नीतिवचन 18:2

मूर्ख का मन समझ की बातों में नहीं लगता, वह केवल अपने मन की बात प्रगट करना चाहता है।

एक मूर्ख के लिए बुद्धि और सत्य महत्वपूर्ण नहीं होते; वह स्वयं के विचारों में अधिक रुचि रखता है। जब समझ और अपने विचारों के बीच चुनाव करने की बात आती है, तो वह हमेशा अपने मन की सुनता है। उसके विचार और उसकी इच्छा उसके लिए बहुत प्रिय होते हैं, और वह उन्हें व्यापक रूप से सबको बताना और बढ़ावा देना चाहता है।

एक मूर्ख की सबसे मुख्य गलती यह होती है – वह अपने विचारों और राय को सत्य से अधिक महत्व देता है। वह स्वयं से बहुत प्रेम करता है। वह हमेशा अपने विचारों को साझा करने के लिए श्रोताओं की तलाश में रहता है। यह मूर्खता आज अंतिम दिनों के इस ख़तरनाक समय में व्यापक रूप से प्रचारित की जाती है, जहां लोग स्वयं से बहुत प्रेम करते हैं और खरे उपदेश का तिरस्कार करते हैं (2 तीमुथियुस 3:1-2; 4:2-4)। क्या आप किसी व्यक्ति को अपने विचार बताना पसंद करेंगे, या उसकी बातें सुनकर उससे कुछ सीखना चाहेंगे? इस पर ध्यानपूर्वक से विचार करें।

सभी मनुष्य इस अभिशाप के अधीन हैं, और बुद्धि और मन के बीच का संघर्ष ही एक बुद्धिमान और एक मूर्ख व्यक्ति, सत्य और झूठ, जीवन और मृत्यु के बीच का असल अंतर है। एक मूर्ख कभी भी सुनना पसंद नहीं करता; वह केवल अपनी बात कहना चाहता है। वह दूसरों से निर्देश नहीं लेता; वह केवल स्वयं की अभिव्यक्ति चाहता है। वह कुछ सीखना नहीं चाहता; वह केवल सिखाना चाहता है। उसका भ्रष्ट मन उसे सत्य और बुद्धि से दूर कर देगा और उसे नरक के रास्ते पर ले जाएगा, जहाँ वह अपने विचारों के बारे में व्यर्थ बातें करता रहेगा।

प्रसन्नता का अर्थ किसी चीज़ में हर्ष या आनंद मिलन होता है। एक मूर्ख को समझ की बातों में हर्ष या आनंद नहीं मिलता, जो कि उसे बुद्धि, सत्य और ज्ञान प्रदान करते हैं। समझ के प्रति उसमें कोई चाह नहीं होती (नीतिवचन 17:16); इसके बजाय वह इसे तुच्छ जानता है और इसका तिरस्कार करता है (नीतिवचन 1:7,22)। उसे दूसरों को अपने विचार और राय बताने में बहुत खुशी होती है, जिनके बदले में वह चापलूसी भरी प्रशंसा मिलने की उम्मीद करता है।

एक बुद्धिमान व्यक्ति इसके विपरीत होता है, जो किसी भी अन्य चीज़ से कहीं अधिक परमेश्वर की व्यवस्था से प्रसन्न रहता है (भजन संहिता 1:2; 19:10; 40:8; 119:16,24,35,47,70,77,174)। वह चाहता है कि उसे सुधारा जाए, डांटा जाए और सिखाया जाए (नीतिवचन 1:5; 9:9; भजन संहिता 141:5)। वह स्वयं की इच्छा से डरता है (भजन संहिता 19:12-14; 51:10; 119:36; 141:4)। वह अन्य बुद्धिमान लोगों की के साथ संगति करता है ताकि उसमें सुधार आए और वह और समझ की बातें सीखे।

यहाँ, किसी चीज़ की ढूँढने का अर्थ होता है उसे उजागर करना, खुलासा करना, प्रकट करना या दिखाना: एक मूर्ख व्यक्ति अपने मन कि बातों को उजागर करने, खुलासा करने, प्रकट करने और दिखाने में बहुत हर्ष और आनंद पाता है। अपने विचारों और राय को व्यक्त करना उसके लिए सबसे अधिक खुशी की बात होती है, और वह खुशी-खुशी अपना पूरा जीवन ऐसा करने में बिता देता है। उसे ज्ञान या समझ कि बातों में कोई हर्ष या आनंद नहीं मिलता। वह स्वयं के विचारों से ही संतुष्ट रहता है, और वह सोचता है कि पूरे संसार को उसकी बातें सुननी चाहिए।

कल्पना कीजिए, एक मनुष्य बिना यह समझे कि उसे अपने मलमूत्र से स्वयं को गंदा नहीं करना चाहिए, जीवन कि यात्रा में प्रवेश करता है, फिर भी वह दूसरों के सामने अपनी राय व्यक्त करने में बहुत खुशी महसूस करती है। मानव मन कितना भ्रष्ट है! और आज ऐसे विचारों को बहुत महत्व दिया जाता है!

