नीतिवचन 18:18
चिट्ठी डालने से झगड़े बन्द होते हैं, और बलवन्तों की लड़ाई का अन्त होता है।
जब लोग किसी दुविधा का समाधान नहीं निकाल पातें, तब परमेश्वर निकाल सकता है। इतिहास में लोगों को ऐसे फैसलें लेने का सामना करना पड़ा है जो लगभग या पूरी तरह से एक जैसी विचारधारा के थे। ऐसे मामलों में, वे चिट्ठी डालने की विश्वसनीय परम्परा पर अमल करके उचित निर्णय लिया करते थें। कुछ मामलों में, लोग दो पक्षों के बीच के मतभेदों को सुलझाने में सफ़ल नहीं हो पाते थे। तब ऐसे मामलों में, वे चिट्ठी डालने की विश्वसनीय परम्परा पर अमल करके मेलमिलाप से झगड़ों को सुलझाया करते थें। दोनों ही मामलों में, परमेश्वर ही उलझन को सुलझा देता है।
चिट्ठी डालना क्या है? जब समय और संयोग से कोई घटना होती है तब सामने आई दुविधा को सुलझाने के लिए चिट्ठी डाली जाती है। आज के समय की बात हो, तो लोग सिक्का उछालते हैं, पासा घुमा सकते हैं। इसका उद्देश्य संयोगवश हुई किसी घटना को दो या दो से अधिक विकल्पों में से कोई एक समाधान चुनना होता है। बाइबल के समय में, चिट्ठी डालने का उद्देश्य और उपयोग यही होता था, हालाँकि उन दिनों चिट्ठी डालने के लिए जिन वास्तविक वस्तुओं का उपयोग किया जाता रहा होगा वे सिक्के या पासे नहीं रहें होंगे।
यदि किसी मसले का समाधान निकालने का कोई और तरीका नहीं होता था, तब यदि सभी पक्ष चिट्ठी डालने की विधि और परिणाम से सहमत होने की हामी भरते तो चिट्ठी डालने से बहुत-से झगड़े बन्द होते थें। बलवन्तों का उल्लेख इसलिए किया गया है, क्योंकि अमीर और शक्तिशाली पक्षों में विवाद की संभावना अधिक होती है, वे बहुत दबंग और जिद्दी होते हैं, उनकी संपत्ति पर खतरा ज्यादा होता है और उनके बीच का संघर्ष, अगर सुलझाया न जाए, तो कई वर्षो तक चलता है। यदि चिट्ठी डालकर बलवानों के बीच के मतभेदों को दूर किया जा सकता था, तो निश्चित रूप से यह परम्परा गरीबों के लिए भी पर्याप्त थी।
क्या विश्व में संयोगवश घटनाएँ होती हैं? हाँ, यदि आपके दृष्टिकोण से देखें तो। नहीं, यदि परमेश्वर के दृष्टिकोण से देखे तो। जब आप एक सिक्का उछालते हैं, तो आप क्या होगा इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकते, जो भी विशिष्ट परिणाम हो, उसके बारे में 100% अनजान और अनिश्चित होते है। लेकिन परमेश्वर ने अपनी गुप्त इच्छा में पहले से ही हर चिट्ठी और सभी तथाकथित संयोगवश होनेवाली घटनाओं के परिणाम तय करके रखें है (व्यवस्था 29:29)। अहाब से पूछो (1 राजा 22:28-37)। चिट्ठी डालने के सब अंतिम परिणाम परमेश्वर ने पहले से निर्धारित करके रखें हैं (नीतिवचन 16:33)।
स्वर्ग का सच्चा परमेश्वर संप्रभु है। बुद्धिमान लोग अपने अतीत और भविष्य में अपने जीवन के लिए उसके फैसलों को साफ़ साफ़ देख सकते हैं। परमेश्वर ने आपसे यह नहीं पूछा कि आप पैदा होना चाहते हैं या नहीं, या किस के घर पैदा होने चाहते हैं, और आप अपना अस्तित्व भी खुद से मिटा नहीं सकते। सारी उसे महिमा दो! बुद्धिमान लोग अपने अतीत में परमेश्वर ने उनके लिए जो जो फैसलें लिए थें उन्हें वे स्वीकार करते हैं (नीतिवचन 22:2; यशायाह 45:9; 1 कुरिन्थ 4:7), और अपने भविष्य के लिए भी बड़े दीन मन से खुद को उसकी इच्छा पर सौंप देते हैं (याकूब 4:13-15)। वे उस संप्रभु परमेश्वर के सामने, जो ऐसे भयानक अधिकार और सामर्थ्य का धनी है, कांपते और थरथराते हैं (अय्यूब 42:1-6; रोमियों 9:20-21)।
