नीतिवचन 18:8

कानाफूसी करनेवाले के वचन स्वादिष्ट भोजन के समान लगते हैं; वे पेट में पच जाते हैं।

कानाफूसी पाप है, और यह क्रूर और पीड़ादायक पाप है। किसी व्यक्ति के बारे में झूठी बातें, और अगर कुछ ग़लत खबरें सच भी हो, फैलाने से उसकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल सकती है, बदनामी हो सकती है, और दूसरों के साथ मित्रता टूट सकती है। सच्चा प्रेम गलतियों और नाकामियों पर पर्दा डालता है; किसी की गलतियों और नाकामियों का ढिंढोरा पीटना नफरती दुष्टता है। गुप्त बातों को केवल अपने तक रखकर और जो लोग बदनामी करने का मौका देखते हैं, उन्हें को चुप कराकर दूसरों की इज्ज़त की रक्षा करें।

परमेश्वर को कानाफूसी करनेवाले से नफरत है, क्योंकि कानाफूसी करनेवाला किसी अन्य व्यक्ति के बारे में ऐसी बातें फैलाता है जिन्हें निजी रखा जाना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बातें सच हैं या नहीं। यदि वे सत्य नहीं हैं, तो बताना निन्दा है; यदि वे सच हो भी, तो यह कानाफूसी करना है। जब तक किसी व्यक्ति का मामला इतना गम्भीर न हो जिसका खुलासा करने के लिए खुद परमेश्वर कहता है या किसी अधिकारी को बताना अति आवश्यक होता है, तब तक नकारात्मक बातों को दबा कर रखें।

कानाफूसी करनेवाले दूसरों के बारे में निजी ख़बरें फैलाते हैं; ऐसे लोग क्रूर और दुष्ट होते हैं। परमेश्वर ने इस नीतिवचन को इतना महत्वपूर्ण माना कि इसे उसने दोहराया है (नीतिवचन 26:22)। नियम को जानें। सुलैमान ने यह भी लिखा, ” जो लुतराई करता फिरता वह भेद प्रगट करता है, परन्तु विश्वासयोग्य मनुष्य बात को छिपा रखता है” (नीतिवचन 11:13)। और, ” जो लुतराई करता फिरता है वह भेद प्रगट करता है; इसलिये बकवादी से मेल जोल न रखना” (नीतिवचन 20:19)।

बीते ज़माने में घरों और स्कूलों में कानाफूसी और झगड़ा करने पर सज़ा दी जाती थी, क्योंकि मनुष्य एक समय परमेश्वर के नियम को जानते थे। 1531 ईसा पूर्व में मूसा द्वारा की गई व्यवस्था में “लुतरा बनके अपने लोगों में फिरनेवाले की निंदा की गई है। (लैव्य 19:16)। बाइबल में कानाफूसी करना, चुगली करना, पीठ पीछे किसी की बुराई करना और बुदबुदाना सब एक जैसे पाप है, चार पाप जिनकी दुष्टता के रूप में निंदा की गई है (नीतिवचन 16:28; 26:20-26; भजन 15: 3; रोमियों 1: 29-30; 2 कुरिन्थ 12: 20; 1 तीमु 5:13)।

माँएँ अपने बच्चों से कहती थीं, “यदि तुम किसी के बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो उसके बारे में कुछ भी न कहें।” यह उस पीढ़ी की बहुमूल्य सलाह है जो परमेश्वर से डरती थी और बाइबल की समझ रखती थी, और वही से बुद्धि प्राप्त करती थी। यदि दूसरों के बारे में केवल अच्छी और सकारात्मक बातें फैलाई जाती थी, तो ज़रा सोचिए कि यह परिवारों, व्यवसायों, चर्चों और राष्ट्रों के लिए कितना प्रेमपूर्ण और एकजुट करने वाला रहा होगा!

जो मनुष्य निजी गलतियाँ करता है, पाप करता है, या कोई घटना उसके जीवन में घटित होती है, तो उन बातों को इधर-उधर फैलाने से उस मनुष्य की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचती है; यह सुनने वाले व्यक्ति को भी दुख पहुँचाता है, क्योंकि इससे उसके मित्र के बारे में उसकी राय को कलंकित हो जाती है। इस पाप के नतीजें, जो आज बहुत ही आम हो गया है, बहुत विनाशकारी होते हैं और वे नतीजें गहरे घाव देते हैं और लंबे समय तक रहते हैं। इससे पहुँचनेवाली चोट और पीड़ा इन्सान को अन्दर तक, मन और आत्मा में, ज़ख़्मी कर देती हैं (नीतिवचन 20:27,30)।

एक बार जब आप किसी की गुप्त जानकारी को दुनिया के सामने प्रकट कर देते हैं, उसके बाद आप क्या कर सकते हैं? अपने इस अधर्म को सुधारना लगभग असंभव हो जाता है। एक बार जब आपके मुँह से मूर्खतापूर्ण या दुर्भावनापूर्ण शब्द निकल जाते हैं, फिर उसके बाद आप उन्हें वापस नहीं ले सकते। जिन लोगों ने आपको सुन लिया होता है वे आपकी कही गई बात को पूरी तरह भुला नहीं सकते, चाहे आप उन्हें कितना भी प्रयास करने के लिए कहें। आपने दूसरे के चरित्र और प्रतिष्ठा को मलिन कर दिया है; आपने दूसरों के बारे में निजी जानकारी प्रकट करके मित्रता या एकता में दरार डाल दी है। यह पाप है!