कॉलेज और विश्वविद्यायलों में बच्चों से उनके विचार जानने के लिए उनके साक्षात्कार लिए जाते हैं। अभिनेताओं और खिलाड़ियों से राजनीतिक और नैतिक मामलों पर उनकी राय मांगी जाती है। कई विषयों पर मानव मन की सबसे लोकप्रिय राय को बढ़ावा देने के लिए सर्वेक्षण किए जाते हैं। यह पागलपन है!

इतिहासकार, दार्शनिक, शिक्षाविद और समाजशास्त्री हमें बताते हैं कि यह दुनिया की सबसे अभिज्ञात पीढ़ी है। फिर भी हर तरफ़ मन की पूजा करने के उन्माद और बावलेपन को बढ़ावा दिया जाता है। मानव जाति आग की झील में अपनी अनंत नियुक्ति से पहले ही आज वास्तविक रूप से अनैतिकता के नरक में डूब गई है। यदि आप बुद्धिमान हैं, तो आप इस मूर्खता को समझेंगे और इसके विरुद्ध खड़े होंगे।

इन अपवित्र और व्यर्थ की बात को आज उत्कृष्ट कथनों के रूप में स्वीकार किया जाता:

मुझे केवल अपने प्रति सच्चा होना था।

मैं अपने प्रति ईमानदार नहीं था।

मेरे दिल ने मुझसे कहा कि मेरे लिए वही एक है।

मुझे इतना अच्छा महसूस हुआ; मुझे वही सही लगा।

अब उसमें मेरा मन नहीं लगता था।

अपने दिल की सुनो, नौजवान।

मैं बस अपने दिल में जानता था कि यही सच था।

इस नीतिवचन के प्रकाश में इन कथनों पर विचार करें। ये सभी वाक्य भ्रष्ट लोगों की बेहूदा बातें और बकवास है, जो सत्य या सही की परवाह किए बिना केवल स्वयं से प्रेम करने की धुन में हैं। मानवता स्वेच्छा और अहंकार से, आत्म-प्रशंसा के द्वारा नरक में चली गई है।

आज के भ्रष्ट शिक्षकों ने चीज़ों को असंगत कर दिया है। शिक्षक अब यह नहीं कहते कि, “यह सत्य है,” या “यह सही है,” या “मैं आज आपको कुछ सिखाना चाहता हूँ।” वे अब पूछते हैं कि, “लाजोन, तुम क्या सोचते हो?” और, “बार्बी, तुम होती तो क्या करती?” कक्षा में चर्चा करना आज एक शिक्षण उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है, उन स्वार्थी मनों के लिए जो खुद को खोजना चाहते हैं। “बच्चों, आओ इस विषय पर अपने विचार साझा करें, और आओ एक-दूसरे की राय का सम्मान करें।”

आज कॉलेज में एक आम युवा लड़की यह कहते हुए सुनाई देती है कि, “मुझे डॉ. फ्रॉयडस्टीन बहुत पसंद है; इस विषय पर उनकी सोच मेरी सोच से मेल खाती है। बल्कि उन्होंने तो मुझे अगली दो कक्षाएँ पढ़ाने का मौका भी दिया है। क्या यह बढ़िया नहीं है? वे कितने प्यारे हैं!” यह एक अंधे का दूसरे अंधे का नेतृत्व करने से भी बदतर है; यह एक भ्रष्ट का दूसरे भ्रष्ट का नेतृत्व करना है। और लोग इन को उच्च शिक्षा के संस्थान कहते हैं!

इस “विचारों के आदान-प्रदान” से हमें आज तक मिला ही क्या है? चित्तीदार उल्लू अजन्मे बच्चों से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं; समलैंगिकता एक स्वीकार्य जीवनशैली बन गई है; वेनेज़ुएला में एक पेड़ को बचाना एक शादी को बचाने से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है; बच्चों को अधिकार मिल चुके हैं, लेकिन मकान मालिकों को नहीं; नफ़रत करना तब तक ही गलत है जब तक कि यह बाइबल के विश्वासियों से न हो; रैप संगीत और पोर्नोग्राफ़ी एक कला कहलाते है; इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म कहलाता है; बच्चे अपने फैसले स्वयं ले सकते हैं, यहाँ तक कि माता-पिता से अलगाव का फैसला भी; और, उसके ऊपर यह कि संसार में सबसे महान प्रेम स्वयं से किया जाने वाला प्रेम है। निःसंदेह! ये उदाहरण मूर्खों की मूर्खता को दर्शाते हैं।

यह शिक्षा नहीं है; यह निर्देश या प्रशिक्षण भी नहीं है। यह ब्रह्मांड के सबसे खतरनाक चीज, अर्थात मानव मन को बढावा देना है। क्या कोई कुछ नहीं कहेगा? सम्राट के शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं है! वह पूर्णतया नग्न है, और बहुत बदसूरत है! किसी को तो खड़े होकर उसे कपड़े पहनने के लिए कहना होगा। क्या अपने क्षेत्र में यह कार्य आप करेंगे??

