नीतिवचन 18:14

मनुष्य का मन उसकी निर्बलता को संभालेगा परंतु टूटे मन को कौन सह सक्ता है।

आपका मन दोधारी तलवार है। उसमें जीवन की परेशानियों को कम करने की शक्ति है और आपको दुनिया के सब लोगों से सबसे ज्यादा खुश रख सकता है। या यह आपके मन को उस हद तक घायल कर सकता है जहां आपको आपके दर्द से कोई निजात मिल सकती। इसलिए सब वस्तुओं से बढ़कर अपने मन की पूरी शिद्दत से रक्षा करने में ही आपकी बुद्धिमानी है, ताकि आप अपने लाभ के लिए उसे उपयोग में ला सकें।

टूटा हुआ मन घायल शरीर से अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि मन आपके आनन्द के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। यदि मन घायल और पीड़ाग्रस्त है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका शरीर कितना स्वस्थ और मज़बूत है। यदि आप किसी कठिनाई या दुःख को अपने मन पर हावी होने देते हैं, तो कुचलने वाला दर्द असहनीय हो सकता है। मूर्ख लोग तो आत्महत्या में भी झूठी मुक्ति सहारा ले लेते हैं।

अगर आप अपने मन को बुद्धि से क़ाबू में रखकर उसे सही दिशा में निर्देशित करते हैं, तो वह आपको किसी भी कठिनाई से बचने में मदद कर सकता है। अगर आप अपने मन के टूट जाने पर उसके क़ाबू में आ जाते हैं, तो यह आपके और दूसरों के लिए असहनीय बोझ बन जाता है। अगर आप अपने मन को परमेश्वर के पवित्र आत्मा द्वारा चलने देते हैं, तो आप किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में प्रसन्न रह सकते हैं। यदि इसे बेकाबू अवस्था में स्वतंत्र रूप से चलने देते हैं, तो यह कर्तव्यनिष्ठ लोगों को भी अपनी जान लेने के लिए उकसा सकता है। क्या आप अपने मन को अपने क़ाबू में रखते हैं?

स्वाभाविक वृत्ति से चलनेवाले मनुष्यों ने भयानक तनाव, दर्द, खतरे और कठिनाई के तहत एक मज़बूत और साहसी मन से कई अविश्वसनीय और पराक्रमी चीजें की हैं। उनके कारनामे पढ़ने में अद्भुत हैं, लेकिन एक ख्रिश्चन विश्वासी उनसे श्रेष्ठतम चीजें कर सकता है। वर्तमान वास्तविकता और भविष्य की अपेक्षाओं का सच्चा ज्ञान, और पवित्र आत्मा की सहायक शक्ति, ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में दुष्ट लोग कुछ भी नहीं जानते हैं।

अपने मन पर शासन करना ख्रिश्चन विश्वासी की परिपक्वता का सबसे अच्छा सबूत है और दूसरों की मदद करने का साधन है। विधर्मियों या बाहरी परेशानियों से लड़ना आसान है। किसी क्रोधी, आवेगी, उदासी या आहत मन पर काबू पाना कहीं अधिक कठिन है। अनुग्रह में बढ़ने और पवित्र आत्मा में चलकर उसके फल लाने से आप अपने मन पर बुद्धिमान से शासन करने में बढ़ सकते हैं।

क्या कोई भक्तिमान और धर्मपरायण मनुष्य है जो खड़ा हो सके और परिपक्वता और महानता के इस पैमाने पर उस पर भरोसा किया जा सके? क्या कोई ऐसी गुणी स्त्री है जो अपने मन पर राज कर सके और कुलीन बन सके?

