नीतिवचन 18:20

मनुष्य का पेट मुँह की बातों के फल से भरता है; और बोलने से जो कुछ प्राप्त होता है उससे वह तृप्त होता है।

क्या आप सुखी और समृद्ध होना चाहते हैं? आप हो सकते हैं! जीवन में संतुष्टि और शांति पाने के लिए यहां ज्ञान है: मधुर वाणी से बातें करना सीखें (नीतिवचन 18:21)। इस नीतिवचन में अनेक अलंकार या उपमाएँ हैं, फिर भी इसका पाठ समझने में बिलकुल आसान और सरल है। यदि आप अपने बोलने में सुधार करेंगे, तो आप कई तरह से परमेश्वर, अन्य लोगों से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे और यहां तक कि आपकी अपनी आत्मा भी आपको धन्य कहेगी (नीतिवचन 14:14)। इस ज्ञान को समझो!

यहां प्रयुक्त शब्द ‘पेट’ आपका मन, आत्मा, आत्मा और विवेक है (नीतिवचन 13:25; 18:8; 20:27,30)। जब आप मधुर वाणी से बोलते हैं तो वे फलद्रुप और तृप्त होते हैं (नीतिवचन 15:23)। आपके मुँह का फल अनुग्रह और बुद्धिमानीपूर्ण से कहें शब्द हैं, जो सही ढंग से बोलने का अच्छा गुण है (नीतिवचन 16:13; 22:11; 24:26; 25:11)। आप मधुर वाणी से स्वयं को आनंद दे सकते हैं। अनुग्रहसहित बोले गएँ अच्छे शब्द यकीनन सुननेवाले की मदद करते हैं, पर साथ ही उनका प्रतिफल उन्हें बोलनेवाले को भी मिलता है (नीतिवचन 12:14; 13:2)।

आप अपने शब्दों से अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में समृद्धि और सफलता भी प्राप्त कर सकते हैं। दाऊद और पतरस ने मधुर वाणी को धन्य जीवन के साधनों में से एक बनाया (भजन 34:12-16; 1 पतरस 3:10-12)। सुलैमान ने यही सत्य कुछ और नीतिवचनों में भी सिखाया (नीतिवचन 12:13-14; 13:2; 18:21; 22:11)। भला कौन-सी बात उन्नति के लिए इस सरल नियम का उपयोग करने से आपको रोक सकती है!

इस नीतिवचन में प्रयुक्त शब्दांश ‘मुँह की बातों के फल से भरता है’ उस सुधार की ओर संकेत करता है जो आप अपनी वाणी में तब करते हैं जब आप अपनी जीभ और होंठों को इस ज्ञान के नियमों को सिखाते हैं (नीतिवचन 15:28; 16:23)। सुलैमान के पास इस विषय पर कहने के लिए बहुत कुछ था, और आप परमेश्वर की महिमा और मनुष्य के लाभ के लिए अपने शब्दों पर ध्यान देकर अपनी वाणी की मिठास और मूल्य बढ़ा सकते हैं। यह सुधार, प्रथम खंड के फल की तरह, आपके जीवन में आशीर्वाद, सम्मान और धन लाएगा।

किसी से कुछ बोलने के बाद आपने कितनी बार अपने आप से कहा, “मैंने ऐसा क्यों कहा?काश मई यह नहीं बोलता?” यदि आप में विवेक है (सभी अच्छे लोगों का विवेक शक्तिशाली होता है), तो आपने अपने मुंह से निकलने वाले मूर्खतापूर्ण या आहत करने वाले शब्दों के लिए अफ़सोस ज़रूर किया है। यह जीवन का निराशाजनक दर्द है जिसे आप मधुर और मीठी वाणी में बातें करना सीखकर दूर कर सकते हैं। सुलैमान जानता था कि ज्यादा बोलने से पाप की संभावना और बढ़ जाती है, इसलिए उसने कम शब्दों में बाते करने की हिदायत दीं (नीतिवचन 10:19; 17:27-28; सभो 5:1-3)। यह कहावत बुद्धिमानीपूर्ण है: यदि आप कुछ भी दयालु और उपयोगी नहीं कह सकते हैं, तो चुप ही रहें।