नैतिक सिद्धांत समाप्त हो गए है; सत्य लुप्त हो चुका है (भजन संहिता 12:1-2; यशायाह 59:12-15; होशे 4:1-2)। परिस्थितिजन्य नैतिकता और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को तर्जी दी जाती है, अर्थात आप जो चाहें करें; केवल अपने मन से ईमानदार रहें; दूसरों को उनके विचारों के लिए आलोचित न करें, क्योंकि हम सभी को अपनी राय रखने का अधिकार है; अपने विचारों को महत्व देना सीखें। हे प्रभु, हमें बचा ले (यिर्मयाह 5:1; यहेजकेल 22:30)!

सोशल मीडिया ने इस मानवीय अभिशाप को बढ़ावा दिया है और लाभ के लिए इसका शोषण किया है। आज हर कोई एक व्यक्ति फेसबुक, ट्विटर या अन्य इंटरनेट के मंचों का उपयोग अपने मन की बात करने और अपने जीवन के हर व्यर्थ पहलू को संसार के सामने दर्शाने (खुलासा करने या दिखाने) के लिए करता है। इतिहास में ऐसा कभी भी नहीं हुआ है कि समाज का सबसे अज्ञानी और अपरिपक्व व्यक्ति अपने व्यर्थ विचारों को मुफ्त में फैलाए।

इसके बजाय चाँद की पूजा करना कहीं अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण होगा, क्योंकि चाँद के पूजक कम से कम स्वयं से और अपनी बाकी अज्ञानी वर्ग से कुछ अधिक की तलाश में होंगे। जब मानवजाति यह सोचती है कि इस पूरे ग्रह के सबसे अँधेरे स्थान, अर्थात मानव मन में ज्योति, सत्य और बुद्धि है, तो मानवजाति का पतन और स्पष्ट और सुनिश्चित हो जाता है।

बुद्धिमान लोग सर्वोच्च अधिकारी से केवल सत्य कि उम्मीद करते हैं, और परमेश्वर ने इसे बाइबल में दिया है। बाइबल से खरे उपदेश का प्रचार सुनना कितनी सौभाग्य की बात है! सृष्टिकर्ता परमेश्वर किसी विषय पर जो कुछ कहता है, आपको अपने पूरे मन से उसी की खोज में रहना चाहिए। लेकिन एक मूर्ख व्यक्ति इस सत्य को अस्वीकार कर देता है और एक शिक्षक की बात पर यकीन करता है जो उसे अपने भ्रष्ट मन और तरसते कानों के अनुकूल कहानियाँ सुनाता है और फिर उसे कक्षा के साथ साझा करने का मौका देता है (यशायाह 30:10; 2 तीमुथियुस 4:3-4)।

गाड़ी पर लगा एक बम्पर स्टिकर कहता है, “इस रविवार, अपनी पसंद के चर्च में ज़रूर जाएँ।” हाँ, चर्च में जाना अच्छा होता है। लेकिन जब चर्च में परमेश्वर की आराधना की जाती है, तो क्या परमेश्वर का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण नहीं है? ऐसे भ्रमित लोग फिर इससे भी आगे बढ़कर कहते हैं कि, “यहाँ मैं आरामदेह महसूस करता हूँ; मुझे अपने पुराने चर्च का माहौल पसंद नहीं था। वहाँ प्रचारक हमेशा यही बताते रहते थे कि हमें क्या नहीं करना चाहिए। लेकिन यहाँ मुझे मन में शांति मिली है।” कई लोग सोचते हैं कि ऐसे शब्द कहने से वे अपने गहरे और सार्थक विश्लेषण को दर्शाते हैं। परंतु वे दुर्गंधित हैं!