मूर्तिपूजक देश प्राचीन काल से ही चिट्ठी डालकर फैसलें लेने की परम्परा का उपयोग करते आएँ हैं। क्योंकि उनके पास जीवन में मार्गदर्शन पाने के लिए जीवित परमेश्वर का कोई शास्त्र नहीं था, अत: उन्हें कठिनाइयों को हल करने के लिए संयोंगवश होनेवाली घटनाओं की आवश्यकता होती थी, जो चिट्ठी डालने से घटित होटी थी। बाइबल फारसियों, भूमध्यसागरीय नाविकों और रोमियों द्वारा चिट्ठी डालने की विधि का उपयोग करने का वर्णन करती है (एस्तेर 3:7; योना 1:7; मत्ती 27:35)। निःसंदेह, परमेश्वर यहोवा ही चिठ्ठी डालने की इन घटनाओं का उपयोग अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए करता था, भले ही उन लोगों को बाइबल के इस परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं था।
इज़राइल भी अपने राष्ट्रीय जीवन के लिए परमेश्वर की इच्छा की खोज करने के लिए चिट्ठी डालने की विधि का पालन करते थें। वे इसका उपयोग बलि का बकरा चुनने के लिए किया करते थें (लेव 16:8), उन्होंने चिट्ठी डालकर ही कनान को दस जनजातियों में विभाजित किया (गिनती 33:54; यहोशू 14:2; प्रेरितों 13:19), आकान का पाप ढूंढ़कर उसे मार डाला (यहोशू 7:16-19), शाऊल को अपना राजा होने के लिए चुना (1 शमू 10:20-24), जोनाथन को दोषी ठहराया (1 शमू 14:40-42), लेवियों को नगर दिएँ (1 इति 6:63), याजकों की व्यवस्था ठहराई (1 इति 24:5, 31), और यरूशलेम के लिए निवासियों को चुना (नेह 11:1), और प्रेरितों ने यहूदा का स्थान लेने के लिए प्रेरित के रूप में मत्तियाह पर निर्णय लेने के लिए भी चिट्ठियाँ डाली थी (प्रेरितों 1:23-26)।
परन्तु, पिन्तेकुस्त की घटना के बाद नए नियम में चिट्ठी डालने का कोई उल्लेख नहीं है। पवित्र बाइबल पूरी तरह से लिखें जाने और पवित्र आत्मा का वरदान दिए जाने के बाद, अब मार्गदर्शन के लिए किसी संयोगवश घटना की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर का वचन परमेश्वर के हर एक जन को सिद्ध बनाने में सक्षम है (1 कुरिन्थ 13:8-12; 2 तीमु 2:15; 3:16-17; 2 पतरस 1:19), और पवित्र आत्मा आप ही उसके मन का मार्गदर्शन कर सकता है आप (भजन 143:10; रोमियों 12:1-2; इफि 5:14-17; फिलि 1:9-11; कुलु 1:9-17; 4:12; इब्रा 13:20-21)।
यदि आप कभीकभार कुछ मामलों में ऐसे विकल्पों का सामना करते हैं, या कोई दुविधा में पड़ जाते हैं जिसे आप बाइबल में खोजकर, सलाहकारों से परामर्श करके, या प्रार्थना और उपवास करके हल नहीं कर सकते हैं, तो फिर आप भी गंभीर होकर चिट्ठी डाल सकते हैं, और परमेश्वर से उसका सम्मान करने के लिए गिडगिडाकर प्रार्थना करें (1 शमू14:41; भजन 66:18; प्रेरितों 1:23-26; 2 इतिहास 30:18)। परन्तु अगर परिस्थितियाँ जैसी बाइबल में दी गई हैं, वैसी अगर न हो तो, यहां तक कि गंभीर मामलों में भी, चिट्ठी डालने की विधि से आप परमेश्वर की परीक्षा करते हैं, और उनकी प्रेरित बुद्धि, अर्थात् लिखित वचन की उपेक्षा कर बैठते हैं। पाठक, सावधान रहें।
हालाँकि बाइबल के पुराने और नए, दोनों ही नियमों में चिट्ठी डालकर फैसलें लेने का समर्थन करती है, फिर भी, इस विधि का उपयोग उन मामलों को सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता जिन्हें बुद्धि को हल करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से परमेश्वर की परीक्षा लेना हैं (नीतिवचन 28:9; मत्ती 4:5-7)। यह मानवीय भ्रष्टता का एक बुरा लक्षण है कि मनुष्य “यहोवा परमेश्वर यों कहता है” के बजाय चिट्ठी पर अधिक भरोसा करना चाहेंगे। परमेश्वर ने आपके जीवन के लिए अपने ज्ञान को अपनी प्रेरणा से लिखवाया है, और इसलिए आपको पहले वही से सम्मति लेनी है (भजन 119:128)। यह कमज़ोर या शैतानी विश्वास है जिसे पहले से ही आज्ञा दी गई बातों का पालन करने के लिए “हेड या टेल” की आवश्यकता होती है।
