नीतिवचन 16:20

जब मनुष्य प्रभु के वचन पर ध्यान देता है, तब वह सफल होता है; धन्य है वह मनुष्य जो प्रभु पर भरोसा करता है।

आप को प्रतिदिन निर्णयों और दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। सफलता के लिए केवल दो बातें आवश्यक हैं – बुद्धि और विश्वास। बुद्धि, जो ठीक ठीक परख करने की सामर्थ होती है, आपको हर समस्या का उचित और विवेकपूर्ण तरीके से समाधान ढूँढने और उसे हल करने में मदद करेगी। हर बार जब आप यह करने में सफ़ल होंगे, तब तब आपको भौतिक और आत्मिक दोनों आशिषें प्राप्त होगी। विश्वास, जो कि परमेश्वर में विश्वास और यकीन है, आपकी रक्षा करेगा और आपको समृद्धि की ओर ले जाएगा, क्योंकि विश्वास करने से आप अपनी ही स्वार्थपूर्ति और बड़ाई करने के बजाय सत्य और धार्मिकता में होकर परमेश्वर का सम्मान करेंगे।

सफलता और सुख पाना आसान है। इस नीतिवचन में वही बताया गया है। परन्तु उन्हें प्राप्त करने का तरीका क्या है? निर्णय लेने में इसी दिव्य बुद्धि के उपयोग करने और बुद्धि के इस परमेश्वर में विश्वास के द्वारा (नीतिवचन 3:5-6; यहोशू 1:8; 1 तीमु 6:6; 1 पतरस 3:10-12)! परमेश्वर के वचन और विधान में विश्वास द्वारा जीवन की उलझनों से निपटते हुए, आप दूसरों से कृपा, विवेकपूर्ण चुनावों के कारण मिलनेवाली शांति और समृद्धि और साथ ही परमेश्वर की आशीष पाते हैं। क्या ही धन्य इनाम! आपको बुद्धि और विश्वास प्राप्त करने और आज ही उनका उपयोग करने की आवश्यकता है!

ज्यादातर लोगों को अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के कारण फैसले लेने में कठिनाइयों और दुविधाओं का सामना करना पड़ता है जिसके चलते फैसला लेने की उनकी क़ाबलियत विकृत हो जाती है, और वे गलत चुनाव कर बैठते हैं। एक बुद्धि-सम्मत और उचित समाधान के लिए परमेश्वर पर भरोसा करने के बजाय, वे न्याय और समानता को बिगाड़कर खुद को बचाने और समृद्ध करने का प्रयास करते हैं। क्या यह समझौता काम आता है? कभी नहीं! इसका नतीजा केवल यह होगा कि इससे आपको दूसरों से तिरस्कार, स्वार्थी चुनाओं के परिणाम और परमेश्वर की ओर से दंड ही मिलेगा। ऐसे मनुष्य अधोगति में जा रहे हैं!

आखिर यह बुद्धि जिससे कि आप मसलों को विवेकपूर्वक रूप से निपटाने में सक्षम हो और परमेश्वर तथा मनुष्यों को प्रसन्न कर सकें, कहाँ पाई जाती है? यह बुद्धि पाई जाती है केवल ख्रिश्चन धर्मग्रंथ, अर्थात् बाइबल में, जो एकमात्र परमेश्वर-प्रेरित वचन है (भजन 19:7-11; 119:130; 1 तीमु 3:15-17)! और इस धर्मग्रंथ की नीतिवचन नामक पुस्तक में अत्यन्त सटीक व्यावहारिक ज्ञान है (नीतिवचन 1:1-7; 2:1-9; 30:5-6)। यदि आप अपने आप को परमेश्वर के वचन में डुबो देंगे, तो आप जीवन की कठिनाइयों से निपटने के लिए सच्ची बुद्धि और सच्चा ज्ञान अर्जित करेंगे, और इससे आप अपने लिए महान आशीर्वाद और आनंद प्राप्त करेंगे।