प्रिय पाठक, आपका मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है (यिर्मयाह 17:9)। यह आपसे हर दिन, कई बार झूठ बोलता है। आपकी एकमात्र सुरक्षा परमेश्वर का वचन है, जिसका आपको हर हाल में पालन करना चाहिए, चाहे आपका मन कुछ भी कहे (व्यवस्थाविवरण 29:29; भजन संहिता 119:128; यशायाह 8:20; 1 तीमुथियुस 6:3-5; 2 तीमुथियुस 3:16-17)। परमेश्वर आपको उसके वचन की तुलना मनुष्यों के स्वप्न से करने की चुनौती देता है (यिर्मयाह 23:28-29)।

आज एक आधुनिक पिता अपनी बेटी से बेबाकी से पूछता है कि “बार्बी, तुम लाजोन से क्यों प्रेम करती हो?” तो उसका मन फिर क्या जवाब देता है? वह कहती है, “लाजोन मुझे किसी भी अन्य व्यक्ति से कहीं बेहतर रूप से समझता है।” यह एक आत्मा को भ्रष्ट करने वाला और जीवन को नष्ट करने वाला धोखा है! बार्बी स्वयं को नहीं समझती है, और लाजोन तो निश्चित रूप से उसे नहीं समझता। मूर्खों को समझ से कोई खुशी नहीं मिलती। वे केवल एक-दूसरे की भावनात्मक, मानसिक, यौन या अन्य लालसाओं को संतुष्ट करने में खुशी पाते हैं।

यह मसीही माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को अपने मनों के ज़हरीले ख़तरों के बारे में सिखाएँ। बच्चों को स्वयं के विचारों का तिरस्कार करना और उसके बजाय परमेश्वर की व्यवस्था से प्रेम करना सिखााना चाहिए (भजन संहिता 119:113)। जो माता-पिता अपने बच्चों को उनके स्वयं की राय व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, वे नरक की आग से खेल रहे हैं, जो बदले में उन्हें ही जला देगी। उन्हें, दया के साथ यह सिखाया जाना चाहिए कि उनकी राय का कोई महत्व नहीं है और वास्तव में केवल परमेश्वर की राय ही मायने रखती है।

बच्चों को यह भी सिखाया जाना चाहिए कि उन्हें क्या सोचना है, न कि केवल सोचने और किस तरह से सोचने के विषय में। उन्हें हर विषय पर परमेश्वर के सिद्ध और अपरिहार्य वचन में आनंद लेना सिखाया जाना चाहिए, जैसा कि उन लोगों द्वारा व्याख्यान किया गया है जिन्हें परमेश्वर ने उनके ऊपर नियुक्त किया है, अर्थात उनके माता-पिता और पास्टर (भजन संहिता 119:128; इफिसियों 6:1; इब्रानियों 13:7)। इसका अर्थ होता है एक बच्चे को प्रभु के भय में और इस पूर्ण विश्वास में प्रशिक्षित करना कि केवल पवित्रशास्त्र ही सत्य है।

बच्चों द्वारा विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति आपके परिवार को मानव जाति के सबसे निचले स्तर पर ले जाती है, अर्थात मानव मन का भ्रष्ट और अज्ञानी होना। इस तरह आप अपने जीवन में शैतान को जगह देंगे, और अपने परिवार की शांति बनाए रखने के लिए आपको शैतान को भुगतान करना पड़ेगा, क्योंकि आदम की हर संतान के भ्रष्ट मन में नरक मौजूद होता है (याकूब 3:14-16; 4:1-5)।

इस नीतिवचन में दो संबंधित शिक्षाएँ दी गई हैं। आपको अपने विचारों से घृणा करनी चाहिए (अय्यूब 42:1-6; भजन संहिता 43:1-5; 73:1-22; 131:1)। अत: सोचना बंद करें; और धन्यवाद देना शुरू करें! आपके अपने विचार, यदि लंबे समय तक आपके साथ रहे, तो आपको परमेश्वर या मनुष्य की नज़रों से नीचे गिरने देंगे। और, आपको उन मूर्खों से दूर रहना चाहिए जो स्वयं के विचारों से प्रेम करते हैं (नीतिवचन 14:7; मत्ती 7:6; 1 कुरिन्थियों 15:33)।

बुद्धिमान पाठकगण इस नीतिवचन का उत्तर इस प्रार्थना के साथ देंगे कि, “हे प्रभु, मुझे जाँच और मेरे मन को जान ले। देख कि मुझमें कोई बुरी चाल है कि नहीं। मुझे मेरे मूर्ख मन से बचा। मेरे भीतर एक शुद्ध मन उत्पन्न कर। मेरे मन को अपने और अपने वचन के लिए खोल, जैसे तूने लुदिया के मन को खोला था। मेरे मन को तेरी ओर फेर दे। कोई भी पाप मुझ पर प्रभुता न करने पाए। मुझे अपनी समझ दे। मुझे अपनी विधियां सिखा। धर्म के मार्ग में मेरी अगुआई कर। आमीन।”

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