नीतिवचन 16:24
मनभावने वचन मधुभरे छत्ते के समान प्राणों को मीठे लगते, और हड्डियों को हरी–भरी करते हैं।
किसी भी अवसर पर कहें गएँ मधुर और मनभावने वचन उत्तम मिठाई हैं। वे मधु के समान सुकून देते हुए कानों और प्राण में आकर बस जाते हैं, और वे मन और कदमों को नवचेतन देते हैं। इनके तुरंत प्रभाव से व्यक्ति के चेहरे पर नयी चमक आ जाती है और नीचे गिरे हुए व्यक्ति में ऊर्जा और जीवन शक्ति लौट आती है। जब बुद्धि आपकी जीभ की अगुवाई करती है कि क्या बोलना चाहिए, तो आप अपने होठों से ऐसे मधुभरे छत्ते के समान मनभावने वचन निकलते हैं (नीतिवचन 16:23)।
प्रिय पाठक, क्या आपके वचन सुननेवाले को चंगाई और जीवन देते हैं? क्या आप अपने वचनों से अनुग्रहपूर्ण हौसला अफज़ाई, बुद्धि से भरी सम्मति और कोमल सांत्वना से दूसरों में नयी जान डालते हैं? या क्या आपके वचन छेदनेवाली तलवार के समान होते हैं? (नीतिवचन 12:18)? क्या आप दूसरों को अपने तीखे, आलोचनात्मक, कठोर या निंदनीय शब्दों से लहूलुहान कर देते हैं? और फिर जब आपसे कहा जाता है कि आपका वचन “नमकीन” हो, तो क्या आप उन ज़ख्मों पर नमक भी छिड़कते हैं (कुलु 4:6)?
जैसे तेल और सुगन्ध से मन कुछ ही पलों में आनन्दित होता है, ठीक वैसा ही जब मित्र के हृदय की मनोहर सम्मति प्राप्त होती है तो अनुग्रह सहित कहें गएँ वचन काम करते हैं (नीतिवचन 27:9)। वाणी का क्या ही अनमोल उपहार! सही समय पर सही शब्द सच में सुहावना होते हैं (नीतिवचन 15:23; 25:11)। प्रिय पाठक, आपकी जीभ में बहुत शक्ति है (नीतिवचन 18:21)। आज आप इसका उपयोग कैसे करेंगे? किसी को चंगा करने और चेतना देने के लिए या हानि के लिए?
इस आधुनिक और कृत्रिम स्वादवाले समाज में, बहुत से लोग मधु के छत्ते की मिठास या उसके स्वास्थ्यवर्धक गुणों को नहीं जानते हैं। आपने आखिरी बार असली मधु कब खाया था? लेकिन जानकार लोगों के अनुसार, परमेश्वर की बनाई मधुमक्खियाँ पौधों को परागित करती हैं और उससे आकर्षक पोषक तत्वों से भरा मधुर आनंद देनेवाला छत्ता बनाती हैं।
मधु एक शानदार पदार्थ है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य की संतुष्टि और स्वास्थ के लिए बनाया है (नीतिवचन 24:13)। उसने प्रतिज्ञा का सम्पन्न देश, कनान का वर्णन करते हुए कहा कि उस में दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं (निर्गमन 3:8; व्यवस्था 8:7-9)। उसने इस्राएल को खाने के लिए जो मन्ना दिया उसका स्वाद मधु के बने हुए पूए का सा था (निर्गमन 16:31)।
राजा ने भेंट के रूप में मधु भेजा करते थें (2 शमू 17:27-29; 1 राजा 14:3), और एक बार ऐसा भी हुआ कि इसके उपयोग से राजकुमार जोनाथन की आँखों में ज्योंति आई (1 शमू 14:27)। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का भोजन वनमधु और टिड्डियाँ था (मत्ती 3:4); यीशु अपने प्रारंभिक वर्षों की ज़िन्दगी में इसे मक्खन के साथ खाया करता था जो कि इज़राइल के दो महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ हुआ करते थें (यशायाह 7:15); और उसके पुनरुत्थान के बाद उसने उसे फिर से खाया (लूका 24:42)। ईश्वर-प्रेरित प्रेमियों ने अपने रोमांटिक गीतों में इसका उल्लेख अपने प्रिय जीवनसाथी के साथ अपने संभोग की मधुरता का वर्णन करने के लिए किया (श्रेष्ठगीत 4:11; 5:1)।
इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि मधु मीठा होता है। यह चीनी से दोगुना मीठा होता है! जिन व्यंजनों में चीनी की आवश्यकता होती है, उनमें मधु की केवल आधी मात्रा ही काफ़ी होती है। सन्तुष्ट व्यक्ति ही इसे अस्वीकार कर देगा (नीतिवचन 27:7)! आपको आज ही अपने किचन की अलमारी या दुकान से इसे लेना चाहिए और इस नीतिवचन के अनुसार इसका स्वाद चखना चाहिए। और फिर उसके बाद अपने आप से पूछें कि जो संतुष्टि आपको मधु ने दी क्या आपकी वाणी भी सुननेवाले को वैसी ही संतुष्टि देती है।
