नीतिवचन 18:7

मूर्ख का विनाश उसके मुँह की बातों से होता है, और उसके होंठ उसके प्राण के लिये फन्दे होते हैं।

किसी भी कीमत पर अपनी जीभ को वश में रखें। अगर आप ज्यादा बोलते हैं तो अपने शब्दों को आधा कर दें। यदि आप कुछ ऐसा नहीं बोल सकते जो सुननेवालों के लिए अनुग्रहपूर्ण या उपयुक्त हो, तो कुछ भी न कहें। मूर्ख अपनी बातों पर नियंत्रण नहीं रख सकता। इस कारण वह कई बार मुसीबत में पड़ जाता है। उसके मुँह के शब्द उसे ही पाप के जाल में फंसा देते हैं। उसके जीवन में ज्यादातर तकलीफें उसकी उन बातों के कारण उठती हैं जिन्हें उसे नहीं कहनी चाहिए थी। अपने होठों को अनुशासन में प्रशिक्षित करना आपको भविष्य की मुसीबतों से बचा सकता है।

राजा सुलैमान ने कम शब्दों में एक शक्तिशाली बात रखने के लिए सरल भाषालंकारों का प्रयोग किया, और इस नीतिवचन में उपलक्षण का। मुंह और होंठ, जहां से बातें निकलती हैं, मूर्ख की बातों की ओर संकेत हैं। शब्द विनाश और फंदा उन तकलीफों और दर्द के लिए रूपक हैं जिन्हें वह खुद पर ले आता है। अपने जीवन को मूर्खों की मुसीबतों से बचाना है, तो अपनी बातों पर नियंत्रण रखना महत्वपूर्ण है (नीतिवचन 12:13; 13:3; सभोपदेशक 10:11-14)।

सुलैमान जानता था कि बेकाबू बातें उसके पुत्र की शांति, प्रतिष्ठा, या सफलता को नष्ट कर सकती है। इस नीतिवचन के संदर्भ में, उसने झगड़े का कारण बननेवाले कलहपूर्ण शब्दों (नीतिवचन 18:6) और दूसरों को चोट पहुँचाने वाली कानाफूसी (नीतिवचन 18:8) के विरोध में चेतावनी दी। उसने कुछ अन्य नीतिवचनों में मूर्खतापूर्ण बातों के फंदे और उसके कारण उठनेवाली मुसीबतों के विरुद्ध चेतावनी दी (नीतिवचन 6:1-5; 10:31; 12:13; 15:28; सभोपदेशक 10:3,12-14)। उसने लगातार चेतावनी दी कि आपके मुँह के शब्द आपके उनके उपयोग के आधार पर या तो जीवन का कारण बनते हैं या मृत्यु का कारण (नीतिवचन 18:21)।

जीभ अक्सर दूसरों को चोंट पहुंचाती है, लेकिन यह नीतिवचन दिखाता है कि बोलनेवाले को ही चोंट पहुँचती है। शाऊल और हेरोदेस ने अपनी मूर्खतापूर्ण बातों के द्वारा अपने ही प्राणों को मृत्यु के जाल में फंसा लिया था (1 शमूएल 14:24-46; मरकुस 6:21-29)। गिदोन ने सुक्कोत के लोगों को उनकी बातों के कारण काँटों के चाबुक से कोड़े मारे, और एलीशा ने 42 बच्चों को उनकी बातों के कारण शाप दिया। दानिय्येल के साथी अध्यक्षों को अपने उपहासपूर्ण बातों की कीमत अपना जीवन खोकर चुकानी पड़ी, और हनन्याह और सफीरा को भी अपनी उन बातों की कीमत चुकानी पड़ी जिन्हें कहने के लिए उन्होंने पहले से ही योजना बनाई थीं।

क्या आप इस नीतिवचन की चेतावनी को समझ रहे हैं? क्या आपने कभी किसी से कठोर और रूखे शब्दों में बातें कीं, और फिर आप को पछताना पड़ा? क्या आपने कभी कुछ ऐसा किया है, और फिर कामना की कि काश आपने वह नहीं किया होता? क्या आपने अपने आप को बचाने के लिए झूठ बोला है, और बाद में केवल यह पाया कि आपके मामले को तो और भी गंभीर रूप से जटिल बना दिया है? क्या आपने कभी किसी से अपमानजनक शब्द कहें हैं और बाद में पछतावे में कामना कीं कि काश आप अपने शब्दों को वापस ले सकें? आप जितना अधिक शब्दों को बोलते हैं, पाप उतना ही अधिक बढ़ता जाता है (नीतिवचन 10:19)। आपको अपने मुंह के हर एक व्यर्थ शब्द का लेखाजोखा देना होगा (मत्ती 12:36)।

आप अपने जीवन को विनाश से बचा सकते हैं। अपनी बातों को कम-से-कम शब्दों में कहें (नीतिवचन 17:27-28)। सुनने में तत्पर बनों; बोलने की भावना पर काबू रखें। सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीरजवान बनों (याकूब 1:19)। दूसरों के बारे में केवल दयालु और सकारात्मक बातें कहें (इफिसियों 4:29)। अपना संभाषण हमेशा अनुग्रहसहित रखों, और जब आवश्यक हो तो केवल कभी-कभार ही आलोचना करें (कुलु 4:6)। मूर्खता की बातों और ठट्ठों को धन्यवाद देने में बदल दो (इफिसियों 5:4)। जो अधिकारी हैं उनके बारे में कभी भी बुरा न बोलें (व्यव. 27:16; यहूदा 1:8)।

परमेश्वर से मदद मांगो। दाऊद ने प्रार्थना की, “हे यहोवा, मेरे मुख पर पहरा बैठा, मेरे होठों के द्वार की रखवाली कर” (भजन 141:3)। और उसने यह भी कहा, ” मेरे मुँह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करनेवाले” (भजन 19:14)। आप मसीह की सामर्थ्य के द्वारा जो आप को उसके आत्मा के कारण है मिली है, अपनी जीभ को अपने वश में रख सकते हैं (फिल 4:13; 2 पतरस 1:3)।

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