नीतिवचन 18:9

जो मनुष्य अपने काम में सुस्ती करता है, वह मानो काम बिगाड़नेवाले का भाई है।

लोग आर्थिक रूप से असफल होते हैं इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला कारण यह कि, कुछ आलसी होते है- वे अपने काम या व्यवसाय में उतने मेहनती या ज़िद्दी नहीं होते हैं जितना उन्हें होना चाहिए। वे अपने जीवन-काल में उतना रुपया नहीं कमा पाते जितना वे कमा सकते थे। अगर आप उनकी औसत कमाई पर गौर करें, तो बहुत कम है। जब उनमें ताकत और क़ाबलियत के साथ साथ पैसा बनाने के अवसरों की भरमार भी होती है, तब वे ज्यादा से ज्यादा मेहनत करने में असफल रहते हैं। कई वर्ष बीत जाने के बाद भी ये लोग पर्याप्त कमाई नहीं कर पाते हैं।

दूसरा कारण यह है कि कुछ लोग कड़ी मेहनत तो करते हैं और बहुत सारा पैसा भी कमाते हैं, लेकिन उनकी जेब में इतना बड़ा छेद होता है कि वे अपनी इस मेहनत की बड़ी कमाई को अपने हाथों से बर्बाद कर देते हैं। वे मूर्खतापूर्ण आर्थिक फैसलें लेकर जोखिम उठाते हैं या ऐयाशीपूर्ण विलासिता में इसे खर्च कर देते हैं। अगर आप उनकी कमाई का हिसाब लगाएं और जितना टैक्स वे भरते हैं उस पर गौर करें, तो वह बहुत अधिक है। चरित्र और अनुशासन में कमज़ोर होने के कारण – वे सट्टेबाज़ी, जुआ, या खर्च करने के विलासितापूर्ण प्रलोभन का विरोध नहीं कर सकते। क्योंकि वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ऐयाशी पर बर्बाद कर देते हैं, इसलिए वे आर्थिक रूप से आगे भी नहीं बढ़ पाते।

आलसी लोग जो अपनी थोडीसी कमाई और कम संपत्ति का सावधानी से उपयोग करते हैं, अक्सर उन ऐयाश लोगों की संगति से किनारा करते हैं जो बड़ा पैसा कमाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। तो वही, मेहनती लोग जो अपनी कमाई को ऐयाशी में बरबाद कर देते हैं और उड़ा देते हैं, अक्सर आलसी लोगों की सुस्त फितरत से बचते हैं जो उनसे अधिक अपव्ययी हो सकते हैं। लेकिन ये दोनों भाई-भाई हैं! क्या आप सुलैमान की ठट्ठा को समझ पा रहें हैं? ये दोनों दोष पाप हैं; दोनों दोष वित्तीय संकट का कारण बनते हैं; दोनों दोष शर्मसार और नामधराई कराते हैं। ये दोनों तरह के मनुष्य ज़िन्दगी से हारे हुए होते हैं।

यदि एक मेहनती व्यक्ति मूर्खतापूर्ण खतरें उठाता है और कमाई को उड़ाकर अपनी अधिक उत्पादकता को केवल बर्बाद कर देता है, तो उसका कठोर परिश्रमी होने का कोई मतलब नहीं है। और यदि सक्षम और काबिल व्यक्ति इतना आलसी है कि अपने कार्यकाल में कोई तरक़्क़ी नहीं कर पाता है, तो धन प्रबंधन का कोई मतलब नहीं है। ये दोनों मनुष्य भाई-भाई हैं! वे एक ही परिवार से आते हैं – वित्तीय और व्यावसायिक समस्याओं से घिरा परिवार। वे दोनों ज़िन्दगी हारे हुए हैं।

पाठक, आप किस प्रलोभन का सामना कर रहें हैं? क्या आप अपनी मौजूदा क्षमता, ऊर्जा और उपलब्ध सारे अवसरों के बावजूद बहुत कम काम कर रहे हैं? ज़रूरत से ज्यादा खर्च कर रहें हैं? या दोनों? इन दोनों में से कोई भी आर्थिक दोष आपको नुकसान पहुंचाएगा। ज़रा ठहरें और आज ही अपनी मूर्खता पर विश्लेषण करें। किसी और में दोष ढूँढकर उससे नफ़रत करने खुद की हालत का बचाव करने के बजाय, उस व्यक्ति की प्रशंसा करें जिसमें आप जैसा दोष नहीं है। एक बदलाव करें। और कड़ी मेहनत करें। खर्च कम करें। इन दोनों चीजों पर अमल करें। यह आपकी वित्तीय समृद्धि के लिए सुलैमान की कलम के माध्यम से स्वर्ग से प्रेरित बुद्धि और ज्ञान है।

