियों को तुरंत मानने और उन्हें सुधारने में खुद को नीचा महसूस करता है, परन्तु यह दुष्टता है। इसके बजाय दया, शांति और प्रेम को चुनें।
इस नीतिवचन में वर्णित अपराध आपके विरुद्ध किसी का व्यक्तिगत अपराध हैं। यह नीतिवचन आपको यह नहीं सिखा रहा कि आप परमेश्वर या न्यायप्रिय सरकार या कर्तव्यपरायण अधिकारी के विरुद्ध कियें पापों को नज़रंदाज़ करें, या उनसे समझौता करें। अभिभावक अधिकारी, लोकतांत्रिक सरकार और नियोक्ताओं को हर हाल में क़ानून और नियम लागू करने होंगे। यहां जिस अपराध की बात हो रही है वह गुंडों और दुष्ट लोगों के अपराधों से छोटे अपराध हैं जो आपको व्यक्तिगत रूप से परेशान करते हैं और आपकी भावना को भडकाते हैं। जब यीशु ने दूसरा गाल आगे करना सिखाया, तो उसकी इस आज्ञा का अभिप्राय केवल ऐसे छोटे, व्यक्तिगत अपराधों से था।
यह एक अद्भुत नीतिवचन है, सर्वश्रेष्ठ नीतिवचनों में से एक। यदि इस की सिख पर लगातार अमल किया जाए, तो मित्रो और रिश्तेदारों के साथ व्यक्तिगत संबंध उत्तम होंगे और मानव-समाज सुखी और फलद्रुप होगा। यही सच्चा प्रेम और दोस्ती है। जो पति-पत्नी अपने वैवाहिक जीवन में इस नियम का पालन करेंगे उनका जीवन यकीनन सुख, शान्ति और समृद्धि से भरा होगा। इस सुबुद्धि को काम में लानेवाली कलिसियाएँ आनंद और आत्मा से भरपूर की जाएँगी। यदि हर कोई व्यक्तिगत अपराधों को नजरअंदाज कर दे और दूसरों को माफ करने के सौभाग्य का चुनाव करें , तो जीवन क्या ही शानदार हो सकता है, और होगा ही।
परन्तु अभिमान मनुष्य को विलम्ब से क्रोध करने से रोकता है। वह अपनी काल्पनिक श्रेष्ठता की रक्षा करने और अपनी आहत भावनाओं को शांत करने के लिए तुरंत बदला लेने के लिए हमला करता है। क्योंकि वह खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है, इसलिए उसे लगता है कि वह अपने हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य है। एक आगबबूला चेहरा प्रगट होता है, मुँह से तीखे शब्द फटने लगते हैं, बेतहाशा आलोचनाएँ की जाती हैं, और मारपीट की भी नौबत आ जाती है। वह घमण्ड की गिरफ़्त में फंसा मूर्ख है। सुलैमान घमंड की पहचान अपराधी के रूप में करने में इतना आश्वस्त था कि उसने कहा कि घमंड ही सब लड़ाई-झगड़े का एकमात्र कारण था (नीतिवचन 13:10)।
परमेश्वर की बुद्धि कभी नहीं बदलती। यीशु ने मत्ती 5:38-48 में इस नियम को स्पष्ट रूप से सिखाया, जहां उन्होंने अपने व्यक्तिगत शत्रुओं के सामने दूसरा गाल फेरने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब बुराई आपके प्रति व्यक्तिगत अपराध हो तो उसका विरोध न करें। उन्होंने कहा कि अपने निजी शत्रुओं का भला करो। यह मिलमिलाप करानेवाले धर्मीजनों का मार्ग है, और वे इसमें अत्यंत बलवान बनते जाते हैं। वे क्षमा करने में अपना गौरव मानते हैं, और शत्रुओं को क्षमा करने में भी वे गौरवान्वित होते हैं। वे परमेश्वर के सच्चे पुत्र हैं।
पतरस, जो अक्सर उतावला शिष्य था, उसने यीशु से पूछा कि उसे अपने उस भाई को जो बार बार उसके विरुद्ध अपराध करता है, कितनी बार क्षमा करना चाहिए। वह सात बार माफ़ करने की सीमा तय करना चाह रहा था, जिसके बाद वह बदला लेने को उचित ठहरा सकें, लेकिन यीशु ने पतरस के स्वाभाविक विवेक से कहीं ऊपर, सात गुना को सत्तर गुना बढ़ा दिया (मत्ती 18:21-35)। फिर भी मसीह की सामर्थ से, आप इतने धर्मनिष्ठ और नीतिमान बन सकते हैं (फ़िलि 4:13)।
