नीतिवचन 19:10
जब सुख से रहना मूर्ख को नहीं फबता, तो हाकिमों पर दास का प्रभुता करना कैसे फबे!
मूर्ख लोग कृपा, स्वतंत्रता या पुरस्कार पाने के लायक नहीं होते हैं; यह उनके लिए उचित या सही नहीं है (नीतिवचन 26:1)। बल्कि बुद्धिहीन मनुष्य या वह जो अपनी भावना पर क़ाबू नहीं रखता है, उसे फटकार लगाकर दंड देना चाहिए (नीतिवचन 18:6; 19:19; 26:3)। मूर्खों को कोई आनंद या विशेषाधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि अगर उन्हें सम्मान और आनंद दिया जाए तो इससे वे अपनी मूर्खता में बने रहने के लिए और भी प्रोत्साहित होंगे (नीतिवचन1:32; 10:13)।
यह तब और भी बुरा बन जाता है जब कर्मचारी अपने मालिकों से मिली स्वतंत्रता का ग़लत फायदा उठाते हैं या नागरिक अपने शासकों के साथ कुछ ज्यादा ही घुलने-मिलने लगते हैं। कर्मचारियों और नागरिकों को अपनी जगह पता होनी चाहिए, उन्हें अधीनस्थ की अपनी भूमिकाओं का निर्वहन करते रहना चाहिए, और उनके ऊपर जो अधिकारी नियुक्त है उसके प्रति समर्पित रहना चाहिए, जब तक कि उनका ग़लत फायदा उठाकर उनका आर्थिक और मानसिक शोषण नहीं किया जा रहा है। जो लोग अपने स्थान को छोड़ जाते हैं उनकी तुलना परमेश्वर और सुलैमान ने उस चिड़िया से की जो अपने घोंसले से उड़ती फिरती है, जिससे उसकी ही बहुत हानि होती है (नीतिवचन 27:8)।
सुलैमान इस्राएल का अच्छा राजा था, और इन नीतिवचनों के उपयोग से उसने बुद्धि की शिक्षा दीं। अगर देश में बुद्धि की वृद्धि करनी है, तो मूर्खों का सम्मान करने की अपेक्षा उन्हें फटकारना और दण्ड देना अवश्य है। यदि इस दस्तूर को परम्परा के रूप में अमल में नहीं लाया जाता है, तो मूर्खता ग्रहणीय बन जाएगी, और यहाँ तक कि उसे पुरस्कृत भी किया जाएगा, जो किसी भी राष्ट्र के गौरव और विकास को नष्ट कर देगी। इसके अलावा, देश की सम्प्रभुता के मौलिक सम्मान के लिए अवश्य है कि सेवक और शासक बिना किसी भ्रम के अपने अपने कर्तव्यों और भूमिकाओं का निर्वहन करें।
मूर्खों का सम्मान करना और उन्हें स्वतंत्रता या आनंद देना हास्यास्पद है। मूर्खता तिरस्कार-योग्य और धिक्कार-योग्य होती है, इसलिए मूर्खों का तिरस्कार किया जाना चाहिए और उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। इसे छोड़ कोई भी अन्य सहनशीलता मूर्खों को उनकी मूर्खता में और भी अधिक प्रोत्साहित करती है और जो बुद्धि की खोज करते हैं उन्हें हतोत्साहित करती है। इससे पूरे देश को एक गलत संदेश जाता है, खासकर युवा और संवेदनशील लोगों को। मूर्खों को दण्ड देना उत्तम है, क्योंकि देखने वालों पर इसका अद्भुत असर पड़ता है (नीतिवचन19:25; 21:11; व्यवस्था 13:6-11; 21:18-21; 1 तीमु 5:20)।
