नीतिवचन 18:3

जहाँ दुष्ट आता, वहाँ अपमान भी आता है; और निरादर के साथ निन्दा आती है।

पापी अपमान लाते हैं। यदि कोई घर, कलीसिया, या राष्ट्र किसी दुष्ट व्यक्ति को स्वीकार करता है, तो उस घर, कलीसिया या राष्ट्र का अपमान होगा। अपकीर्ति, जिसे अपमान और बदनामी कहते है, कलंक लगा देती है। यदि कुख्यात या शर्मनाक आचरण का परित्याग नहीं किया जाता है, तो जल्द ही बदनामी होगी। पापियों से छुटकारा पाना ही सम्माज के तिरस्कार और अप्रतिष्ठा का इलाज है।

इस नीतिवचन को समझना इतना आसान नहीं है। बहुत से लोग बदनामी और अप्रतिष्ठा को शरीफ़ लोगों के खिलाफ दुष्ट व्यक्ति की करतूत के रूप में देखते हैं। उनके विचार में, दुष्ट व्यक्ति भले मनुष्यों और धर्मी प्रथाओं के खिलाफ तिरस्कारपूर्ण रीति से अपमानजनक और द्वेषपूर्ण तिरस्कार लाता है। परन्तु जब सुलैमान ठट्ठा करनेवालों की बदनामी करनेवाली हरकत और नामधराई के विरुद्ध चेतावनी देना चाहता था, तो उसने इसे स्पष्ट रूप से कह दिया (नीतिवचन 9:7-8; 22:10; 23:9)। इसकी एक बेहतर व्याख्या है।

जब दुष्ट व्यक्ति आता है, तो उसके साथ अपमान भी आता है, क्योंकि अपमान दुष्टता करने का नतीजा और प्रतिफल है। लोग दुष्ट व्यक्ति की उपस्थिति को अपनी प्रतिष्ठा के लिए अपमानजनक समझेंगे। जब अपकीर्ति – बदनामी और अप्रतिष्ठा – होती है, तो अपमान भी आएगा, क्योंकि अपमान ऐसे ही आचरण का परिणाम और प्रतिफल होता है। बदनामी, या शर्मनाक स्थिति अपमान करना नहीं होता है, बल्कि अपमान का कारण बनना है।

जब इस्राएल ने परमेश्वर के पवित्र और धर्मपरायण व्यवस्था का पालन किया तब तक वह सभी राष्ट्रों से बढ़कर गौरवशाली था (व्यव. 4:6; 1 राजा 10:6-9; ज़कराया 8:23; मलाकी 3:12)। परन्तु परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की कि यदि वे अपने देश में पाप होने देते हैं तो वे दृष्टान्त और शाप की मिसाल बन जाएंगे (व्यवस्था 28:37; 29:22-28; 1 राजा 9:6-9; भज 44:13-14; यशा 52:5; यिर्म 24:9; विलाप 2:15-16; योएल 2:17; रोमि 2:24)।

बुद्धि और धार्मिकता मनुष्यों और राष्ट्रों के लिए महिमा और सम्मान लाती है (नीतिवचन 1:9; 3:16,22,35; 4:8-9; 8:12-21; 16:31; 21:21; 22:4)। परन्तु मूढ़ता और दुष्टता बदनामी, अपमान और लज्जा लाती है (नीतिवचन 3:35; 11:2; 13:5,18; 24:9; 25:8-10; 28:12)। धर्मीजन नीच लोगों से घृणा करते हैं (भजन 15:4; नीतिवचन 29:27), और परमेश्वर भी उनसे घृणा करता है (नीतिवचन 3:32; 11:20; 15:26; भजन 18:25-27)।

एक अनुग्रहपूर्ण स्त्री, जो हमेशा अनुग्रह और के तालमेल में बोलती और काम करती है, वह हमेशा सम्मानित होती है, क्योंकि उसकी सुखद प्रतिष्ठा को खराब करने के लिए कुछ भी नहीं है (नीतिवचन 11:16; सभोपदेशक 10:1)। परन्तु घिनौनी स्त्री से सब घृणा करते हैं और उसकी निन्दा करते हैं, क्योंकि उसकी घिनौनी बातें और काम छिप नहीं सकते (नीतिवचन 11:22; 27:15-16; 30:21-23)।

पौलुस ने कुरिंथ की कलीसिया को इसलिए कड़ी फटकार लगाई क्योंकि वे कलीसिया में एक व्यभिचारी को बचाने बचा रहें थें (1 कुरिन्थियों 5:1-13)। उन्हें विलाप करना चाहिए था और यीशु मसीह के नाम पर लगे इस कलंक को मिटा देना चाहिए था, क्योंकि विश्वासियों में दुष्टता का नाम एक बार में नहीं लिया जाना चाहिए (इफिसियों 5:3-7)। यह दुष्टों से मुक्त चर्च या राष्ट्र ही है जो सम्मानित और समृद्ध होगा (भजन 144: 9-15)।

सुलैमान एक राजा था, और उसने अपने बेटे को एक अच्छा राजा बनने के लिए प्रशिक्षित किया। यदि दुष्ट लोगों या बदनामीजनक बात को सरकार या समाज में रहने की अनुमति दी जाती है, तो यह राष्ट्र पर अपकीर्ति और अप्रतिष्ठा लाएगा (नीतिवचन 14:35; 20:8,26,28; 29:12)। इसके बजाए, वह इस्राएल के लिए ऐसा सम्मान और महिमा चाहता था जो धार्मिकता और बुद्धि के साथ आती हैं (नीतिवचन 14:28; 16:10,12; 25:5; 29:4,14)।

इस नीतिवचन का पाठ यह है: दुष्ट आचरण परमेश्वर के नाम और धर्म पर अपमान और निरादर लाता है, इसलिए दुष्टता करनेवाले और दुष्टता दोनों को ठुकरा देना और अस्वीकार करना अवश्य है। यदि घरों, चर्चों और राष्ट्रों में यह कदम नहीं उठाया जाता है, तो परमेश्वर के नाम और खरी धर्म-शिक्षा की निन्दा होगी (2 शमूएल 12:14; नेहमा 5:9; 1 तीमु 5:14; 6:1; तीतुस 2:5,8,10; 1 पतरस 2:12; 4:14-16)।

दुष्ट पुरुषों और अपमानजनक आचरण की पहचान करना और उनसे बचना आवश्यक होता है, चाहे घर में हो, चर्च में हो, या देश में (भजन संहिता 101:3-8; 139:21-22; रोमियों 13:1-7; 16:17-18; इफि 5: 11; 2 थिस्स 3:6; I तीमु 6:5; 2 तीमु 3:5; तीतुस 3:10-11)। सुलैमान के राजकुमार पुत्र के समान, आपको परमेश्वर और सच्चाई की महिमा के लिए दुष्टों को चिन्हित करने और उन्हें ठुकराने के लिए किसी भी ताकत का उपयोग करना चाहिए।

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