नीतिवचन 17:7
मूढ़ के मुख से उत्तम बात फबती नहीं, और इससे अधिक प्रधान के मुख से झूठी बात नहीं फबती।
क्या आपकी वाणी आपके चरित्र, आचरण और सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुकूल है? यदि आपका जीवन आपके शब्दों के अनुकूल नहीं है, तो जब आप उत्तम बातें करते हैं तब अपनी ही अप्रतिष्ठा करते हैं। और यदि आपकी नेतृत्वकारी भूमिका है और उसे पूरा करने में आप निष्ठापूर्वक ईमानदार नहीं हैं, तो आप अपने साथ ही बहुत बुरा करते हैं। सबक सरल है: अपने मुँह की बातों और कार्यों दोनों को एक-दूसरे का पूरक बनाएं, ताकि दोनों में सुसंगती रहें।
उत्तम बात तभी फबती है जब वह बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा कही गई हो (सभो. 10:12)। जब मूर्ख, जो अपनी प्रचलित मूर्खता से जाने जाते हैं, महान या बुद्धिमान दिखने की कोशिश करते हैं, तो वे केवल अपने दंभ और पाखंड से दूसरों को परेशान कर रहे होते हैं। लेकिन इससे भी बदतर, जैसा कि तुलनात्मक शब्दावली “इससे अधिक” से संकेत मिलता है, अधिकार के स्थान पर बैठा व्यक्ति होता है जो ईमानदारी और सच्चाई के लिए सर्वोच्च सम्मान नहीं रखता है (नीतिवचन 16:12)।
किसी भी व्यक्ति की परख आमतौर पर उसके मुंह की बात से होती है, जो उसकी विरोधाभासी वाणी को इतना खराब बना देती है। लेकिन व्यक्ति का चरित्र और आचरण आम तौर पर उसके बारे में बहुत कुछ प्रगट करते हैं। सबसे बुरा इन्सान एक मिनट के लिए कुलीन और नेक लग सकता है, और एक ऐसा इन्सान जो अपने मुंह की बात या पद से सबसे प्रतिष्ठित है वह धोखाधड़ी या झूठ बोलकर अपने बुरे मन को प्रकट कर सकता है। यहां तक कि एक बच्चे का चरित्र उसके काम से जाना जाता है, न कि उसकी बातचीत से (नीतिवचन 20:11)।
अज्ञानी या दुष्ट लोगों के मुंह से अच्छी बातें समझ से बाहर होती हैं, क्योंकि उसके मुंह की बात और चरित्र दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं होता हैं। मूर्ख और बुरे लोग अपनी सलाह या नेतृत्व को सही ठहरायें ऐसा दिल या आचरण उनमें नहीं होता है, इसलिए उन्हें नजरअंदाज करना और उनकी सुनने से इनकार कर देना ही उचित है (नीतिवचन 17:16; 26:1-9)। बुद्धिमान और ज्ञानियों व्यक्तियों के साथ चर्चा में शामिल होने के उनके प्रयास बेहद असभ्य हैं।
सत्ता में बैठे व्यक्ति का झूठ कितना अधिक घृणित होता है! एक नेता या शासक अपने अधीन लोगों के सुख, मार्गदर्शन, समृद्धि और सुरक्षा के लिए पद पर होता है। लेकिन बेईमानी सत्ता में बैठे लोगों के विश्वास को नष्ट कर देती है, लोगों को असुरक्षित बना देती है और न्याय को विकृत कर देती है। अधिकार का जो कार्यभार परमेश्वर की ओर से आता है वह अपने साथ सत्यनिष्ठा का उच्च आह्वान लेकर आता है।
सद्गुणी, कुलीन मनुष्य और शासक जिन्हें सब लोगों में भरोसा और गंभीर ईमानदारी के लिए सुप्रसिद्ध होना चाहिए, उन्हें कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि यह उनके चरित्र, प्रतिष्ठा और पद पर एक बदसूरत धब्बा है। सत्ता या प्रभाव की स्थिति में बैठे किसी भी व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार का धोखा देना या झूठ बोलना बहुत अशोभनीय है। शासक बनने और नेतृत्व करने का सौभाग्य अपने साथ सत्य के प्रति जिम्मेदारी को भी ले आता है।