क्या आप इन तथ्यों को जानते हैं? मधु के छत्ते में चार खाद्य पदार्थ होते हैं: 1) शहद, 2) मधुमक्खियों द्वारा इकठ्ठा किया गया फूलों के परागकण का ढेर, 3) प्रोपोलिस नामक एक गाढ़ा, चिपचिपा, राल के समान हरे भूरे रंग का गोंद जैसा मीठी गंध वाला पदार्थ, और 4) रानी मधुमक्खी की रॉयल जेली। कई देशों में कई अलग-अलग बीमारियों के लिए मधु के उपयोग का एक लंबा इतिहास रहा है। क्या आपने कभी गले की खराश के लिए इसे नींबू या व्हिस्की के साथ लिया है? क्या आपने कभी एलर्जी से निपटने के लिए स्थानीय मधु का उपयोग किया है? इसके और दर्जनों चिकित्सीय उपयोग हैं।
1) शहद, जो मधुमक्खियों के पैरों पर इकट्ठा होता है, को कभी-कभी उत्तम भोजन के रूप में वर्णित किया जाता है। 96 पोषक तत्वों के साथ यह ज़िंक, कैल्शियम, मैग्नीशियम और आयरन से भरपूर होता है। इस में आपको ऊर्जावान बनाने की शक्ती होती है, इससे आपको तंदुरुस्ती का एहसास होगा, आपकी बौद्धिक क्षमता बढ़ती है और आपके आहार में पोषण संबंधी किसी भी कमी को दूर कर सकता है।
2) मधुमक्खियों द्वारा इकठ्ठा किया गया फूलों के परागकण का ढेर, एक मोमी राल है जिसका उपयोग मधुमक्खियां कई उद्देश्यों के लिए करती हैं, जो विटामिन बी, खनिज और बायोफ्लेवोनोइड से समृद्ध है। प्राकृतिक एंटीबायोटिक के रूप में इसका कोई तोड नहीं है। यह थाइमस ग्रंथि (बाल्यग्रंथि) को वायरस, जहर और अपशिष्ट उत्पादों से लड़ने या खत्म करने के लिए सफेद रक्त कोशिकाओं को बढ़ाता है।
4) रानी मधुमक्खी की रॉयल जेली, जो प्रत्येक छत्ते में कुछ नर्स मधुमक्खियों द्वारा स्रावित रानी मधुमक्खी का विशिष्ट भोजन होता है। इस आश्चर्यजनक भोजन के कारण वह श्रमिक मधुमक्खियों की तुलना में चालीस गुना अधिक जीवित रहती है और हर दिन अपने शरीर के वजन से दोगुने अंडे पैदा करती है, हालांकि आनुवंशिक रूप से बाकियों के समान ही! इसमें पैंटोथेनिक एसिड और कई अन्य जटिल पोषक तत्वों का उच्च सान्द्रण होता है।
परमेश्वर ने कहा कि मधु स्वास्थ्यप्रद है और ऊपर वर्णित स्थानों में इसकी सराहना की है, इसलिए आपको इस पर विश्वास करना चाहिए (नीतिवचन 24:13; 16:24)। लेकिन 3000 साल पहले सुलैमान के पुष्टि करने वाले शोध को पढ़ना आनंद की बात है। परमेश्वर को महिमा दो! सृष्टिकर्ता सच्चे विज्ञान को प्रकट करता है।
मधु अनमोल है। यह आपके मुँह के लिए मीठा है, आपकी आंखों की चमक को बढ़ाता है, आपके शरीर को ऊर्जावान बनाता है और इसमें समग्र स्वास्थ्य के लिए कई पोषण गुण हैं। आपके शब्द भी ऐसे ही होने चाहिए। वे दूसरों को आनन्द देनेवाले हो, और उन्हें इस बात पर प्रसन्नता महसूस होने पाए कि उन्होंने आपकी बातें सुनीं, और उनसे दूसरों का लाभ और निर्माण ही होने पाए (इफि 4:29)। आज किसी से कहने के लिए मधुर वचन चुनें।
आपकी वाणी सदैव अनुग्रह सहित और सलोनी होनी चाहिए, जिसमें कुछ नमकीन स्वाद हो (कुलु 4:6; सभोपदेशक 10:12)। ऐसी वाणी इस नीतिवचन को चरितार्थ (मक़सद की दृष्टि से पूरा) करती है। समझदार माताएं अपने बच्चों से कहती हैं, अगर तुम कुछ अच्छी बात नहीं कह सकते, तो कुछ भी मत कहो। माता-पिता को सही वचन सुनना अच्छा लगता हैं (नीतिवचन 23:16; 15:26)। मधुमक्खी की तरह, आपके डंक का उपयोग केवल अंतिम उपाय के रूप में ही करें।
लेकिन क्या मीठी बोली मर्दाना होती है? हाँ, बिलकुल! परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की और नीतिवचनों को अपनी प्रेरणा से लिखवाया, और दाऊद के पुत्र सुलैमान ने उन्हें लिखा। क्या ये दोनों स्त्रैण (जनानी) थें? दाऊद ने अपनी वीरता से गोलियत को मार डाला और अपने सलोने वचनों से योनातान का दिल जीत लिया, और ये सब एक ही दिन में (नीतिवचन 22:11; 1 शमू 18:1)!