यह पाप मानो किसी पुरुष या महिला के नाम और व्यक्तित्व का बलात्कार करना है, जिसका ज़ख्म ज़न्दगीभर बना रह सकता है, इसलिए बाइबल अक्सर इसके खिलाफ चेतावनी देती है। उत्तम चरित्र का यह पाठ सीखो और कभी इसका उल्लंघन मत करो। कभी भी दूसरों के बारे में कुछ भी आलोचनात्मक न कहें, जब तक कि आपको उचित या आधिकारिक कारणों से ऐसा न करना पड़े। दूसरों के बारे में सकारात्मक बातें सोचें, ताकि नकारात्मक शब्द कभी बाहर न आएं (मत्ती 12:34-37)।

दूसरों के बारे में निजी जानकारी बताना आज एक आम और स्वीकार्य बात हो गई है। इसे आज के सनसनीखेज गोदी मीडिया में समाचार रिपोर्टिंग की आड़ में महान उपलब्दी कहकर सम्मानित किया जाता है। आज ऐसे रेडियो और टेलीविजन कार्यक्रम और इंटरनेट साइटें हैं जो लोगों, खासकर सत्ता में बैठे किसी विशिष्ठ पार्टी लोगों, और विपक्ष के बारे में अफवाहें और ग़लत खबरें फैलाने के लिए समर्पित हैं। यह इस नफ़रती पीढ़ी के प्रमुख लक्षणों में से एक है।

कानाफूसी करनेवाला लोगों की गुप्त बातें बताता है (नीतिवचन 11:13; 20:19)। चाहे पुरुष हो या स्त्री, खबर को अपने तक ही सीमित नहीं रख पाते। वह किसी अन्य व्यक्ति के चरित्र और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने या अपनी अधर्मी भूख को संतुष्ट करने और अपनी सोसाइटी में एक ‘जानकार व्यक्ति’ के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए गुप्त बातें फैलाना चाहता है, या चाहती है। दोनों ही मकसद नरक से हैं! यदि आपको किसी अन्य व्यक्ति की इज्ज़त के बारे में कोई चिंता है, तो उसे उसकी गलतियाँ अकेले में बताएं और सुधार करें (नीतिवचन 25:9; मत्ती 18:15)।

यदि कोई व्यक्ति आपकी उपस्थिति में कानाफूसी करने लगे तो आपको क्या करना चाहिए? सुलैमान ने लिखा, “जैसे उत्तरी वायु वर्षा को लाती है, वैसे ही चुगली करने से मुख पर क्रोध छा जाता है” (नीतिवचन 25:23)। आपको सबसे पहले अपने चेहरे पर क्रुद्ध भाव अभिव्यक्त कर उसे यह दिखाना चाहिए कि आपको यह बात बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। यदि इससे काम नहीं होता है, तो उसे बताएं कि वह गलत हैं। लेकिन फिर भी अगर वह अपनी कानाफूसी पर अड़ा रहता है, तो उसे भगा दो, और फिर कभी मत मिलो।

यह नीतिवचन किसी अधिकारी को किसी अपराध या संभावित अपराध के बारे में सूचित करने से मना नहीं करता। संदिग्ध गतिविधियों के बारे में पुलिस को सूचित करना कानाफूसी करना नहीं है। किसी अपराध की जानकारी देना चुगली करना नहीं है। सत्ता में बैठे लोगों को गैर-क़ानूनी बातों की जानकारी देना आवश्यक होता है। अगर आप अपनी जरा भी बुद्धि का उपयोग करें, तो कानाफूसी करने और पुलिस की मदद करने के बीच क्या बड़ा अंतर है उसे आप आसानी से देख सकते हैं (उत्पत्ति 37:2; 1 कुरिन्थ 1:11)।

प्रेम ख्रिश्चन धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है (कुलुस्सियों 3:12-15), और प्रेम केवल वही करेगा जो दूसरों के हित की सोचता है, और प्रेम में किसी के विषय में व्यक्तिगत जानकारी को गुप्त रखना भी शामिल है (नीतिवचन 10:12; 17:9; 1 पतरस 4:8)। दूसरों के प्रति प्रेम, और उनकी प्रतिष्ठा और उनकी मित्रता का ख़याल आपको अपनी ज़ुबान पर लगाम लगाने विवश करने पाए। आपका लक्ष्य उन्हें बर्बाद करना नहीं, बल्कि उनकी ज़िन्दगी बनाना और उनकी उन्नति करना होना चाहिए।

कई लोग ख्रिश्चन होने का दावा करते हैं, लेकिन इसका असली सबूत और प्रमाण शब्दों में नहीं, बल्कि कार्यों में होता है (याकूब 2:14-20)। सच्चा ख्रिश्चन धर्म एक पंथ से अधिक एक जीवनशैली है। और ख्रिश्चन धर्म का सबसे बड़ा प्रमाण विश्वास नहीं, बल्कि प्रेम है (यूहन्ना 13:34-35; 1 कुरिन्थ 13:13)। प्रेम इंसान में सबसे बड़ा बदलाव दिखाता है। परमेश्वर ने कहा कि जो मनुष्य दूसरों से उचित प्रेम करना सीखता है, जैसे कि कभी किसी की चुगली न करना या कानाफूसी न करना, वह उत्तम वरदान की लालसा करता है (1 कुरिन्थ 12:31; 13:1-7)।

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