जहाँ यहोवा ने कहा हो वहाँ उलझन में पड़ना परमेश्वर के वचन का अनादर कर उसे मानने से इनकार करना है (दानिय्येल 3:16-18; रोमियों 1:20-27; 1 पतरस 3:6)। यहां तक कि उन मामलों में भी जिन्हें बाइबल संबोधित नहीं करती, परमेश्वर अपने चर्चों (मत्ती 18:15-18; 1 कुरिन्थ 6:1-5) और अपने नियुक्त पास्टरों (2 इतिहास 19:8-10; यहेज़केल 44:23-24; 1 तीमु 5:17; इब्रा 13:7) की सम्मतियों और फैसलों का सम्मान करता है। चिट्ठियों को उसके निर्धारित ज्ञान के साधनों का स्थान कभी न लेने दें। परमेश्वर आपको अपने मन में अपने मार्ग पर विचार करने के लिए भी कहता है, क्योंकि वाही है जो आपके पैरों को स्थिर करता है (नीतिवचन 16:9; रूत 2:1-3; याकूब 4:13-15)।
बाइबल में वर्णित चिट्ठी डालने की विधि का उपयोग पैसे या महत्वपूर्ण मामलों से जुड़े संयोग के खेलों को उचित नहीं ठहरा सकती। केवल मूर्ख ही लाटरी टिकट खरीदते हैं या जुआ खेलते हैं (नीतिवचन 1:32; 6:1-5)। परमेश्वर ने निर्धारित किया है कि पुरुषों को लगन से काम करना है (नीतिवचन 12:11; 13:11), अपनी संपत्ति बर्बाद करने से बचना है (नीतिवचन 12:27; 18:9), पैसे बचाने है (नीतिवचन 6:6-8; 21:20), सक्षम बनना है और दूसरों को देने में हमेशा तत्पर रहना है (इफि 4:28; 1 तीमु 6:17-19), और इन लक्ष्यों के विपरीत व्यर्थ कार्यों को नहीं करना है (नीतिवचन 13:23; 28:19)। पाठक सावधान रहें।
क्या आप अपने जीवन में होनेवाली “संयोगवश घटनाओं” में परमेश्वर की संप्रभुता को देखते हैं और उसके प्रति समर्पण करते हैं? सर्वशक्तिमान ने आपके लिए इन चीजों को चुना: आपका लिंग, आपके माता-पिता, बुद्धि, रूप, राष्ट्रीयता, नस्ल, गृहनगर, बचपन की घटनाएं, शारीरिक यष्टि, शरीर का रंग, रोग की संवेदनशीलता, स्कूली शिक्षक और अवसर, और जीवन की बाकि सब अन्य बातें (भजन 139:16) )।
सच्चे और जीवित परमेश्वर ने ही सब परिस्थितियों की व्यवस्था करके आपके लिए आपके जीवनसाथी को चुना, और उसी ने परिस्थितियों की एक अन्य व्यवस्था मने आपकी नौकरी या पेशे को चुना। उसने चुना कि आपके किस प्रकार के बच्चे होंगे। बाकी लोगों के बीच आप कितने सफ़ल होंगे या बिलकुल भी नहीं होंगे, यह चुना और तय किया, और वरदान दिएँ। क्या आप अपने लिए उसके सही फैसलों से पूरी तरह संतुष्ट हैं, जैसे इज़राइल चिट्ठी से संतुष्ट था (नीतिवचन 16:33)?
विश्व के इस भयानक सम्प्रभु शासक के सामने खुद को विनम्र करें और आपके जीवन के लिए उसने जो फैसलें लिए है उसके लिए उसकी महिमा करें और उसके गौरवशाली नाम को धन्य कहें, क्योंकि उसने यह अपने भले और पवित्र उद्देश्यों के लिए अपनी असीम बुद्धि के अनुसार किया है (नीतिवचन 16: 4; यशायाह 57:15; 66:1-2)। यदि आपको उसके उद्धारदायक अनुग्रह से जिसे वह अपने पुत्र यीशु मसीह में देता है, अनन्त जीवन की आशा है जिसे वह अपने पुत्र यीशु मसीह में देता है, तो उसने आपको चुना इसलिए उसे हमेशा धन्यवाद देना आपका कर्तव्य है (2 थिस्स 2:13)। उसके लिए स्तुति का उपहार लाओ (इब्रानियों 13:15)। वह महान राजा है (मलाकी 1:14)।
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