नीतिवचन 18:6
बात बढ़ाने से मूर्ख मुक़द्दमा खड़ा करता है, और अपने को मार खाने के योग्य दिखाता है।
मूर्ख बकवादियों की पिटाई होनी ही चाहिए। आपने उनकी बातें सुनी हैं। उनकी बातें आपत्तिजनक होती हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, बहस और वाद-विवाद उनके पीछे-पीछे जाते हैं। क्या आप भी उनमें से एक हैं और उनके समान मूर्खतापूर्ण बकवाद करते हैं? क्या आपके मुँह के शब्द दूसरों को परेशान करनेवाले, चिढ़ दिलानेवाले, निराश करनेवाले और उन्हें भड़काते हैं? बुद्धि और सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपनी जीभ पर कितना क़ाबू रखते हैं।
अगले नीतिवचन पर गौर करें, जो इसी नीतिवचन से संबंधित है। “मूर्ख का विनाश उसकी बातों से होता है, और उसके वचन उसके प्राण के लिये फन्दे होते हैं” (नीतिवचन 18:7)। जो व्यक्ति अपने मुँह पर नियंत्रण नहीं रख सकता, वह अपना ही विनाश कर लेता है। उसका मुँह उसकी जान को चारो तरफ़ से परेशानी में डाल देता है। वह उचित ही मार खाने के योग्य है।
ऐसा मत सोचें कि यहाँ सुलैमान का निष्कर्ष बहुत कठोर है। पिटाई उनकी ही भलाई के लिए है। जो लोग अपने मुँह से शोर मचाते हैं उन्हें चुप कराने के लिए पिटाई ही उचित है जिससे शांति और एकता बढ़ती है। अगर आपको उनमें तरक्की करने की कोई संभावना नज़र आती है, तो पिटाई उन्हें वह तरक्की करने में मदद करती। जब मूर्ख को मार पड़ती है, तो यह सिलसिला ज़्यादा दिन तक नहीं चलता, क्योंकि मूर्ख बारबार की मार से बचने के लिए अपने मुँह पर क़ाबू रखना सिख ही लेता है।
आज एक समस्या तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर घोर गलतफहमी है। परन्तु अपनी मर्जी से कुछ भी कहने का अधिकार किसी को भी नहीं है। यह सभी लोगों की जिम्मेदारी है कि वे केवल वही बातें कहें जो परमेश्वर को प्रसन्न करें और लोगों को लाभ पहुँचाएँ। लेकिन आज लोग एक उंगली के इशारे से, ईमेल या टेक्स्ट या ट्वीट हर जगह अहंकार से भरे शब्द, नफरती बातें और अपमानजनक जवाब भेजते हैं, जो किसी देश की उन्नति के लिए घातक है।
मूर्ख व्यक्ति को दूसरों से सुनने के बजाय अपनी विचारधाराओं को अभिव्यक्त करना ज्यादा अच्छा लगता है, खासकर तब जब उसमें कोई सुधार किया जाए। वह किसी और से मिलनेवाली शिक्षा के सामने खुद को विनम्र करने के बजाय उनसे बहस करना और उनकी बातों का विरोध करना पसंद करेगा। अधिकार और दूसरों के प्रति सम्मान की कमी के कारण, वह तब बोलता है जब उसे चुप रहना चाहिए। उसकी घिनौनी बातें पारिवारिक या सामाजिक टकराव की ओर ले जाती है, और उसकी अनुचित टिप्पणियों के कारण उसकी पीठ खुद ही निमंत्रण देती हैं कि कोई आ कर उसपर डंडे बरसाएं।
यहाँ सुलैमान के नीतिवचन की पुस्तक में एक और आम विषय है – अपनी ज़ुबान पर क़ाबू रखना। जीभ एक शक्तिशाली चीज़ है; इसका उपयोग अच्छे या बुरे, जीवन या मृत्यु के लिए किया जा सकता है (नीतिवचन 18:21)। एक बुद्धिमान व्यक्ति उत्तर देने से पहले बातों को बारीकी से समझता है (नीतिवचन 15:28); वह बोलने में धीमा होता है और ज़रूरत से ज़्यादा नहीं बोलता (नीतिवचन 17:27-28)। लेकिन मूर्ख अपनी मूर्खता प्रकट करता है, जिससे सभी को पता चल जाता है कि वह मूर्ख है (सभोपदेशक 10:3)।
मूर्ख अपने मुँह पर नियंत्रण नहीं रख पाते (सभोपदेशक 10:12-14)। वे बहुत ज़्यादा बोलते हैं। वे बिना सोचे-समझे बोलते हैं। वे झट से जवाब देते हैं। वे तब बोलते हैं जब उन्हें नहीं बोलना चाहिए। वे आग से आग बुझाने का प्रयास करते हैं। वे मुद्दों को सुनने से पहले ही उनका जवाब देते हैं (नीतिवचन 18:13)। वे दूसरों के लिए अपमानजनक और चिड़चिड़े होते हैं। वे उन चीज़ों पर सवाल उठाते हैं जिन पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए; वे ऐसे शब्दों पर बहस करते हैं जो किसी लाभ के नहीं होते।
मूर्खों में विवेक नहीं होता। वे नहीं जानते कि अलग-अलग स्थितियों के लिए अलग-अलग शब्दों और लहज़ों की ज़रूरत होती है। वे सिर्फ़ मौखिक रूप से आगे बढ़ते हैं, जैसे कि चीनी मिट्टी के बर्तनों की दुकान में बैल। बातचीत के दौरान उनका झगड़ालू दृष्टिकोण आक्रामक और टकरावपूर्ण होता है, जिसके परिणामस्वरूप दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचती है, विवाद और कलह उत्पन्न होते है। वे झगड़े पैदा करते हैं, और वे मार खाने के ही योग्य हैं।