दुनिया इस नीतिवचन की बुद्धि और समझ से अनभिज्ञ है। दुनिया उन लोगों का सम्मान करती है जो अपराधों को बर्दाश्त नहीं करते, ऐसे लोगों का सम्मान करती है जो अपने शत्रुओं पर हमला करने में तेज़ी से और अधिक ज़ोर से सक्रीय होते हैं। लोग उन पुरुषों का महिमामंडन करते हैं जो हिंसक तरीके से जवाबी कार्रवाई करते हैं और अंतिम प्रत्युत्तर या अंतिम प्रहार करते हैं। हॉलीवुड हो या बॉलीवुड, वे शैतान के साथ मिलकर आपके गिरे हुए चरित्र की नीच वासनाओं की संतुष्टि के लिए ऐसे मूर्ख और क्रोधी लोगों का महिमामंडन करते हैं।
लेकिन परमेश्वर के पराक्रमी वे लोग वे हैं जो करुणा करने को प्रिय जानते हैं और व्यक्तिगत अपराधों को नजरअंदाज कर देते हैं और उन्हें लगी चोट या हानि को भुला सकते हैं (मीका 6:8; 1 कुरिन्थ 6:1-8)। परमेश्वर ऐसे लोगों पर अपनी दया दिखाएगा और उन्हें महान बनाएगा, जिस प्रकार उसने शाऊल के साथ किए गए व्यवहार के लिए दाऊद को महान बनाया था (भजन 18:19-26)। जब दाऊद को परमेश्वर की दया की आवश्यकता पड़ी, तब उसपर दया की गई, क्योंकि उस ने दूसरों पर दया की थी।
ख्रिश्चन धर्म क्षमा का धर्म है, क्योंकि यह परमेश्वर और दूसरों के साथ मनुष्य के रिश्ते की आधारशिला है (मत्ती 6:14-15; इफिसियों 4:31-32; कुलुसियों 3:12-13)। अपने विरुद्ध दूसरों के व्यक्तिगत अपराध की प्रतिक्रिया देते समय क्रोध में आकर जबाबी कार्यवाही करने की तुलना में को क्षमा करने के लिए कहीं अधिक विनम्रता और सद्चरित्र की आवश्यकता होती है। ईश्वरीय बुद्धि और शक्ति शीघ्रकोपी भावना पर क़ाबू पाने की इच्छाशक्ति और क्षमता है (नीतिवचन 16:32; याकूब 1:19-20)। जो लोग सोचते हैं कि अपराधों को क्षमा करना कमज़ोरी, डर और समझौते की निशानी है, तो वे भ्रमित मूर्ख हैं।
जब यहोवा परमेश्वर ने मूसा पर अपनी महिमा प्रगट की, तब “यहोवा उसके सामने होकर यों प्रचार करता हुआ चला, ‘यहोवा, यहोवा, ईश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य’” (निर्गमन 34:6)। देखें कि हमारे परमेश्वर की महिमा कैसी है। उसकी दया, कृपा, सहनशीलता, अच्छाई और सच्चाई! आप उसके समान कितने धर्मपरायण हैं?
आज दूसरे लोग आपके साथ कैसा व्यवहार करते हैं, क्या इससे आप आहत होंगे। एक पापी दुनिया में यह होना ही है। आपके पास बुद्धि, ज्ञान, अनुग्रह और महिमा का अपने जीवन में व्यावहारिक उपयोग करने के कई अवसर होंगे। क्या करेंगे आप? जब आपको अवसर मिले तो क्या आप में क्रोध में धीमे होकर अपने जीवन में प्रभु यीशु मसीह की कृपा का प्रदर्शन करेंगे? या क्या आप आत्मरक्षा में मौखिक या शारीरिक रूप से जवाबी हमला करेंगे?
प्रभु यीशु मसीह की कृपा और सामर्थ्य आपको उसकी आत्मा और वचन से इस नीतिवचन का पालन करने के लिए प्रेरित करें। बुराई को अच्छाई से जीतो! दुनिया आपके दया और क्षमा के अच्छे कार्यों को देखे, और आपके कार्यों में वृद्धि हो और परमेश्वर का राज्य बढ़ता जाए। आमीन!
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