नीतिवचन 16:2

मनुष्य का सारा चालचलन अपनी दृष्टि में पवित्र ठहरता है, परन्तु यहोवा मन को तौलता है।

हर व्यक्ति को यही लगता है कि उसका जीवन उचित है, और वह स्वभाविक रूप से आत्म-धार्मिकता पर निर्भर हो जाता है। उसे दूसरों से निर्देश और सुधार के शब्द सुनना अच्छा नहीं लगता है, क्योंकि वह मानता है कि उसके काम करने का तरीका भला और बुद्धिमानी भरा है। परंतु परमेश्वर उसके हृदय और विचारों और उसके अभिमानी और स्वार्थी उद्देश्यों पर नज़र रखता है। स्वयं पर विश्वास न करना भी सीखें, क्योंकि आपका हृदय एक झूठ बोलने वाला असत्यवादी है जो आपको गलती करने पर मजबूर कर सकता है।

क्या आप स्वयं को वास्तव में जानते हैं? आप स्वयं को किस प्रकार जान सकते हैं? जबकि आपका अपना हृदय सबसे अधिक झूठ बोलता है। “मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है*, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?” (यिर्मयाह 17:9)। दाऊद ने कहा, “अपनी गलतियों को कौन समझ सकता है? मेरे गुप्त पापों से तू मुझे पवित्र कर” (भजन संहिता 19:12)। कोई भी व्यक्ति स्वयं को वास्तव में नहीं जानता। आप भी स्वयं को नहीं जानते।

निस्संदेह आपको यह लगता है कि आप जीवन के पहलू में निष्कलंक और सही हैं। आपका आत्म-धर्मी हृदय आपके द्वारा सोचे, कहे और किए गए हर कार्य को उचित ठहराता है। आपका छली हृदय आपको किसी भी प्रकार की मूर्खता और पाप की ओर ले जा सकता है, और आपको शायद पता भी न चले (नीतिवचन 16:25; 30:12)। परंतु प्रभु आपकी गोपनीय महत्वाकांक्षाओं और भावनाओं को जाँचता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने बेबीलोन के भोज में बेलशस्सर को जांचा था। और वह आपको न्यून पाएगा। फिर वह आपको कष्ट की आग की भट्टी में शुद्ध करेगा।

भले ही आप अपने हृदय के कपट को नहीं जान सकते, परंतु प्रभु सब जानता है। धन्य परमेश्वर मनुष्य से कहता है,” मैं, यहोवा, मन को खोजता और हृदय को जाँचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल-चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूँ” (यिर्मयाह 17:10)। जिसे हमें लेखा देना है, उसकी आँखों के सामने सब वस्तुएँ खुली और प्रगट हैं, जिसमें हमारे हृदय के विचार और भावनाएँ भी शामिल होती हैं (इब्रानियों 4:12-13)।

इस समय भी आपको जांचा जा रहा है। पवित्र न्याय का तराजू झुक रहा है। स्वयं की जाँच करें। आप इस व्याख्यान को क्यों पढ़ रहे हैं? आप इस किस तरह पढ़ रहे हैं? क्या आपने पहले से ही यह तय कर लिया है कि इसमें आपके लिए कुछ नहीं है? क्या आपको लगता है कि आप अपनी आत्मा को अच्छे से जानते हैं? क्या यह चेतावनी अन्य पापियों के लिए है, जो आपसे कहीं अधिक पापी हैं? क्या आप इस आत्मिक चेतावनी का तिरस्कार कर रहे हैं? क्या आप परमेश्वर के आभारी हैं कि आप अन्य लोगों के अनुरूप दुष्ट नहीं हैं? क्या आप इस आत्मिक बात में बिल्कुल भी इच्छुक नहीं हैं? क्या आप इस बात से नाराज़ हैं कि आपके लिए इसमें उत्सुकता जगाने के लिए कुछ भी नया और उत्तेजक नहीं है?