मेहनती लोग कड़ी मेहनत करते हैं। वे एक ज़िद्दी मानसिकता के साथ खुद को परिश्रम में लगा देते हैं। वे अपने काम-धंदे और पेशे में तेजी से आगे बढ़ते हैं; उनकी कमाई का स्तर ऊँचा है। लेकिन वे जीवनयापन के ऊँचें खर्च या बढ़ती महंगाई को लेकर हमेशा शिकायत करते हैं, जबकि वास्तविक समस्या जीवनयापन के ऊँचें खर्च या बढ़ती महंगाई नहीं, बल्कि उच्च जीवन-शैली का उनका चुनाव और उसपर लगनेवाला खर्च है। वे अत्यधिक खर्च करके अपनी मेहनत की कमाई को बर्बाद कर देते हैं (नीति 12:27; 21:17,20; 23:20-21)। वे मूर्खतापूर्ण निवेश के ज़रिए भी अपनी संपत्ति खो देते हैं (नीति 6:1-5; 28:19-20,22)। सुलैमान ने दोनों प्रकार की बर्बादी की भर्त्सना की।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक मेहनती व्यक्ति कितना कमाता है। कमाई वित्तीय समीकरण का केवल आधा हिस्सा है। यह पता लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह अपनी कमाई को कैसे निवेश या खर्च करता है। अच्छी-खासी कमाई भी मूर्खतापूर्ण निवेशों या फिजूलखर्ची के माध्यम से बहुत जल्दी गायब हो सकती है। वित्तीय सफलता के लिए जो बात बहुत मायने रखती है वह यह कि महीने के सभी खर्चों के बाद कितना पैसा बचता है – पैसा बचाना भी पैसा कमाना ही है जिसे हम जमापूंजी कहते है – आर्थिक शक्ति का वास्तविक माप यही है। आलसी कामगार और फिजूलखर्ची करनेवाला, दोनों ही हमेशा आर्थिक घाटे में ही रहते हैं।

पाप के कारण पथभ्रष्ट हो चुकें अधिकांश मनुष्य जिनमें दूरदर्शिता की कमी होती है, वे कमाई बढ़ने के साथ-साथ खर्च भी उसी तेजी से बढ़ाते हैं। अर्थशास्त्री इस मानसिकता को उपभोग की स्वाभाविक-प्रवृत्ति कहते हैं। सुलैमान ने ऐसी बड़ी कमाई का मज़ाक उड़ाया जो केवल वित्तीय विवरणों में दिखाई देती है और उच्च जीवनशैली के बड़े बड़े खर्चों का भुगतान करने में शीघ्र ही गायब हो जाती है (सभोपदेशक 5:11)। यदि आप इस वर्ष 50% अधिक कमाते हैं, और फिर आप 50% अधिक खर्च भी करते हैं, तो आपकी कमाई में वह जो 50% बढ़ोतरी हुई है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपने अपनी मेहनत का दायरा और साथ ही ज्यादा पैसा कमाने का जोखिम किसलिए बढ़ाया? बस अल्पकालिक विलासिता का आनंद उठाने और सरकार को अधिक कर देने?

केवल एक मूर्ख ही कमाई के अनुपात में महीने का खर्च को बढ़ाकर अपनी कमाई को बर्बाद कर देता है (नीति 21:17,20)। उग्र लोग धन को नहीं खोते, क्योंकि वे उन विज्ञापनों के हथकंडों के जाल में फंसने से बचते हैं जो उनकी वासनाओं को लुभाते हैं, या जल्दी-जल्दी अमीर बनानेवाली घोटालेबाज़ योजनाओं से उन्हें रिझातें हैं (नीति 11:16)। उन्हें इसकी परवाह नहीं कि मिस्टर और मिसेज जोन्स की उच्च जीवनशैली क्या और कैसी है। उनके पास अपनी एक वित्तीय योजना है – वे इसके लिए कड़ी मेहनत करते हैं – और वे ऐसा कोई मूर्खतापूर्ण खर्च या निवेश नहीं करेंगे जो उनकी मेहनत की कमाई को चुरा ले जाए।