हमारा देश मूर्खों और मूर्खता की प्रशंसा करता है। अभिनेता और अभिनेत्रियां, जो समाज के सबसे कामुक और सबसे निकम्मे सदस्य हैं, उन्हें सितारे कहा जाता है, और इस मूर्ख पीढ़ी के आदर्श कहलाते हैं। खेल-जगत की हस्तियों को बच्चों द्वारा नायकों के रूप में पूजा जाता है। रैप को संगीत कहा जाता है और स्कूलों तथा कॉलेजों में इसकी अनुमति दी जाती है। क्या सही है और क्या ग़लत इसके सम्बन्ध में विश्वविद्यालय के छात्रों की राय ली जाती है, जो अपनी व्यक्तिनिष्ठ परिभाषा देकर सही को ग़लत और ग़लत को सही कहते हैं। जुआ को एक वैध अवकाश के रूप में स्वीकार किया जाता है। समलैंगिकता को विकसित आदर्शों की संस्कृति कहा जाता है। व्यभिचार को प्रेम-सम्बंध कहा जाता है।
टेलीविज़न पर फूहड़ कॉमेडी करना एक पेशा बन गया है, जहाँ नैतिकता और धार्मिकता का मज़ाक उड़ाया जाता है। रैप करनेवाले और व्यभिचार करनेवाली मशहूर हस्तियां युवाओं के आदर्श बन गए हैं। अनैतिकता नैतिक मूल्यों पर हावी हो गई है। बच्चे माता-पिता का मज़ाक उड़ाते हैं और उनकी नीतियों और वसूलों के ख़िलाफ बग़ावत करते हैं। नाईट क्लब्स, ड्रग्स और उच्च समाज में देह-व्यापार चलनेवाले मालिकों को समृद्ध और इज्ज़तदार बना दिया जाता है। मित्रों और भाइयों की संगती के स्थान नशे और वेश्यावृत्ति के अड्डे बन गए हैं। स्टेज शो करनेवाले गवैये और नचनिएँ आज़ादी की एक विक्षिप्त परिभाषा में “साड्डा हक, एथे रख” बोलकर सामाजिक मूल्यों से बग़ावत करते हैं, और युवाओं को भड़काकर दिशाहीन करते हैं।
क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि युवाओं में जिस परिपक्वता और समझदारी की उम्मीद कभी उनकी किशोरावस्था में ही की जाती थी वह अब उनमें 30 वर्ष की आयु में भी कही नज़र नहीं आती है, कि मानों लुप्त हो गई हो? क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि जब लोग आपस में मिलतेजुलते हैं तब उनकी बातचीत फिल्मों, टीवी शो या खेल पर केंद्रित होती है? व्यभिचार से भरी फिल्में और सट्टे तथा चीयर-लीडर्स के नंगे नाच से भरा खेल-जगत देश के लिए कैंसर हैं जो विवेक और समय को चरानेवाले दो सबसे निकम्मे चोर हैं। कलीसियाओं के पुलपिट पर से चुटकुले बोलना आम हैं। बाइबल का त्याग कर चुके पश्चिमी देशों में विषमलैंगिक विवाह और तलाक के विरोधी विवाहित माता-पिता लगभग लुप्त होते जा रहें हैं, और युवाओं में प्यार-मोहब्बत के नाम पर बिना विवाह यौनाचार को बढ़ावा देनेवाले वैलेंटाइन-डे और नाकारा अप्रैल-फूल दिवस राष्ट्रीय आनंद बन गएँ हैं। अमेरिका में क्रिश्चन मूल्यों को ताक पर रखकर मूर्खता का सम्मान किया जाता है, और बाकी दुनिया भी उनकी नकल करने के लिए दौड़ पड़ी है। यह देखकर सुलैमान भयभीत हो जाता। परमेश्वर उनपर क्रोधित है। ऐसे में, भारत के मसीहियों का कर्तव्य है कि वे अपने देश के लिए प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार की ज्योति के वाहक बनें।
किसी भी देश के विकास या किसी भी संस्था की सफलता के लिए नीतिमान शासक और उनके प्रति अवाम का समर्पण नितांत आवश्यक है। यदि सत्ता के खिलाफ बग़ावत छिड़ जाए, तो जल्द ही सभी स्तरों पर और सत्ता के सभी क्षेत्रों में अराजकता मच जाएगी। अमेरिका के स्कूलों, घरों और अन्य संस्थानों में वर्तमान अव्यवस्था और कुसक्रियता इन्हीं सब बातों के नतीजों के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