हे, मूर्ख व्यक्ति! आप स्वयं को धोखा दे रहे हो। अपनी अनैतिकता को स्वीकार करें। अपनी घमंड भरी आत्म-धार्मिकता के लिए पश्चाताप करें। अपने स्वाभिमान से घृणा करें। स्वयं द्वारा किए गए कार्यों पर भरोसा करना छोड़ दें, क्योंकि संभवतः उन्हें लेकर आपके उद्देश्य बुर रहे होंगे। वास्तविक विनम्रता का अर्थ स्वर्ग के पवित्र परमेश्वर के सामने अनावृत और असहाय होकर गिरना और ईमानदारी से यह स्वीकार करना ह कि, “हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर!” (लूका 18:13)। यह नीतिवचन इतना मूल्यवान है कि सुलैमान ने इसका वर्णन आपके लिए दो बार किया है (नीतिवचन 21:2)।

आत्मिक निर्देशन को बहुत ही सरलता से अनदेखा किया जा सकता है, जैसे कि अपने छली अंत:करण को संतुष्ट करने के लिए उसे बिना ध्यान दिए पढ़ना या आलस्य के साथ सुनना। दूसरों को चेतावनी देना बहुत सरल होता है, जैसे दूर-दूर तक फैले धूल के कणों को पहचानना, परंतु स्वयं की ज्योति को नहीं ।दूसरों को तुच्छ जानना बहुत सरल होता है, और इस बात के लिए परमेश्वर का आभारी होना किे आप उनके समान घृणित नहीं हैं, जबकि वास्तव में आपकी आत्मा को स्वर्ग में एक दुष्ट आत्मा के रूप परखा जाता है।

आत्म-धार्मिकता से अधिक बुरा और कुछ नहीं होता। इस पर गहनता से विचार करें। इसका वास्तविक अर्थ क्या है? यह सोचना कि आप धार्मिक हैं और अपने अंत:करण, सुधार , और परिवर्तन के विरुद्ध स्वयं को उचित ठहराना। ऐसे व्यक्ति को यह पता ही नहीं होता कि वे कितने पापमय हैं, क्योंकि वे स्वयं को लेकर उनके उच्च विचार, उनके विवेक को पूर्ण रूप से विकृत कर देते हैं। परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को वे केवल दूसरों पर लागू करते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी जांच करने की कोई आवश्यकता ही नही लगती (याकूब 1:21-25)।

आप ऐसे व्यक्ति के साथ किस प्रकार तर्क के साथ बात कर सकते हैं? आप उनके पाप को इंगित नहीं कर सकते, क्योंकि वे स्वयं उसे नहीं देख पाते। उनका अभिमानी आत्मविश्वास आपके हर तर्क को नकारता है (नीतिवचन 26:12,16; गलातियों 6:3)। और ये ठट्ठा करने वाले आपके प्रयास के लिए आपसे घृणा करेंगे (नीतिवचन 9:7-8)। उन्होंने अपने झूठे और पाखंडी धर्म की वास्तविकता को सबके सामने ले आने के लिए महिमामय प्रभु को क्रूस पर चढ़ा दिया था। हर व्यक्ति अपनी आत्मा में एक फरीसी है।

आत्म-धार्मिकता क्या होती है? यह वह विश्वास है कि आप भले, निपुण, बुद्धिमान, और योग्य हैं। यह वह कठिनाई है, जिसका सामना आप स्वयं को गलत, मूर्ख, मंद, अभिमानी, या विद्रोही कहने में करते हैं। यह वह आनंद है जो आपको दूसरों की गलतियों को उजागर करने या उसकी चर्चा करने से प्राप्त होता है। यह अपने पापों की उपेक्षा करके, दूसरों को दोषी ठहरना है। यह सदैव बिना पवित्रशास्त्र के दूसरों के चाल-चलन पर टिप्पणी करना है।

यह किसी भी प्रकार के सुधार का विरोध करना और उससे पीछे हटना है। यह बिना किसी अधिकार के, निर्णय लेने और राय बनाने की उपधारणा है। यह वह सहजता है जिससे आप किसी उपदेश को केवल दूसरों पर लागू करते हैं। यह वह विचार है जो किसी उपदेश के दौरान आपको वास्तव में उस क्षेत्र में कोई भी सुधार लाने से रोकता है। यह वह सोच है कि आपको किसी भी चीज़ में कोई बदलाव की आवश्यकता नहीं है।

