नीतिवचन 17:10

एक घुड़की बुद्धिमान के मन में जितनी गड़ जाती है, उतना सौ बार मार खाना मूर्ख के मन में नहीं गड़ता।

आपको IQ परीक्षण अर्थात् मस्तिष्क-शक्ति के परिक्षण की नहीं, बल्कि WQ परीक्षण, अर्थात् आप कितने बुद्धिमान हैं इसका परिक्षण करने की आवश्यकता है। IQ को भूल जाइए, IQ टेस्ट ठीक बुद्धि के परिक्षण से विपरीत है। सुलैमान, अब तक का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति, हर IQ पैमाने पर काफी ऊपर था। वह दुनिया के सबसे बुद्धिमान लोगों के साथ बैठकर किसी भी विषय पर घंटों बात कर सकता था (1 राजा 4:29-34)। लेकिन बुद्धि की तुलना में उसके मन में मस्तिष्क-शक्ति के लिए कोई कद्र नहीं थी। बुद्धि कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। उसने आपकी बुद्धि को मापने के लिए यह सरल तुलना लिखी: आप घुड़की अर्थात् डांट-फटकार को किस मन से लेते हैं?

मस्तिष्क-शक्ति वह है जिसमें एक बच्चा दूध का समय होने से पहले कुछ गलतियों के बिना ही पीले रंग के ब्लॉकों को पीली बाल्टियों में डाल पाता है। परन्तु बुद्धि उन दैनिक अनोखी नैतिक परिस्थितियों में जिनका आपने पहले कभी सामना नहीं किया हो, परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रसन्न करने की क्षमता है। जैसे प्रकाश अंधकार से श्रेष्ठ है, वैसे ही बुद्धि मस्तिष्क-शक्ति से श्रेष्ठ है। बुद्धिमान लोग महान व्यक्ति होते हैं। क्या आप तैयार हैं? यह एक समयबद्ध परिक्षण है। आप कितने बुद्धिमान हैं यह मात्र दस मिनट में प्रकट हो जाएगा!

मानव मस्तिष्क में कितनी शक्ति है इसकी परमेश्वर को कोई परवाह नहीं है। उसने कम दिमाग वाले लोगों को अपनी संतान होने के लिए चुना है, ताकि वह मस्तिष्क-शक्ति वालें बुद्धिजीवियों के घमंड को कुचल सके (1 कुरिन्थ 1:26-29)। वह मनुष्य की तथाकथित दिमागी शक्ति पर हँसता है और उसका मज़ाक उड़ाता है (1 कुरिन्थ 1:19-20; 3:18-20)। वह जानता है कि यह इज़राइल के सबसे स्मार्ट लोग ही थे जिन्होंने उसके बेटे को क्रूस पर चढ़ाया था, और वह जानता है कि यह अमेरिका के सबसे स्मार्ट लोग ही थे जो सोचते हैं कि उनके पूर्वज बंदर थे और कोई सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं है।

जब आपको डाँटा जाता है तो आप क्या करते हैं? दिमागवाले वयस्क लोग चिढ़ जाते हैं और खुद को सही ठहराते हैं। तो वही बिना दिमाग वाले बच्चे बस अपनी आँखों से क्रोध भरी नज़र से घूरते रहते हैं, और सोचते हैं कि कब उन्हें फिर से वीडियो गेम खेलने को मिलेगा। बुद्धिमान लोग, दिमाग की शक्ति की परवाह किए बिना, डांट-फटकार को गम्भीरता से लेते हैं, नम्रतापूर्वक सुधार को मान लेते हैं, तुरंत बदलने का निश्चय करते हैं, और जो उन्हें डांट-फटकारते हैं उनसे वे प्रेम रखते हैं।

चूँकि हर मनुष्य जब वह इस दुनिया में आता है तब वह पूरी तरह से असहाय और अज्ञानी होता है, और उसका जीवन औसतन केवल 70 वर्षों का होता है, यहाँ वह कारक है जो महानता की सबसे बड़ी योग्यता की ओर संकेत करता है। मनुष्य के इस अल्पकालीन जीवन में विकास एवं प्रगति के लिए बारंबार एवं महत्वपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता होती है। परिवर्तन के लिए सुधार और शिक्षा की आवश्यकता होती है। महानता के लिए नियत लोगों को यह सुनना अच्छा लगता है कि वे गलत हैं और वे उन्नति और सुधार के अवसर को तुरंत समझ लेते हैं।