दाऊद बुद्धिमानी के साथ काम करता था, और लोग उससे प्रसन्न थें (1 शमू 18:5,14-16,30)। कैसे? वह बाइबल को अत्यधिक महत्व देता था (भजन 1:1-3; 19:7-11; 119:1-176)। बाइबल ने उसे सिखाया कि उसे जान से मारने के शाऊल के प्रयासों और अपने बेटों के राजद्रोह से कैसे निपटना है, विभाजित राष्ट्र को कैसे एकजुट करना है, और अपने नवजात बच्चे की मृत्यु के समय कैसी मानसिकता रखनी है। उसने अबीगैल की सुधार पर ध्यान क्यों दिया? नाथन की फटकार को कैसी प्रतिक्रिया दीं? वह इन सब मसलों में स्वार्थी कार्य कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसे परमेश्वर पर पूरा भरोसा था।

यूसुफ और दानिय्येल, जो उस समय के महानतम साम्राज्यों के दरबारों में विदेशी बंदी थें, उन्होंने परमेश्वर के वचन के अनुसार फैसलें लिए। यूसुफ ने एक खूबसूरत औरत से यौनसुख को ठुकरा दिया, और उस पर बलात्कार के प्रयास का झूठा आरोप लगाकर दोषी ठहराया गया, लेकिन उसने अपने शुद्ध विवेक से काम लिया, अपने साथी-बंधकों का पक्ष पाया. और अंत में परमेश्वर ने उसे मिस्र के शीर्षस्थान पर उन्नत किया। दानिय्येल ने अपनी आत्मा की शांति, और अपने साथी-बंधकों के सम्मान के लिए नबूकदनेस्सर के मूर्तिपूजक खान-पान और राजा दारा के धार्मिक आदेश का विरोध किया और परमेश्वर ने उसे बेबीलोन और फारस के राज्य पर शीर्षस्थान पर उन्नत किया। इस नीतिवचन का सबक समझ लों!

बाइबल में परमेश्वर-प्रेरित ज्ञान सफलता और आनंद को ले आता है। इसमें पत्नी के लिए अचूक मानदंड (नीतिवचन 31:30), क्रोध को शांत करने का तरीका (नीतिवचन 15:1), उदारता से देने के बारे में रहस्य (नीतिवचन 11:24-25), आर्थिक भ्रष्टाचार और घोटालों के बारे में चेतावनी (नीतिवचन 12:11;13:11), प्रबंधकीय ज्ञान (नीतिवचन 29:21), कर्ज़ में किसी का जामिन बनने का खतरा (नीतिवचन 6:1-5), बचत का मूल्य (नीतिवचन 6:6-8), पूंजीवाद का ज्ञान (नीतिवचन 14:4) , बाल-प्रशिक्षण नियम (नीतिवचन 29:15), और शराब के अतिसेवन का खतरा (नीतिवचन 20:1), जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ज्ञान और समझ की बातें हैं।

नीतिवचन की पुस्तक में शामिल कुछ और बातों पर विचार करें। इसमें वेश्याओं और व्यभिचारी वैवाहिक औरतों के बारे में चेतावनियां हैं (नीतिवचन 6:25), कड़ी मेहनत का मूल्य बताया गया है (नीतिवचन 22:29), घमंड के भयानक अभिशाप (नीतिवचन 16:18), जीवन की प्राथमिकताओं (नीतिवचन 15:16; 17:1), सच्ची मित्रता के सद्गुणों (नीतिवचन 17:17; 27:5-6), व्यभिचार का समाधान (नीतिवचन 5:19), सलाहकारों की बहुतायत का मूल्य (नीतिवचन 15:22), राजद्रोह की बुराई (नीतिवचन 20: 2; 24:21-22), माता-पिता का तिरस्कार करने का खतरा (नीतिवचन 20:20; 30:17), शराब का मूल्य (नीतिवचन 31:6-7), मानव समाज का ज्ञान (नीतिवचन 30:27), और गरीबों की देखभाल (नीतिवचन 19:17), जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ज्ञान और समझ की बातें हैं।

सबक दोहरा है। इस नीतिवचन की शिक्षा को बिगाड़ो मत, और न ही दोनों सबकों को समझने में चूक के इसके मूल्य को खोएं। क्या आप बाइबल के ज्ञान और बुद्धि को लगन से अपने रोजमर्रा के जीवन में लागू करते हैं, और फिर उसके बाद क्या आप सफलता के लिए स्वर्ग के धन्य परमेश्वर पर भरोसा करते हैं? परमेश्वर आपसे अपेक्षा करता है कि आप उसके द्वारा दिए गए ज्ञान का उपयोग करें – क्योंकि इससे कम कुछ भी उसकी परीक्षा लेना है; लेकिन कोई भी चतुराई या विवेक अकेले सभी मामलों को नहीं निपटा सकता – आप पर परमेश्वर का अलौकिक अनुग्रह और आशीर्वाद होना ज़रूरी है (भजन 127:1-2; मत्ती 4:5-7)।

एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने उद्देश्यों पर सन्देह करता है और अपनी क्षमताओं पर संदेह करता है, इसलिए वह अपने प्रयासों से अधिक परमेश्वर के आशीर्वाद पर निर्भर रहता है। वह जानता है कि वह परमेश्वर की सहायता के बिना कुछ नहीं कर सकता है, इसलिए वह बुद्धिमानीपूर्ण कार्रवाई करने के फैसले के बाद खुद को परमेश्वर की दया और उसकी प्रतिज्ञाओं पर निर्भर कर देता है। और यही वह संयोजन है जो सच्चा ज्ञान है। इसे समझो, और इसे याद रखो!

एसाव से मिलने से पहले याकूब ने बुद्धिमानी से अपने झुण्ड को दो समूहों में विभाजित किया और दिल खोलकर उपहार भेजे, लेकिन उसने सफलता के लिए पूरी रात परमेश्वर के साथ कुश्ती की (उत्पत्ति 32:3-32)। दाऊद ने अबशालोम को अहीतोपेल की बुद्धि से हटाने के लिए हुशै को भेजा, परन्तु उसने अपनी सफलता के लिए परमेश्वर से विनती की और उस पर भरोसा किया (2 शमू 15:31-34)। एस्तेर ने अपने पति, फारस के राजा के लिए दोहरा भोज आयोजित किया, लेकिन इसकी सफलता के लिए तीन दिन और रात उपवास करने के बाद ही (एस्तेर 4:15-17; 5:1-6)।

यदि बुद्धि केवल बाइबल में पाई जाती है, तो विश्वास कहाँ पाया जाता है? उसी बाइबल में! “सो विश्वास सुनने से, और सुनना परमेश्वर के वचन से होता है” (रोमियों 10:17)। परमेश्वर ने अपने लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया और कैसे उन्हें बार बार छुड़ाया इस विषय पर नियमित अध्ययन से उसके विधान में आपका विश्वास बढ़ता और फलता जाएगा (भजन 40:4-5; 46:1-11; 77:11-20; 78:1-8; 107:1-43; 111) :1-10; 145:1-21; रोम 15:4)।

आप जीवन की दुविधाओं को कैसे निपटाते हैं? जज़्बातों से? अपने दिल की सुन के? किसी आदत का संकल्प लेने से? डर से? माता-पिता को अपना आदर्श बनाके? अपने अन्दर झांककर? साथियों के दबाव से? लोकप्रिय राय से? वर्तमान में प्रचलित बातों से? तथ्यों पर विचार करके? फैसले लेने और कार्यवाही करने के ये आधार विफल हो जायेंगे। आप इस नीतिवचन का पाठ समझने से चूक गए, और आप उस सफलता और आनंद को पाने से भी चूक जाएंगे जो बुद्धि और विश्वास आपको दे सकते थे। परमेश्वर को धन्यवाद दें, और सुलैमान यहाँ जो कह रहा है उस पर विश्वास करें।

बुद्धिमान लोग परमेश्वर के वचन को सीखते हैं और उसे अपने जीवन में ईमानदारी से लागू करते हैं। वे अपनी ही स्वार्थपूर्ति और बड़ाई करने से अधिक सत्य और धार्मिकता को महत्व देने से कभी नहीं चूकते। वे जानते हैं कि परमेश्वर के नियमों के अनुसार चलने से ही भौतिक और आत्मिक दोनों आशिषें प्राप्त होगी और परमेश्वर का आशीर्वाद और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित होगी। वे कभी भी किसी मामले को बाइबल की बातों के अलावा किसी अन्य तरीके से नहीं निपटाते, और इस विश्वास में वे पूर्ण इनाम के लिए एक विश्वासयोग्य परमेश्वर पर भरोसा करते हैं (भजन संहिता 119:22,94,117,166,173; इब्रानियों 11:6)।

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