नीतिवचन 16:6
अधर्म का प्रायश्चित्त कृपा, और सच्चाई से होता है,
और यहोवा के भय मानने के द्वारा मनुष्य बुराई करने से बच जाते हैं।
जीने का सबसे अच्छा तरीका वह है जिसमें कृपा और सच्चाई दोनों मिलकर आपके जीवन को शुद्ध करती हैं। ईश्वरत्व के ये दो पहलू मिलकर मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं। और इन दोनों को खोजने और यहोवा का भय मानना उनका व्यावहारिक उपयोग करने की प्रेरणा है, जो मनुष्यों को अपने पापों को छोड़ देने के लिए विवश कर देता है।
आपको अपने जीवन की शुरुवात परमेश्वर का भय मानने से करनी चाहिए। बुद्धि और ज्ञान का आरम्भ वही से है (नीतिवचन 1:7; 9:10; अय्यूब 28:28; भजन 111:10); यह एक भक्तिपूर्ण जीवन जीने की नींव है (नीतिवचन 15:16; 20:28; 23:17; 28:14); यही मनुष्य का संपूर्ण कर्तव्य है (व्यव. 10:12; सभोपदेशक 5:7; 8:12; 12:13-14; मीका 6:7-8)। यह धन, सम्मान और जीवन लाता है जिससे जीवन अन्य मनुष्यों से बढ़कर ऊँचाई पर पहुँचता है (नीतिवचन 22:4; सभोपदेशक 7:18)।
परमेश्वर का भय मानना मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परमेश्वर की स्वीकृति को पाने के लिए प्रेरित करता है। यह उसे विवश कर देता है कि वह हर प्रकार के पाप से घृणा करे और उससे फिर जाए (नीतिवचन 8:13; 14:16; भजन 97:10; 101:3; आमोस 5:15; 2 कुरिंथ 7:1)। यह मनुष्यों को भक्ति सीखने के लिए प्रेरित करता है जो उन्हें उसके सामने सिद्ध करेगी (कुल 1:28; 4:12; इब्रा13:21)। यह मनुष्य का संपूर्ण कर्तव्य है और इससे आपका जीवन परमेश्वर और मनुष्यों के सामने परिपूर्ण बनेगा (सभोपदेशक 12:13-14)।
कृपा और सच्चाई परिपूर्ण या सिद्ध भक्ति के दो रत्न हैं। कृपा तरस खाना, क्षमाशीलता, या दया है जो आप दूसरों को दिखाते हैं जब वे आपके अधिकार में या आपके कर्ज़दार होते हैं जिसपर वे अपना कोई हक़ या दावा नहीं कर सकते। सच्चाई क्या है? परमेश्वर के वचन में जो सही है उसके प्रति पूर्ण निष्ठावान होना, और बिना किसी कपट या ढोंग के सच्ची ईमानदारी से शुद्ध व्यवहार करना ही सच्चाई है। इन रत्नों पर गहराई से चिंतन करों।
शैतान और दुष्ट लोग कृपा और सच्चाई से अनभिज्ञ हैं। शैतान आरम्भ से ही झूठा और हत्यारा था (यूहन्ना 8:44), और ये दोनों लक्षण सत्य और कृपा के सर्वथा विरोधी हैं। जब उसने अदन में हव्वा को बहकाया, तो उसने सवाल किया और परमेश्वर ने जो कहा था उसे उलट दिया और उसके अर्थ का विपर्यास किया: उसने सच्चाई के खिलाफ झूठ बोला। उसने कैन को प्रेरित किया कि वह हाबिल पर, जो परमेश्वर की उपासना करने में धर्मी था, तरस से भरी कृपा करने के बजाय, उसे केवल ईर्ष्या के कारण मार डाले (1 यूहन्ना 3:12)।
कुटिल मूर्ख और धर्मांध फरीसी अपने वचन या कर्म से झूठ बोलते थें जब इससे उनके उद्देश्य की पूर्ति होती थीं, और जब कोई उनके अधिकार में आता तो वे बिना किसी रहम या कृपा के न्याय करते थें। उन्होंने क्रोध में आकर सत्य को क्रूस पर चढ़ाने के लिये पिलातुस से झूठ बोला, और जिस मनुष्य में उस ने कोई दोष न पाया उस पर उन्होंने कुछ कृपा न की। वे पाखंडी और हत्यारे थे। उन्होंने व्यक्तिगत प्रतिशोध को सही ठहराने के लिए पवित्रशास्त्र को तोड़ा-मरोड़ा, और उन्होंने केवल अपने मित्रों पर कृपा दिखाई (मत्ती 5:38-48; लूका 6:27-36)। वे अपने स्वयं के पापों को सफेदी की हुई कब्र के नीचे छिपाते थें, लेकिन वे अन्य सब के पाप उजागर करना चाहते थें।