आप डाँट-फटकार को कैसे लेते हैं? क्या आपको एक बार बताने पर समझ में आ जाता है कि आपको अपना आचरण बदलने की ज़रूरत है? कि आप कुछ गलत कर रहे हैं? या फिर आपको बार-बार बताने की जरूरत है? या क्या मनुष्यों और परमेश्वर की ओर से मिलने वाली सैंकड़ों फटके आपके मन को केवल कठोर बनाते हैं? यह बुद्धि की अग्निपरीक्षा है। आप डाँट को किस मानसिकता से लेते हैं? बुद्धिमान मनुष्य एक ही डाँट से सुधर जाता है, परन्तु मूर्ख भयंकर दण्ड से भी नहीं बदलता। मूर्ख का अहंकार और हठ इतना बड़ा होता है कि वह सीख नहीं सकता और सीखेगा भी नहीं। आप बुद्धि के परिक्षण के पैमाने पर कहाँ हैं?

“बुद्धिमान को एक शब्द” इसी नीतिवचन से मिलती-जुलती एक कमजोर अमेरिकी अभिव्यक्ति है। बुद्धिमान व्यक्ति को अच्छा आचरण सीखने और अपने व्यवहार में बदलाव लाने के लिए केवल एक सुधार या फटकार की आवश्यकता होती है। मूर्ख विरोध करता है, विद्रोह करता है, और सुधार तथा फटकार को ठुकरा देता है। जब आप उसे बताते हैं कि वह गलत है तो वह अपना बचाव करने का मोर्चा सम्भाल लेता है – दिल से, चेहरे से, शारीरिक भाषा से या शब्दों से। उसके पास ज्ञान और बुद्धि के लिए कोई जगह नहीं है।

निःसंदेह, मूर्ख के पास कभी भी अपनी गलतियों के लिए कोई बुद्धिमानीपूर्ण उत्तर नहीं होता; कोई उसे गलत कहे यह उसे पसंद नहीं है। इसलिये वह मूर्ख है। हालाँकि परमेश्वर, या मनुष्य, या दोनों, उसे सौ जूतें मारें, फिर भी वह जिद्दी विद्रोह में लगा रहता है। वह अपनी दृष्टि में इतना चतुर है कि उसे बुद्धिमान होने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती – वह मूर्ख है। उसे कोई भी सुधार नहीं सकता। वह मदद या आशा से परे है (नीतिवचन 27:22)।

बच्चों, जब आपके माता-पिता आपसे कुछ ऐसा करने के लिए कहते हैं जिसे आप पहले से ही करना चाहते हैं, तो उनसे सहमत होना और उनकी बात मानना केवल सहयोग या स्वार्थ साबित होता है। यह तब होता है जब आपके माता-पिता कहते हैं कि आप गलत हैं और आपको अपनी मनपसन्द आदत को बदलने की ज़रूरत है ताकि आप अपनी बुद्धिमत्ता साबित कर सकें। तभी आपकी महानता की क्षमता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आपके पास कितनी बुद्धि है?

जब कोई पास्टर किसी ऐसी बात का उपदेश देता है जिस पर आप पहले से ही विश्वास करते हैं तो इस नीतिवचन को पढनेवाले ख्रिश्चन पाठक का “आमीन” कहना कुछ भी साबित नहीं करता है। किसी सहमतजन्य उपदेश का लिंक या रूपरेखा दूसरों को भेजने से कुछ भी सिद्ध नहीं होता। क्योंकि यह डाँट के प्रति समर्पित होना है – एक निन्दा, डाँट, या भर्त्सना – जिससे आपकी बुद्धि साबित होती है। धन्य परमेश्वर ने अपने सेवकों को फटकार और सुधार के कार्य के लिए भेजा (2 तीमु 3:16-17)। बुद्धिमान लोग डांट-फटकार और सुधार दोनों बातों से प्रेम रखते हैं (नीतिवचन 9: 8; 19:25; भजन 141: 5)।