जो लोग सतर्क होते हैं वे विवेक से काम लेते हैं। वे एक एक पैसा बड़ी सावधानी से खर्च करते हैं। वे अधिकांश निवेशों से बचते हैं, क्योंकि उन्हें किसी चीज़ पर भरोसा नहीं होता। वे मोलभाव करते हैं; वे कम खर्च में जीते हैं। वे जोखिम नहीं उठाते; वे थोड़े में ही संतुष्ट और खुश रहते हैं; वे एक-एक पैसा बचाते और जमापूंजी को बढ़ाते हैं। लेकिन फिर भी इनमें एक खामी यह होती है कि उनके पास अक्सर बहुत कम होता है, क्योंकि वे कड़ी मेहनत का प्रतिफल नहीं समझते हैं (नीति 10:4; 12:11,27; 13:4; 20:4,13; 22:29)। न ही वे बुद्धिमान निवेश के महान लाभ को समझते हैं (नीति 14:4)। वे काम पर भी वही कंजूस मानसिकता अपनाते हैं – वे धीमी गति से चलते हैं और बिना जुनून के काम करते हैं। वे हारे हुए हैं।

ये दोनों गुणदोष मनुष्य से उसकी सफलता छीन लेते हैं। क्या आप अपने काम में सुस्त हैं? या अपने कमाई के स्रोत की वृद्धि को व्यर्थ कर देते है, बढ़ी हुई कमाई को उड़ाकर? या आप दोनों बातों के दोषी हैं? इन दोनों दोषों से नफ़रत करो – क्योंकि वे एक ही प्रवृत्ति की मूर्खता से युक्त पाप हैं। अपने काम में मेहनती और जोशीला रहो; खर्च करने में कंजूस रहें, और कुछ भी बर्बाद न करें (नीति 12:27)। सफलता और समृद्धि जटिल या कठिन नहीं हैं, यदि आप यहां पर प्रस्तुत ईश्वर-प्रेरित बुद्धि और ज्ञान को सीखते हैं, इसे अभ्यास में लाते हैं, और इसके पुरस्कारों की प्रतीक्षा करते हैं।

सुलैमान ने दो और आर्थिक नियम सिखाये जो यहाँ बिलकुल सटीक बैठते हैं। उन पर समझदारी से विचार करें। वित्तीय सफलता के लिए अवश्य है कि आप परमेश्वर के भण्डार में उदारतापूर्वक डाले और पेशा केवल वही चुने जो जायज और उसकी दृष्टि में स्वीकार्य है (नीति 3:9-10; 11:24-26; 19:17; 28:27; हाग्गै 1:2-11)। आपकी समृद्धि में उचित निवेश करना, परमेश्वर से आशीष पाना और आपातकाल के लिए बचत करना भी शामिल है (नीति 6:6-8; 14:4; 21:20; 30:25)। यदि ये दो अतिरिक्त नियम सत्य हैं (और वे हैं!), तो आपको उन्हें करने में सक्षम होने के लिए और भी अधिक कमाना होगा और कम खर्च करना होगा, इस प्रकार इस नीतिवचन का ज्ञान अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। परमेश्वर, आपका बहुत धन्यवाद!

यह नीतिवचन आपकी आत्मा पर भी लागू होता है। आलसी ख्रिश्चन लोग शायद ही कभी फल लाते हैं या अपने जीवन में परमेश्वर की कृपा का लाभ प्राप्त कर पाते हैं (लूका 8:11-12; 13:6-9; 19:23-27)। वे उन्हें अपने जीवन में मिला परमेश्वर को जानने और उसे प्रसन्न करने का अवसर गँवा देते हैं। अपव्ययी ख्रिश्चन लोग को वचन सुनते हैं और सुनकर आनन्दित होते हैं और सक्रिय भी हो जा सकते हैं, लेकिन वे इस दुनिया की चीजों के पीछे भागकर अपना जीवन बर्बाद करते हैं (लूका 18:14; फिल 3:18-19; 1 तीमु 6:6-10)। प्रेरित पौलुस ऐसा नहीं था – उसने अपनी पूरी शक्ति से यीशु की सेवा की, और उसने दूसरों के समान अपने जीवन से कोई खिलवाड़ करके एक भी दिन बर्बाद नहीं किया (1 कुरिन्थ 15:10; 2 तीमु 4:7)। उसके उदाहरण का अनुसरण करें।

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