जीवन में आप जो कुछ भी करते हैं वह इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि अपने मन पर शासन करना। यदि आप इसे खुद पर हावी होए देते हैं, तो आप पराजित हो जाएगे (नीतिवचन 25:28)। यदि आप उस पर शासन करते हैं, तो आप उस महाशक्तिशाली मनुष्य से भी ताकतवर हैं जो अपने बाहुबल से किसी नगर को जीत लेता है (नीतिवचन 16:32)। दूसरों को लाभ पहुंचाने या उन पर बोझ डालने के पीछे आपका मन ही एक बड़ी शक्ति है। आपका मन आपको महान कार्य पूरा करने के लिए तैयार कर सकता है या आपको हमेशा के लिए निकम्मा बना सकता है।

जब अय्यूब ने अपने मन पर शासन किया, तो उसने परमेश्वर की आराधना की और उसे धन्य कहा, जबकि उसकी परिस्थितियाँ भयानक और विपरीत थीं (अय्यूब 1:20-22)। जब अय्यूब का मन अपने भारी नुकसान के बारे में विचारों से व्याकुल हो गया, तो उसने अपने पैदा होने के दिन को कोसा और कामना की कि वह मर जाए (अय्यूब 3:1-26)। और वहाँ से उसका मन अधोगति में जाने लगा, जब तक एलीहू और स्वयं परमेश्वर ने उसकी आत्म-निर्भरता और खुद पर तरस खाने की उसकी फितरत से उसे मुक्ति नहीं दीं (अय्यूब 32:2; 38:1-3)। पहले तो वह अपने मन की अधीनता में चला गया, और फिर वह उसे लगभग विनाश की अधोगति में ले गया।

अय्यूब ने क्या गलत किया? अय्यूब 1:20-22 और अय्यूब 3:1 के बीच क्या हुआ? उसने बहुत ज्यादा सोचा! और उसके दोस्त भी निकम्मे थे। आत्म-परिक्षण तभी अच्छा है, जब इसे बाइबल की मर्यादा में रहकर किया जाए। आत्म-तरस की नकारात्मक सोच ग़लत है और उससे कुछ भी हासिल नहीं होता। अय्यूब को चाहिए था कि वह उपवास और प्रार्थना करे और अपने दोस्तों को भी अपने साथ शामिल होने के लिए कहे (याकूब 5:13)। इसके बजाय, वह उदासीपूर्ण चिंतन करने लगा और खुद को धर्मी समझकर परमेश्वर से ही प्रश्न पूछने लगा (अय्यूब 2:11-13)।

जब दाऊद को सबसे बड़े संकट का सामना करना पड़ा और शाऊल से अपनी जान बचाकर भागना पडा, जब उसके अपने दोस्त उसे पत्थर मारना चाहते थे, तो उसने “अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण करके हियाव बाँधा” (1 शमू 30:6)। और उसके सच्चे मित्र, योनातान ने उसको ढाँढ़स दिलाया और परमेश्वर में उसका हाथ मजबूत किया (1 शमू 23:16)। अय्यूब के तीन दुखी दिलासा देनेवाले मित्रों के बिल्कुल विपरीत, यहाँ एक सच्चा मित्र था।

परमेश्वर के भय और आनंद में रहकर अपने मन पर शासन करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों की परवाह किए बिना निरंतर दावत करता है; परन्तु एक व्यक्ति जो अपने मन को पीड़ित होने देता है वह अपने जीवन में हर दिन नकारात्मक चीजें ही पाता है (नीतिवचन 15:15)। आनंद के साथ अपने मन पर शासन करने से आपका स्वभाव प्रसन्न रहता है, लेकिन अनियंत्रित दुःख मन को तोड़ देता है (नीतिवचन 15:13)। टूटे मन के क़ाबू में आना कितना भयानक फैसला है! प्रसन्न हृदय आपकी आत्मा को स्वस्थ कर देता है, परन्तु टुटा हुआ मन आपके जीवन को सुखा देगा। नीतिवचन 17:22 पर मेरी शिक्षा को पढ़ें।