इस दुनिया की नज़रों में बुद्धिमान कहलाने वाले व्यक्ति, प्लेटो ने सिखाया कि राजाओं को पद के विशेषाधिकार के कारण झूठ बोलने का अधिकार है, जो कि सुलैमान की इस चेतावनी के सर्वथा विपरीत है। आप किससे सीखना चाहेंगे? एक मूर्तिपूजक तत्वज्ञानी से या ईश्वर-प्रेरित उपदेशक से (सभो 12:9-11; 1 कुरिन्थ 1:19-20)! कुछ सरकारों ने कहा या अभिव्यक्त किया है -जो छल करना नहीं जानता वह शासन करना नहीं जानता। परन्तु वे अन्धों के अन्धें मार्गदर्शक हैं, और वे और उनके अनुयायी विपत्ति और विनाश के गड़हे में गिर पड़ेंगे (मत्ती 15:12-14)।
शुक्र है, ऐसे बुद्धिमान शासक हुए हैं जो अपने पद पर बैठने के बाद सत्य का मूल्य जानते थे। फ्रांस के लुई IX (1214-1270) ने कहा, “यदि सत्य सारी दुनिया से लुप्त हो जाए, तो उसे राजाओं के सीने में ढूंढो।” एरागोन के राजा अल्फोंसस, जिन्होंने चौदह बार बाइबिल पढ़ी, ने घोषणा की, “राजा के मुंह से निकला एक शब्द एक निजी व्यक्ति की शपथ से अधिक बड़ी सुरक्षा होनी चाहिए।” राजा के मुँह से निकलनेवाली दैवीवाणी में झूठ नहीं होना चाहिए (नीतिवचन 16:10)।
निष्ठा, ईमानदारी और सच्चाई अगुओं को थामे रहती हैं, क्योंकि सत्ता के अधीन लोग अपने सत्ताधिश के शब्दों की निश्चितता में चैन, शांति और सुरक्षा पाते हैं। महान राजा धार्मिकता और शुद्ध हृदय से निकलने वाली सही बात से प्रसन्न होते हैं (नीतिवचन 16:13; 22:11)। वे जानते हैं कि सच्चाई उनके शासन को सुरक्षित रखेगी (नीतिवचन 12:19) और झूठ उनके दरबार को भ्रष्ट कर देगा (नीतिवचन 29:12)।
यह बड़े शर्म की बात है जब राजनेता आवश्यक या सही न होने पर भी कानूनों में बदलाव करते हैं, नए नए क़ानून बनाते हैं और अपने विरोधियों तथा दलितों और अल्पसंख्यक समाजों को कुचलने के लिए उनका उपयोग करते हैं। राजनीतिक ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की अक्सर बलि चढ़ा दी जाती है। बुद्धिमान शासक कुछ चीज़ों को छिपाकर रखेंगे और जनता ध्यान भटकाएँगे, क्योंकि उन्हें आम लोगों की तुलना में जनता से वर्गीकृत या अन्य जानकारी गुप्त रखने की अधिक आवश्यकता होती है (नीतिवचन 29:11)।
केवल एक ही राजा हुआ है जिसके होंठ कभी भी झूठ बोलने के करीब भी नहीं आए – अर्थात प्रभु यीशु मसीह – भरोसेमंद और सच्चा गवाह (प्रकाशित 1: 5; 3:14; 19:11)। वह सत्य है (यूहन्ना 14:6)। वह सत्य का वचन है (याकूब 1:18)। वह अनुग्रह और सच्चाई को लेकर आया, और उसने सत्य की गवाही दी (यूहन्ना 1:14,17; 18:37; रोम 15:8)। दाऊद और उसके सब पुत्र उसकी तुलना में कुछ भी नहीं हैं (2 शमू 23:1-5)।
जो कोई यीशु मसीह का नाम लेता है वह प्रत्येक व्यक्ति सभी अतिशयोक्ति, बेईमानी और झूठ से घृणा रखे और उन्हें छोड़ दे, खासकर यदि उनके पास माता-पिता से लेकर राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री तक कोई अधिकार का पद हो। उन्हें अपने रास्ते से निकाल दो ताकि सभी लोगों के लिए चीजों को खुले तौर पर और स्पष्ट रूप से ईमानदार बन सके। माता-पिता को अपने बच्चों के दिल और दिमाग की रक्षा के लिए पूरी तरह से ईमानदार होना चाहिए। पास्टर को अपने श्रोताओं को बनाए रखने के लिए ऐसा ही होना अवश्य है (2 कुरिन्थ 8:20-21; तीतुस 2:8)।
जो कोई यीशु मसीह का नाम लेता है वह प्रत्येक व्यक्ति मूर्खता और पाप से दूर हो जाए, ऐसा न हो कि वह अपने पाखंड के कारण ख्रिश्चन धर्म को प्रदूषित और कलंकित करे। भला मसीह के सुसमाचार का बहुमूल्य सत्य मूर्ख के होठों के कारण क्यों प्रदूषित हो (यहेजकेल 20:39; 2 तीमु 2:19)? पाखंड उन लोगों द्वारा एकमात्र सच्चे धर्म पर लगाया गया सबसे बड़ा कलंक है जो अपने होठों से तो सत्य का दावा करते हैं परन्तु अपने जीवन से उसका इनकार करते हैं (यशायाह 29:13; यहेजकेल 33:31; मत्ती 15:7-9; तीतुस 1:16)।
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