यह बुद्धि को मापने का क्या ही उत्तम परीक्षण है! केवल बुद्धिमान लोग ही इसमें उत्तीर्ण हो पातें हैं। मूर्ख हर जगह हैं। हर परिवार में मूर्ख पाएं जाते हैं; हर चर्च में ये हैं। चाहे कोई पास्टर बात को कितना भी बढ़ा-चढ़ा कर बताए, दिमागवाला मूर्ख चुपचाप बैठ जाता है और अन्दर ही अन्दर खुद को बुद्धिमान मानता है, जो असल में खुद को हारा हुआ ही साबित करता है (नीतिवचन 26:12)। मूर्ख दिन में सपने देखता और उन कारों को देखता है जो उसने सुबह अपने पास से गुज़रती देखी थीं, या उस आलिशान मैन्शन का सपना देखता है जिसे उसने घुमते-फिरते किसी कॉलोनी में देखा था।

जैसा कि सुलैमान की इन नीतिवचनों में आम है, मूर्ख या बुद्धिमान व्यक्ति का सबसे बड़ा परिक्षण इस बात से होता है कि वह शिक्षा को कैसे ग्रहण करता है और कैसे उसका पालन करता है। पाठक, आपको परमेश्वर की उपस्थिति में अपने आप से गंभीरतापूर्वक यह प्रश्न पूछना चाहिए, मुझे माता-पिता, पास्टर और सलाहकारों से जो डाँट मिलती है उसे मैं कैसे लेता हूँ? आपके लिए यह ज़रूरी है कि आप अपना बुद्धि का पैमाना ख़ोज निकालें और डांट-फटकार तथा सुधार को गम्भीरता से लेकर खुद में बदलाव करें।

परमेश्वर ने उम्र या दिमागी शक्ति की परवाह किए बिना, अपने बच्चों में बुद्धि सिद्ध की है। प्रभु यीशु मसीह ने उस विश्वास की प्रशंसा कीं जो बालकों के समान सरल विश्वास है कि परमेश्वर के वचन और परमेश्वर के प्रतिनिधियों – चाहे माता-पिता, पास्टर, या कोई भी बुज़ुर्ग – की शिक्षा को मानकर उसका पालन करता है। महानता के लिए यह बुद्धिमान नियम सरलता से सीखने का सारांश प्रस्तुत करता है – परमेश्वर ने यह कहा; मेरा विश्वास है; और यह अंतिम है!

बुद्धि मुफ़्त में दी जाती है। आपको बस इतना करना है कि ठंड से बाहर आएं और इसे लें (नीतिवचन 9:1-6)। यह प्राप्त होती है जब आप अपने स्वयं के विचारों और अन्य मूर्खों के विचारों को त्याग देते हैं, ताकि परमेश्वर और उसके वचन द्वारा विनम्रतापूर्वक सुधार किया जा सके, घुड़की लगाई जा सके और फटकार लगाई जा सके। परमेश्वर के सामने विद्रोह जादू-टोना के समान है, और हठ मूर्तिपूजा के समान है, और इसके परिणाम भयानक होते हैं (1 शमू 15:23)।

बुद्धिमत्ता और मूर्खता का अंतिम माप यह है कि आप प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व और फटकार को कैसे लेते हैं। उसने पहचाना कि उसके पिता ने सच्ची बुद्धि और सच्चे ज्ञान को इस दुनिया के बुद्धिमान लोगों से छुपाए रखा और उसे अपने चुने हुए बच्चों पर प्रकट किया (मत्ती 11:25-27)। आज ही प्रभु यीशु मसीह के सामने खुद को विनम्र करना और उन्हें अपना परमेश्वर और राजा मानना आपकी बुद्धिमत्ता है, जो इस बात से साबित होता है कि आप उसकी फटकार को कितनी शिद्दत और जोश से लेते हैं (प्रकाशित 3:19)।

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