आर्थिक नुकसान में नृत्य करना संभव है (हबक्कुक 3:17-19)। जब पतरस और यूहन्ना को यहूदियों ने पिटा तो उन्होंने आनन्द किया (प्रेरितों 5:40-43); स्तिफनुस ने अपने हत्यारों के लिए प्रार्थना की (प्रेरितों 7:60); पौलुस और सीलास ने कालकोठरी में परमेश्वर के भजन गाएं (प्रेरितों 16:25); पौलुस ने समुद्र में तूफान के बीच मानों पिकनिक मनाई (प्रेरितों 27:33-36)।

हाबिल से लेकर ग़ैर-मसीही राष्ट्रों में वर्तमान समय के सताव तक, परमेश्वर के शहीदों ने अपने मनों को परमेश्वर के आत्मा और वचन के द्वारा परमेश्वर पर केंद्रित रखते हुए हर्ष और विजय के साथ भयानक यातना का सामना किया है। संसार इन महान लोगों के योग्य नहीं है। जबकि आपने कभी उन कठिनाइयों का सामना नहीं किया है जिनका उन्होंने किया था, तो आपके पास ऐसे दिन या पल क्यों होते हैं जिनमें आप जीवन से निराश हो जाते हैं?

आनंद एक फैसला है। क्या आप जीवन के इस सरल लेकिन गहन नियम को समझते हैं? अधिकांश लोगों की सोच के विपरीत, आनंद परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता। यह एक विकल्प है। मन की कड़वाहट या टूटा मन भी एक विकल्प है, और अच्छी परिस्थितियां उस व्यक्ति की मदद नहीं कर सकती हैं जो कड़वाहट या भग्नता का मूर्खतापूर्ण विकल्प चुनता है। पराक्रमी बनें – अपने जीवन के लिए संतुष्ट और आभारी होना चुनें, और अपने खिलाफ़ दूसरों के अपराधों को भुला दें (नीतिवचन 19:11; 1 तीतुस 6:6)।

राजा अहाब बिस्तर पर दीवार की ओर मुंह करके बैठ गया और खाने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह नाबोत की दाख की बारी हासिल नहीं कर पा रहा था (1 राजा 21:4)। उसकी पत्नी ने उसकी उदास मनोदशा का फायदा उठाया और अपने गमगीन पति को खुश करने के लिए नाबोथ की हत्या करा दीं। किसी भी ख्रिश्चन व्यक्ति को पत्नी या परिवार के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, क्योंकि आप अपने आप को एक दुष्ट व्यक्ति के रूप में चिह्नित करते हैं (1 राजा 21:25)।

यहां तक कि एलिय्याह भी बाल के नबियों पर अपनी महान विजय के बाद हतोत्साहित हो गया था, जब उसने मृत्यु की कामना की थी (1 राजा 19:4)। हम सीखते हैं कि वह भी हमारे समान दु:ख–सुख भोगी मनुष्य था (याकूब 5:17), फिर भी निराश होना और नाश होना दो बहुत अलग चीजें हैं (2 कुरिन्थ 4:8-11)। क़ाबू में रखा हुआ मन को निराश हो सकता है, लेकिन यह आत्म-तरस की पापपूर्ण उदासी की गहराइयों में नहीं डूबेगा।

द्वितीय विश्व युद्ध के शुरुआती दिनों में जर्मन यू-बोट्स द्वारा ब्रिटिश सेना को जहाजों और चालक दल की भारी क्षति हुई। समुद्र में भयानक घटनाओं में जान बचाने की कोशिश करते हुए, उन्होंने देखा कि अधिक उम्र के पुरुष, जो ज्यादा अनुभवी थें, वे उन नाविकों की तुलना में जो शारीरिक रूप से स्वस्थ थें, ज्यादा दिन जीवित रहें थें। जीवन की अधिक वर्षों की कठिनाइयों ने उन वृद्ध पुरुषों के मनों को मजबूत किया और गंभीर परिस्थितियों में उन्हें युवा पुरुषों की तुलना में अधिक सफ़लता दी। इस शोध के प्रमुख, कर्ट हैन ने इस ज्ञान को अपने आउटवर्ड बाउंड प्रशिक्षण योगना में लागू किया, जो नियंत्रित, उत्तरोत्तर अधिक कठिन चुनौतियों से व्यक्ति की दृढ़ता को बढ़ाता है।