प्रभु यीशु जरूरत पड़ने पर फरीसियों का सामना कर उन्हें मुँह पर गिराता और उन्हें भ्रम में डाल देता था, लेकिन उस के शिष्य उसे अनुग्रह सहित और सलोनी बातें करनेवाले के रूप में जानते थे (भजन 45:2; 50:4)। नासरत में उसकी अनुग्रह सहित और सलोनी बातों ने पूरी भीड़ को आश्चर्यचकित कर दिया (लूका 4:22)। और इम्माऊस के मार्ग पर उसके अनमोल वचनों से दो शिष्यों के मन में उत्तेजना उत्पन्न हुई (लूका 24:32)।
वाणी में अनावश्यक कठोरता मर्दानगी या परमेश्वर की आत्मा का लक्षण नहीं है; ऐसी कठोरता शैतान उन लोगों को बेचता है जिनके मन सही नहीं हैं। ऐसी वाणी घृणा या अभिमान के इरादे से कठोर हृदय से निकलती है, क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है (मत्ती 12:34)। दाऊद ने अपने भतीजों को उनकी मन की कठोरता के लिए डांटा (2 शमू 3:39), और यीशु ने भी याकूब और यूहन्ना को इसी बात के लिए फटकारा (लूका 9:55)। इन दोनों उदाहरणों में किसी में भी प्रभु यीशु मसीह की आत्मा या जीभ नहीं थी।
कड़वी और काट-फाड़ने वाली जीभ नरक की आग से जलती है; यह अधर्म का पूरा संसार है; यह बेक़ाबू बुराई है, जो घातक जहर से भरी हुई है (याकूब 3:2-12)। कोई भी मनुष्य इसे अपने दम पर वश में नहीं कर सकता। फिर भी ज़रूरी है कि आप परमेश्वर की कृपा से इसे अपने और अपने बच्चों के मुंह से दूर करने के लिए हर संभव प्रयास करें।
यूहन्ना बैपटिस्ट और एलिया जैसे लोग कुछ खांस मक़सद से इस दुनिया में आये थें, और कठोरता से बातें बोलना उनके मक़सद का हिस्सा था। परन्तु आप नहीं जानते कि वे लोगों के साथ निजी तौर पर भी कठोर थे या नहीं। वे संभवतः नहीं थे। वे आम बोलचाल के उदाहरण नहीं हैं। आपको अपने शब्दों के चयन को नियंत्रित करने के लिए अनुग्रह के नियमों को चुनना होगा (नीतिवचन 31:26)।
इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि परमेश्वर के वचन मधुर हैं? क्या वे मधु से भी अधिक मीठे नहीं हैं (भजन 19:10; 119:103)? क्या वे तुम्हारे हृदय में हर्ष और आनन्द नहीं उत्पन्न करते (यिर्मयाह 15:16)? वे इतने मधुर हैं कि जो उन्हें बोलते हैं, बाइबल उन्हें सुहावने पाँववाले मनुष्य कहती है (रोमियों 10:15)। क्या आपको याद है जब आपने सच्चे सुसमाचार को समझ के साथ सुना तब वह आपके प्राण को कितना मधुर लगा था?
पाठक, जीभ में बड़ी शक्ति होती है (नीतिवचन 18:21)। आज आप उसका उपयोग कैसे करेंगे? आप जैसा उसका उपयोग करेंगे, फल भी आप वैसा ही पाएँगे- जीवन या मृत्यु। प्रत्येक मनुष्य अपना बोझ स्वयं उठाएगा।
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