यह सुधार के प्रति किसी भी तरह के आभार का अभाव है। यह वह प्रतिवाद है जो फटकारे जाने पर या पाप के विरुद्ध चेतावनी देने पर प्रकट होता है। यह आलोचना के प्रति ऐसी प्रतिक्रिया देना है कि, “मैं एक असफल व्यक्ति हूँ”। यह ऐसे बहाने बनाना है कि, “मैं इतना बुरा नहीं हूँ, बस मझे गलत समझा जाता है”। यह सुधार किए जाने पर दूसरों के पापों को स्मरण रखना है। यह सुधार लाने वाले व्यक्ति के पापों का अवहेलनापूर्वक उल्लेख करना है।

इसके लिए आप क्या कर सकते हैं? स्वयं को विनम्र बनाएँ और यह स्वीकार करें कि आप भी उतने ही दुष्ट हैं जितना कि वह व्यक्ति जिसे आप सबसे दुष्ट पापी मानते हैं (1 तीमुथियुस 1:15)। पवित्र परमेश्वर के नथुनों में एक गंध के समान अपनी आत्म-धार्मिकता का अंगीकार करें (लूका 18:9-14)। अपनी धार्मिकता की मलिनता का अंगीकार मैले चिथड़ों के समान करें (यशायाह 64:6)। प्रभु से यह प्रार्थना करें कि वह आपके बुरे विचारों को आपके सामने उजागर करे (अय्यूब 34:32; भजन संहिता 26:2; 139:23-24)। एक शुद्ध हृदय के लिए प्रार्थना करें (भजन संहिता 51:10)।

परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में सुधार लाने और आपको ज्ञान से भरने की अनुमति देने के द्वारा, अपनी शुद्ध आत्मा को प्रमाणित करें (यशायाह 66:2)। बिना किसी विद्रोह के, अपने जीवन में सुधार को स्वीकार करें (भजन संहिता 73:21-22)।धन्य परमेश्वर कभी भी एक टूटे और पश्चातापी हृदय को तुच्छ नहीं समझता (भजन संहिता 34:18; 51:17; यशायाह 57:15)। यदि आप विनम्रता से पश्चाताप करेंगे, तो वह आपको ऊपर उठाएगा (याकूब 4:10; 1 पतरस 5:6)। धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं (मत्ती 5:3)।

आप आत्म-परीक्षण को स्थगित या कम नहीं आंक सकते। यह आत्मिक लोगों द्वारा किया जाने वाला एक पवित्र अभ्यास है, जो अपने हृदयों की छली दुष्टता को जानते हैं (1 कुरिन्थियों 11:28; 2 कुरिन्थियों 13:5)। शीघ्र ही हर गुप्त बात यीशु मसीह के पवित्र न्याय आसन के समक्ष उजागर होगी। अपने हाथों को शुद्ध करें और अपने हृदयों को दुचित्ते पाखंड से समीक्षात्मक और गंभीर पश्चाताप के द्वारा शुद्ध करें (याकूब 4:8-10)।इससे पहले कि आपको परमेश्वर के समक्ष ऐसा करना पड़े, आज ही स्वयं ऐसा करें।

बुद्धिमान लोग यह पहचान पाएंगे कि परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए, भीतर की दुष्टता बाहर की दुष्टता से कहीं अधिक छली और भयावह है। जहां इस संसार के सभी ख़तरनाक प्रलोभनों से घृणा करना भला और धार्मिक है, वहीं वास्तव में यह आपके हृदय की छली लालसा ही है जो आपका सबसे बड़ा शत्रु है। परमेश्वर के समक्ष विश्वासयोग्यता और विनम्रता के साथ अविरत सतर्कता आपकी आत्मा का उद्धार करेगी। पूर्ण लगन से अपने हृदय की चौकसी करें, ताकि किसी भी तरह के अभिमानी विचार उत्पन्न न हों (नीतिवचन 4:23)।

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