सुलैमान ने बताया कि कोमल उत्तर देने से गुस्सा ठण्डा हो जाता है और झगड़े मिट जाते हैं (नीतिवचन 15:1)। बाइबल में वर्णित गिदोन नाम के व्यक्ति को ऐसी बुद्धि का पता था, क्योंकि जब एप्रैम उससे इस बात को लेकर क्रोधित हुआ कि उसने युद्ध के शुरुआती चरणों में उसे भी शामिल क्यों नहीं किया तब उसने उसके क्रोध को दूर करने के लिए बड़ी कोमलता और मीठे स्वर में उत्तर दिएँ (न्यायियों 8:1-3)। बुद्धिमान लोग इस तरह के विवेक को जानते हैं, लेकिन मूर्ख इसे कभी नहीं सीख सकते। मूर्ख को सिखाने का एक ही तरीका है – छड़ी से कोड़े मारना (नीतिवचन 26:3)।
माता-पिता, क्या आप लगातार और लगन से अपने बच्चों को संयमित वाणी के नियम सिखाते हैं? यह बहुत ही मूल्यवान चीज है जो आप उन्हें सिखा सकते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, चाहे वह शादी हो या उनकी व्यावसायिक सफलता या चर्च में भूमिका, उसके लिए शांतचित्त और विचारशील वाणी की आवश्यकता होती है। आप हर दिन उनके साथ हैं; आप इस नीतिवचन के प्रति अपनी भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें भाई-बहनों के साथ झगड़ा या बहस करने, बातचीत पर हावी होने, मज़ाक करने या आपसे बदतमीजी से बातें करने की अनुमति न दें।
अगर आप ख्रिश्चन हैं तो सुन लें, ख्रिश्चन समाज के लोग हमेशा मीठी बाते बोलते हैं (कुलुस्सियों 4:6; इफिसियों 4:29)। यदि आलोचना करना आवश्यक भी हो, तो वे चन्द शब्दों में बोल देते है। खुली बहस और झगड़ा गलत है (1 तीमुथियुस 6:3-5; तीतुस 3:9)। ख्रिश्चन लोग किसी भी बात पर बड़बोलेपन को अस्वीकार करते हैं। जब आप एक बार किसी मूर्ख को सुधार देते हैं, तो उसके बाद आपको कोई और शब्द बोलने की ज़रूरत नहीं है (नीतिवचन 26:4-5; 23:9)। उसे अपने विनाश की खाई में गिरने दो (मत्ती 7:6; 15:12-14)।
लेकिन हर काम में दखलंदाजी करना मूर्खों की फितरत होती है। उन्हें हर बात पर सवाल उठाना अच्छा लगता है। वे हर मुद्दे पर बहस करना चाहते हैं। वे आपत्ति जताना चाहते हैं। वे अपनी राय रखना चाहते हैं। वे दूसरों की पिछली गलतियोंको याद रखना चाहते हैं। वे विवरण को सही करना चाहते हैं। वे दूसरों के बारे में कानाफूसी करना चाहते हैं।
वे अशिष्ट, बदतमीज और अहंकारी होते हैं। वे आलोचनात्मक और नकारात्मक होते हैं। वे असभ्य और टेढ़े होते हैं। वे जल्दबाज़ और शोरगुल करने वाले होते हैं। वे आवेगी और अप्रिय होते हैं। वे शालीन और शर्मनाक होते हैं। वे मूर्ख होते हैं – वे विवाद और झगड़े पैदा करते हैं – उठाओ डंडा और लगा दो दो-तीन।
क्या आप उनमें से एक हैं? क्या आप कभी अपने आस-पास के लोगों की शांति भंग करने और अनावश्यक सामाजिक संघर्षों में पड़ने के दोषी हैं – दूसरों के दिमाग में अनावश्यक ज़हर भरते हैं? क्योंकि हर मूर्ख हमेशा अपनी नज़र में सही होता है। क्या आप स्वयं को नम्र बनाएंगे और अपनी बोलने की आदत को सुधारेंगे?
यह संक्षिप्त नीतिवचन कितना महत्वपूर्ण है? इस जीवन के बाद आप को सृष्टिकर्ता परमेश्वर के सामने खड़ा रहना होगा और धरती पर रहते हुए आपने जो जो व्यर्थ का शब्द बोला उस का हिसाब देना होगा – आपकी वाणी आपकी अंतिम नियति को निर्धारित करती है (मत्ती 12:34-37)। तब आप कामना करेंगे कि काश किसी ने आपको मूर्खतापूर्ण बातें बोलने के लिए पीटा होता। उस दिन का इंतज़ार करने के बजाय, क्यों न आज ही इस नीतिवचन के सबक को अपनाकर उस पर अमल करें जिसे परमेश्वर ने अपनी बड़ी करूणा से लिखवाने के लिए सुलैमान की कलम को प्रेरित किया।
परमेश्वर सुलैमान से भी अधिक कठोर है! वह गंदी बोली, मूर्खतापूर्ण बातें या उपहासपूर्ण मज़ाक की मानसिक विकृतियों से घृणा करता है; इसके बजाय वह सब बातों के लिए आभारी रहने के लिए कहता है (इफिसियों 5:4)। वह इन पापों के लिए मनुष्यों का न्याय करने के लिए जल्द ही यीशु मसीह को भेज रहा है। “कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे, क्योंकि इन ही कामों के कारण परमेश्वर का क्रोध आज्ञा न माननेवालों पर भड़कता है” (इफिसियों 5:6)।
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