नीतिवचन 18:23
निर्धन गिड़गिड़ाकर बोलता है, परन्तु धनी कड़ा उत्तर देता है।
प्रत्येक मनुष्य इस संसार में मानों जंगली गदहे के बच्चे के समान जन्म लेता है (अय्यूब 11:12), परन्तु कुछ ही उपलब्धियों के बाद उसे लगता है कि अब वह दूसरों से कड़े स्वर में बातें कर सकता है। निर्धन नरमी से बोलना सीखते हैं और गिड़गिड़ाकर विनती करते हैं, जबकि धनवान अपने अहंकार में आकर उनके खिलाफ कठोरता से बोलते हैं। यह नीतिवचन पाप में मृत स्वाभाविक प्रवृत्तिवाले मनुष्यों के विषय में सच है, परन्तु जब मसीह यीशु में उद्धार पाएं हुओं के आचरण की बात आती है, तो जनमत में उनकी गवाही ऐसी कदापि नहीं होनी चाहिए।
आर्थिक लाभ या हानि लोगों के जीवन को तत्काल प्रभावित करती है। धनवान घमण्डी बन जाते हैं, उनके बहुत मित्र होते हैं, और निर्धनों पर प्रभुता करते हैं (नीतिवचन 14:20; 22:7; 28:11)। वे यह सोचकर बड़े होते हैं कि दुनिया उनके इशारों पर नाचती है। वे खुद को ईश्वर और मनुष्य से स्वतंत्र समझते हैं, इसलिए वे निर्धनों के साथ उन्हें निचा दिखाकर बातें करते हैं। यूसुफ ने अपनी कोमल आत्मा को छिपाए रखने के लिए अपने भाइयों से कड़ी बातें कीं (उत्पत्ति 42:7); परन्तु नाबाल ने ऐसी ही कड़ाई से बातें करने के द्वारा अपना दुष्ट मन प्रकट किया (1 शमूएल 25:5-11)।
कमाई के आधार पर लोगों से भेदभाव करना क्रिश्चन आचरण नहीं है। यीशु ने एक ऐसा धर्म सिखाया जो व्यक्तियों के प्रति ऐसा कोई पक्षपात नहीं दिखाता (याकूब 2:1-4)। यह धनवान ही थे जो आम तौर पर विश्वासियों को सताते थे (याकूब 2:6-7), और यह आमतौर पर निर्धन लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने अपने राज्य में प्रवेश करने के लिए विश्वास का दान और अनुग्रह देने के लिए चुना है (याकूब 2:5)। परमेश्वर ने इस संसार के निर्धनों को चुना कि बलवानों को लज्जित करे (1 कुरिन्थियों 1:26-31)। चाहे दास हो या स्वतंत्र, यीशु मसीह में व्यक्तियों के बीच अब कोई भेद नहीं रहा है (कुलुस्सियों 3:28)।
धन घमण्ड पैदा करता है, और इस सर्वव्याप्त परिणाम का विरोध करना कठिन है (नीतिवचन 18:11; 30:8-9)। जो मनुष्य धन की खोज में रहते हैं, वे ऐसा अपने विनाश के लिये करते हैं (1 तीमुथियुस 6:6-10)। कोई आश्चर्य नहीं जब यीशु ने कहा कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है (मत्ती 19:24)। और सूई का नाक सचमुच एक बहुत ही छोटा-सा छेद होता है! आप उसमें नहीं बैठ सकते।
कंगाल और धनी दोनों को परमेश्वर यहोवा ने बनाया (नीतिवचन 22:2)। धनवान स्व-निर्मित या अपने दम पर स्थापित लोग नहीं हैं, जैसा कि वे सोचते हैं। धन गति, शक्ति, बुद्धि, समझ या कौशल से प्राप्त नहीं होता; धन “समय और अवसर” से प्राप्त होता है, और दोनों ही पर परमेश्वर प्रभुता करता है (सभोपदेशक 9:11)। हे धनी मनुष्य, तू अपने धन पर क्यों घमण्ड करता है, मानो तू ने उसे अपनी ही क़ाबलियत से कमाया हो, जबकि उसे तुझे देनेवाला परमेश्वर है (1 कुरिन्थियों 4:7)?
आप जो कुछ बोलते हैं और करते हैं उन सब में कठोरता नहीं, अपितु कृपालुता होनी चाहिए (सभोपदेशक 10:12; कुल 4:6)। आप इस संसार में चाहे कितने भी दरिद्र क्यों न हो, आप पर बड़ा अनुग्रह किया गया है। यीशु मसीह, जो स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी है, वह इस पृथ्वी पर आया और वह सभी प्रकार के गरीबों के साथ कोमलता का व्यवहार किया करता था (लूका 4:18-21; 21:1-4)। निर्धन आनंद मनाए; धनवान अपने भाग्य पर शोक करें (याकूब 1:9-11)। कोई मनुष्य कुछ भी कर ले, वह अपने प्राण के बदले में परमेश्वर को फिरौती नहीं दे सकता (भजन संहिता 49:6-13)।
यीशु ने मन के दीन मनुष्यों को धन्य कहा (मत्ती 5:3), और स्वर्ग में रहनेवाले उसके पिता ने उन्हें आदर देने की प्रतिज्ञा की (यशायाह 66:2)। परमेश्वर के सिंहासन के सामने सब मनुष्य दीन हैं, और मृत्यु के पश्चात् सब लोग निर्धन बन जाते हैं; हर एक मनुष्य, अपनी उत्तम अवस्था में भी, पूरी तरह से निकम्मा है (भजन 39:5)। आत्मिक रूप से दीन चुंगी लेनेवाला धर्मी ठहरकर अपने घर चला गया (लूका 18:9-14), जबकि एक धनी व्यक्ति जब होश में आया तो उसने स्वयं को नरक में पाया (लूका 16:22-23)। परमेश्वर के सामने अपनी वास्तविक दरिद्रता को स्वीकार करो, और सच्चे धन के लिए उससे प्रार्थना करो।
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