कर्मचारियों को बाइबल में सेवक कहा गया है। नियोक्ताओं को स्वामी कहा गया है। सरकार के शासकों को हाकिम कहा जाता है। अब तक के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति, राजा सुलैमान ने अपना जीवन इस बात पर विश्लेषण करने समर्पित कर दिया कि मानवता के लिए क्या अच्छा और सही है। जब उसने देखा कि मूर्खों की बड़ी प्रतिष्ठा की जाती है, धनवानों का तिरस्कार किया जाता है, हाकिमों को अपनी बात मानने के लिए विवश किया जाता है, और सेवक अपने प्रधानों से लाभ उठाते हैं, तब इन सब बातों ने उसे दुःखी बना दिया (सभोपदेशक 10:6-7)।
उन बातों की सूची बनाते समय जो समाज को संकट में डालती और जो वास्तव में असहनीय हैं, उसने ऐसे दासों को सूचीबद्ध किया जो राजा बन जाते हैं, या प्रभावशाली पदों पर बैठाएं जाते हैं (नीतिवचन 30:21-23)। यह मूर्खता कहाँ से शुरू होती है? उसने देखा है कि यह भयानक ग़लती इसलिए हुई क्योंकि शासकों ने इसे होने दिया (सभोपदेशक 10:5)। यह अगुओं की गलती है कि उन्होंने अपने अधिकार पर प्रश्न उठने दिएँ, विरोध करने दिया या और स्वयं को उखाड़ फेंकने दिया। केवल सेना के पास ही थोड़ा बहुत अधिकार बरकरार है जिसके पीछे कुछ स्वाभाविक कारण हैं।
न्यायप्रिय अधिकारीयों को सभी क्षेत्रों में सभी स्तरों पर पुन:स्थापित करके उन्हें नीतिपूर्ण शासन के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए अन्यथा देश की नैतिक और आर्थिक स्थिति में गिरावट जारी रहेगी। इस सुशासन की शुरुवात घर से होती है, जहां परमेश्वर की व्यवस्था के पालन की मिसाल स्थापित की जानी चाहिए और उसकी शिक्षा देनी चाहिए। पत्नियों को अपने पतियों की बात माननी चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए (इफिसियों 5:22-24,33)। बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए (इफिसियों 6:1-3)। पिताओं को अपने नियोक्ताओं (1 पतरस 2:18-21), पास्टर (इब्रा 13:17), और अधिकारियों (1 पतरस 2:13-17) का सम्मान करना चाहिए। क्या ये विचार पुराने जमाने के हैं? बिलकुल हैं! ये परमेश्वर के वचन के प्राचीन मार्ग हैं, जिसकी हमें खोज करनी ज़रूरी है (यिर्मयाह 6:16; यहूदा 1:3)!
बुद्धि को मूढ़ता से सर्वश्रेष्ठ स्थान देने और उसका प्रचार करने के लिए आप क्या करेंगे? मूर्ख को कोई आनन्द मत दो, क्योंकि वह इसके योग्य नहीं; आनन्द उसके टेढ़े मन को और अधिक भ्रष्ट करेगा, और उसकी मूर्खता को बढ़ावा देगा। परमेश्वर द्वारा नियुक्त अधिकार को बढ़ावा देने के लिए आप क्या करेंगे? क्या आप खुशी-खुशी और पूरी तरह से उनके प्रति समर्पित होंगे जिन्हें परमेश्वर ने आपके ऊपर रखा है, चाहे माता-पिता, पति, नियोक्ता, पास्टर, या सरकार? क्या आप सत्ता में बैठे लोगों का उनके और उनके विरोधियों के साथ मतभेद की परवाह किए बिना बचाव और समर्थन करते हैं? आप यह परिवर्तन ला सकते है!
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