दूसरों ने कितनी बार आपसे कहा है, “उसने ऐसा क्यों कहा?” क्या आपने दूसरों को अपने मुंह की तलवार से छेदकर लहूलुहान किया है (नीतिवचन 12:18)? आपकी जीभ दूसरों के स्वास्थ्य और धन के लिए है, लेकिन आप अक्सर उन्हें अपने शब्दों से क्रोधित, दुखी या भ्रमित कर देते हैं। कभी-कभी वे आपको इसके बारे में बताते हैं; कई बार वे सिर्फ चुपचाप पीड़ा सहते हैं। जब आपको अपने कारण हुए दर्द और क्षति का संज्ञान होता है, तो यह आपकी आत्मा पर एक बोझ बन जाता है। ऐसे शब्दों को सीखना आपकी बुद्धिमत्ता और प्रतिष्ठा है जो दूसरों को प्रोत्साहित करते और उन्नतिप्रदान शिक्षा देते हैं (नीतिवचन 10:20-21; 16:24)।

परमेश्वर ने आपको जीभ सिर्फ़ भोजन निगलने के लिए नहीं दी है। उसने इसे आपकी महिमा कहा (भजन 30:12; 108:1)। उचित उपयोग से यह परमेश्वर की महिमा कर सकती है। आप उन्नतिशील और उत्साहवर्धक शब्दों द्वारा दूसरों के लिए जीवन का वृक्ष बन सकते हैं (नीतिवचन 15:4; इफि 4:29)। वह व्यक्ति जो दयालुतापूर्वक दूसरों को सच्चाई और ज्ञान सिखाता है वह दुर्लभ और अनमोल है (नेहमायाह 8:12; लूका 24:32; प्रेरितों 8:26-35)। आप नीतिवचन की पुस्तक, जो बाइबल में हैं, से बुद्धि और ज्ञान की बातें सीखकर ऐसे व्यक्ति बन सकते हैं (नीतिवचन 1:1-4; 22:17-21) ।

क्या अपनी बोलने की आदतें बदलना आसान है? कोबरा नाग को एक कटोरे से दूध पीने और अपनी गोद में फुदकने के लिए प्रशिक्षित करना आसान है (याकूब 3:1-12)। परन्तु परमेश्वर ने आपको अपने नीतिवचन दिए। अपनी वाणी पर ध्यान रखें। कम से कम शब्दों में बातें करें। बोलने से पहले सोचो। अपनी भावना पर काबू रखें। दयालुता से प्रेम रखें। हर शब्द को उपयोगी और दयालु बनाएं। कठोर शब्दों का तिरस्कार करें। कानाफूसी से घृणा रखें। अपने विचारों को शुद्ध रखें। मूर्खतापूर्ण और अविवेक से कही बातों को न सुनें। बोलने में धीमा सुनने में अधिक तत्पर बनें। दूसरों का निर्माण करें।

जब आप मूर्खतापूर्ण बातें करते हैं तो क्या आपका ज़मीर आपको शोकित करता है? बिलकुल करना चाहिए! यदि आप जिन्दा ज़मीर वाले एक नेक इंसान हैं तो ऐसा होता है। लेकिन न्याय के दिन आप क्या महसूस करेंगे, जब आपको महिमा के परमेश्वर को हर व्यर्थ शब्द का हिसाब देना होगा (मत्ती 12: 34-37)? यदि आप तब तक रुके रहते हैं, तो अपनी बोलने की आदतों को सुधारने में तब तक बहुत देर हो जाएगी। उन्हें अभी सुधारें।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यशायाह परमेश्वर की उपस्थिति में अपने अशुद्ध होटों पर शोकाकुल हुआ (यशायाह 6: 1-7), इसलिए परमेश्वर ने उसे ठीक वैसे ही क्षमा कर दिया जैसे वह आपको करेगा यदि आप अपने होठों का दुरुपयोग करने के लिए पश्चाताप करते हैं तो (नीतिवचन 28:13)। मधुर वाणी से, चाहे दूसरे कुछ भी सोचें, आप तृप्त हो सकते हैं (गलातियों 6:4)। बुद्धिमान और सात्विक वाणी से आप संतुष्ट और परिपूर्ण हो सकते हैं। परमेश्वर आपके प्रयासों को सफ़ल बनाए।

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