मन के निर्माण का यह सिद्धांत 1941 से बहुत पहले ही प्रकट हो गया था, क्योंकि परमेश्वर आपके विश्वास और धैर्य (कठिनाइयों को सहन करना) को उसी तरह बनाता है। वह आपके मन की शक्ति को बढ़ाने के लिए कष्टों और परीक्षाओं को सावधानीपूर्वक तैयार करता है (याकूब 1:2-4; रोमियों 5:3-5)। आज आपको ऐसी किसी भी परीक्षा का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिससे आप बच नहीं सकते और उसे पराजित नहीं कर सकते, यदि आप उन में एक विश्वासयोग्य परमेश्वर और उनमें दृढ़ता से टिके रहने के व्यक्तिगत लाभ को देख पाते हैं (1 कुरिन्थ 10:13)।

पौलुस इस ज्ञान के द्वारा कि उसके लिए परमेश्वर का अनुग्रह ही पर्याप्त था, बड़ी प्रतिकूलताओं और व्यक्तिगत दुर्बलताओं का सामना कर सका (2 कुरिन्थ 12:7-10)। और आपको भी ऐसा ही करना चाहिए, यह जानते हुए कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उसके उद्देश्य के अनुसार बुलाए गए हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं (रोमियों 8:28)। जिसने आपसे प्रेम किया, उस परमेश्वर के द्वारा आप जयवन्त से भी बढ़कर हैं। (रोमियों 8:35-37) परमेश्वर आपके टूटे हुए मन को चंगा करने और आपके घावों को भरने में सक्षम है (भजन 147:3)।

पाप एक सही मन का नाश कर देगा, लेकिन अगर आप अपने पाप को मान लेते हैं, और पश्चाताप करते हैं, उसे स्थिर किया जा सकता है (भजन 51:10)। दाऊद अपने जघन्य व्यभिचार और हत्या के बाद परमेश्वर के कठोर दंड के कारण कराह उठा (भजन 32:1-5; 38:1-11; 39:11; 51:8)। लेकिन अंगीकार और पश्चाताप ने उसमें नया बल, फुर्ती. ताज़गी, अनुग्रह और आनंद दिया (अय्यूब 33:19-30)। पतरस ने जब यीशु को जानने से इनकार किया, तो वह पश्चात्ताप से फूट-फूट कर रोया, लेकिन पचास दिन बाद पिन्तेकुस्त में वह चर्च का एक साहसी अगुआ था। यदि पाप आपके मन को अधोगति में ले जा रहा है, तो अभी अपने पाप को पूरी तरह से परमेश्वर के सामने स्वीकार करें।

अगर आप अपने पाप को कबूल कर उसके लिए परमेश्वर से क्षमा नहीं मांगते हैं, तो क्षमा न किया गया पाप अनंत काल के इस किनारे को नर्क में तब्दील कर सकता है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। कैन का दण्ड “सहने से बाहर” था (उत्पत्ति 4:13)। शाऊल की निराशा उसे अपने विशाल दुःख में एक जादूगरनी से परामर्श लेने की ओर ले गई (1 शमू 28:15)। अहीतोपेल और यहूदा ने अपने दर्द के इलाज के लिए फाँसी पर लटकने का फैसला लिया (2 शमू 17:23; मत्ती 27:3-5)। उन्होंने केवल नरक की एक बूंद का स्वाद चखा, लेकिन उस सज़ा की कष्टदायी यातना बहुत अधिक थी। तो फिर अनंतकाल के लिए इस दर्द की पूरी खुराक कितनी अधिक होगी!