वे सब्त के दिन एक गदहे को गड़हे से बाहर निकालते, परन्तु सब्त के दिन एक मनुष्य को चंगा करने के लिए यीशु की निन्दा करते थे (लूका 14:1-6)। उन्हें कोई कृपा नहीं की! दाऊद के भेंट की रोटी खाने के बावजूद उन्होंने सब्त के दिन मकई खाने के कारण यीशु के शिष्यों को दोष लगाया (मत्ती 12:1-7)। उन में कोई सच्चाई या कृपा नहीं थी! उन्होंने अपने दुष्ट विद्रोह के कारण यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के बारे में यीशु के वैध प्रश्न का उत्तर देने से इनकार कर दिया (मत्ती 21:23-27)। उन में कोई सच्चाई नहीं थी!
कृपा और सच्चाई विपरीत प्रतीत होते हैं – ऐसा प्रतीत होता है कि कृपा दूसरे के कल्याण के लिए न्याय से समझौता करना चाहती है, और सच्चाई यह मांग करती है कि आप हर समय वही करें जो न्यायोचित है। लेकिन एक बुद्धिमान और भले व्यक्ति में वे एक साथ मिलती हैं और एक दूसरे को इस प्रकार अनुकूल ठहराती हैं कि वे एक सुंदर रत्न बन जाती हैं। वे जीवन को अधर्म और पाप से शुद्ध करती हैं, क्योंकि अधिकांश पाप इनमें से किसी एक का उल्लंघन हैं।
कौन अधिक महत्वपूर्ण है, कृपा या सच्चाई? बुद्धि सावधानीपूर्वक परिस्थितियों का मूल्यांकन करती है। नेक इरादे शांति से अधिक महत्वपूर्ण हैं। बाइबल के सत्य के विपरीत उपदेश देना श्रापित है (गला 1:8-9)। अवश्य है कि आप हर एक झूठे मार्ग से घृणा रखें (भजन 119:128), और दुष्टों को धर्मी ठहराने से परमेश्वर का दण्ड आता है (नीतिवचन 17:15; 1 शमूएल 3:13; 1 कुरिन्थियों 5:2)। न्याय के काम करो और कृपा से प्रीति रखो (मीका 6:8)
परन्तु कृपा व्यवस्था से अधिक महत्वपूर्ण है (मत्ती 12:7; मरकुस 2:27), बशर्ते इससे व्यवस्था के मर्म से कोई समझौता न हो (यूहन्ना 7:23-24)। और मामूली व्यक्तिगत अपराध में अपने अपराधी को दंड देने के बजाए उसपर कृपा करना ज्यादा भला है (नीतिवचन 19:11; मत्ती 5:7,38-42; 6:15; 7:1-2; याकूब 2:13)। कृपा के कटोरे मसीही-चरित्र का लक्षण हैं (कुलुस्सियों 3:12-14), जो मनुष्यों को किसी भी सांसारिक प्रतिशोध को खत्म करना सिखाता है।
बुद्धिमान व्यक्ति परमेश्वर के सत्य का पूरा पूरा समर्थन करेगा, लेकिन वह समझता है कि वह सत्य कब कृपा करने के लिए कहता है। इसलिए जब जब सम्भव हो, वह कृपा दिखाएगा। वह दूसरों के साथ सदा सच्चाई से व्यवहार करेगा, परन्तु जो उसके साथ सच्चाई से व्यवहार नहीं करते उन पर वह कृपा करेगा।
जब पवित्रशास्त्र कहता है कि परमेश्वर के मार्ग हमारे मार्ग नहीं हैं, तब यह क्षमा करने में उसकी महान कृपा का वर्णन है (यशायाह 55:6-9)। यह महत्वपूर्ण है कि आप बार-बार उद्धृत शास्त्र-भाग के मूल्य को इसके अनमोल संदर्भ में समझें। शारीरिक स्वभाववाले मनुष्यों के विपरीत, परमेश्वर खुले मन से और पूरी तरह से क्षमा और माफ करता है।
प्रिय पाठक, क्या आप सच्चाई के लिए अपनी बड़ी धुन और कृपा इन दोनों के बीच सही संतुलन रखते हुए उन्हें आनंद से उपयोग में ला सकते हैं? जब आप अपने शत्रुओं को शुद्ध सत्य का उपदेश देते हैं और बदले में वे आपको पथराव करते हैं तब क्या आप उनके पाप क्षमा होने के लिए प्रार्थना करेंगे, जैसे कि स्तिफनुस ने कीं थीं (प्रेरितों के काम 6:8-7:60)? क्या आप आलसी दासों को दोष लगायेंगे, और फिर भी उनके स्वामी से बिनती करेंगें कि वह अपने पश्चातापी, भगोड़े दास पर कृपा करें, जैसे कि पौलुस ने कीं थीं (2 थिस्स 3:8-12; फिलेमोन)?
क्या आपके जीवन में कृपा और सत्य आपस में चुम्बन लेते हैं? क्या आप सत्य के लिए पराक्रमी होने के साथ साथ अपने आसपास के लोगों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील भी हैं? क्या आप अपने बच्चों को सही रास्ते पर चलने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, परन्तु जब उनसे गलती होती है और अपनी मूर्खता के लिए पश्चाताप करते हैं तब क्या आप उनपर तरस खाकर कृपा करते हैं? क्या आप अपनी पत्नी की धर्मपरायण अधीनता को बनाए रखते हैं, और फिर भी उसे कमज़ोर पात्र जानकर उसका सम्मान करते हैं?
क्या आप अपना काम पूरी ईमानदारी और सावधानी से करते हैं, पर फिर भी उस लापरवाह वैटर पर कृपा करते हैं जो गलती से आप पर तरकारी से भरा कटोरा गिराकर आपके कपड़े गंदे कर देता है? क्या आप हमेशा समय पर अपने बिलों का भुगतान करते हैं, फिर भी उन लोगों पर कृपा करते हैं जो आपको भुगतान करने में देरी कर रहे हैं? क्या आप दोस्त और दुश्मन दोनों से सच कहते हैं, चाहे कुछ भी हो, लेकिन जब आपके दुश्मन उस सच के कारण आपके खिलाफ हो जाते हैं, तो आप उनके लिए प्रार्थना करते हैं?
कृपा और सच्चाई पूरी सिद्धता से प्रभु यीशु मसीह में एक साथ मिलती हैं; उसी में धार्मिकता और शांति ने एक दूसरे का चुम्बन लिया है (भजन संहिता 85:10)। उसने उन सैनिकों को क्षमा कर दिया जो उसके वस्त्रों का बटवारा कर रहे थें और क्रूस पर लटकाए जाने के दौरान उसने अपनी माँ पर कृपा की (लूका 23:34; यूहन्ना 19:26-27), और जब एक ऐसे राज्यपाल के सामने, जो सत्य को नहीं समझता था, उसका मुकदमा हुआ तब उसने सत्य कहा ( युहन्ना 18:37)। वह अपने सत्य के अचूक उपयोग से फरीसियों, सदूकियों और शास्त्रियों को कुचल देता था, लेकिन वह उन वेश्याओं पर कृपा करता और उनके पाप क्षमा भी करता था जो उससे कृपा पाना चाहती थीं।
आपके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य पाप से दूर होकर पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ना है, क्योंकि वह दुष्टों को न तो अपनाएगा और न ही उन्हें आशीष देगा (निर्गमन 34:7; नह 1:3)। आपको परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वह आपके जीवन को और भी दया और सच्चाई से भर दे और आप में उसका भय निर्माण करे, और यह कि आपको इन सब बातों की खोज केवल बाइबल में करने की ओर ले जाए। इन अनमोल सद्गुणों को प्राप्त करने से आप यहोवा की दृष्टि में और भले मनुष्यों और स्त्रियों की दृष्टि में महान बनेंगे। परमेश्वर आपको इस धर्मपरायण और नेक काम में सफल बनाए।
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