क्या आप अपने मन पर क़ाबू रखते हैं? या क्या आपका जीवनसाथी और परिवार जानता है कि जीवन की छोटी-छोटी असफलताएँ आपको चिड़चिड़े मूड या मौन अवसाद में डाल देती हैं, जब आप दूसरों पर छींटाकशी करते हैं या अपने स्वार्थ में उन्हें अनदेखा कर देते हैं? क्या मूर्खता है! क्या बचपना है! बड़े हो जाओ! आपका मन कष्टकारी है और यह पाप है। आज से ही अपने मन पर शासन करना आरम्भ करें। उसका लाभ आपके साथ साथ आपके अपनों को भी होगा।

ख्रिश्चन लोग कई कष्टों और विभिन्न परीक्षाओं से जब गुज़रते जैन, तो वे बड़े भारीपन का अनुभव करते हैं (भजन 34:19; 1 पतरस 1:6), लेकिन परमेश्वर उन सभी से छुटकारा दिलाएंगे। भोर होते ही आनन्द आएगा। जो लोग अपना मन परमेश्वर पर स्थिर रखते हैं, उन के लिए हमेशा आशा और शांति है (यशायाह 26:3)।

यीशु मसीह को गेथसमेन में आपकी सोच से भी अधिक अंधकार, प्रतिकूलता और पीड़ा का सामना करना पड़ा, और उसके माथे से लहू की बुँदे पसीना बन कर बह रही रही, फिर भी उसे अपने पिता की इच्छा पूरी करने में ही शान्ति और ताकत मिली (लूका 22:41-44; मरकुस 13:43) -44)। वह उस आनन्द की ओर देख रहा था जो उसके आगे था, जिसके कारण उसने भयानक विपत्तियों को सहन किया (भजन 16:8-11; इब्रानियों 12:1-4)।

क्या आज आप धीमे ट्रैफ़िक के कारण लड़खड़ा जायेंगे? ऑफिस के काम के बहुत सारे प्रोजेक्ट का बोझ है? निराशाजनक करियर है? आपके करिअर का सबसे निराशाजनक दिन? कुछ किलो अधिक वजन बढ़ गया? एक निराशाजनक जीवनसाथी या बच्चा? नरक से एक ज्वलंत तीर कि आप हारे हुए हैं? इन सवालों की शर्मिंदगी आपको परमेश्वर में आनंद और ताकत की ओर ले जाए, क्योंकि यीशु मसीह के भाइयों के लिए घायल करने वाली ऐसी महत्वहीन चीजों का विचार घृणित और हास्यास्पद है।

यदि आपका उदासी भरा मन भीतरी सोच में डूबा है, तो सावधानी बरतें। ज्यादा न सोचें, और उस काम पर लग जाएं जो आपको अभी करना चाहिए। अपने आप से बाहर निकलो। आप पर निर्भर दूसरों को संकट में छोड़ जाना मूर्खता है; आपको उनकी आवश्यकता है। सलाह और तसल्ली के लिए अपने जीवनसाथी, परिवार के बड़ों और भाइयों से बात करें। प्रार्थना में परमेश्वर के पास जाएं और उसकी शांति पाएं जो सब समझ से परे है (फिलि 4:6-7)।

सब चीजों से बढ़कर अपने मन की रक्षा करें (नीतिवचन 4:23)। आनन्द मनाओ, और मैं फिर कहता हूँ, आनन्द मनाओ (फिलि 4:4)। पृथ्वी पर ऐसा कोई दुःख नहीं है जिसे स्वर्ग दूर न कर सके। परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ्य से आपका टूटा हुआ मन तुरन्त चंगा हो सकता है, इसलिए परमेश्वर से सहायता और शक्ति मांगें; वह आपको निराश नहीं करेगा। आप बाइबल में भी जीवन की आशा पा सकते हैं – वह एक कारण जिसके लिए परमेश्वर ने आपको वह आशा दी है (रोमियों 15:4)।

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