नीतिवचन 16:10

राजा के होंठों पर दैवी निर्णय होता है, और न्याय करने में उसका मुंह अपराध नहीं करता। (केजेवी)

बाइबल में राजनीतिशास्त्र? वास्तव में! एक राजा के द्वारा एक राजा के लिए लिखा – सुलैमान ने अपने बेटे को! क्या आप इस शिरे से खोद-खोदकर सोना निकालेंगे? इस में मेहनत लगेगी। वह सीखें जो ज्यादातर राजनेताओं ने नहीं सीखा है। यहां राजनैतिक शासकों के लिए, और परोक्ष रूप से उस हर व्यक्ति-विशेष के लिए जो अधिकार के पद पर है, बुद्धिमानीपूर्ण सलाह है।

इससे पहले कि हम परमेश्वर-प्रेरित इस पाठ की व्याख्या करें और उसका व्यावहारिक उपयोग करें, यह पता करना आवश्यक है कि सुलैमान के कहने का अर्थ क्या नहीं था। पवित्रशास्त्र के प्रत्येक वचन का सही अर्थ अवश्य ढूंढा जाना चाहिए (नेह 8:8), और इसका सर्वोत्तम तरीका है, इस नीतिवचन जैसे वचनों का ठीक-ठीक विभाजन करना (2 तीमुथियुस 2:15)।

यहां प्रयुक्त मात्र शब्दावली ही अपने आप में पर्याप्त है, जिस में अपवाद की कोई सम्भावना नहीं, परन्तु एक विश्वव्यापी नियम की घोषणा की जा रही है। यह नीतिवचन बताता है कि : राजा सिद्ध न्याय की घोषणा करने के द्वारा परमेश्वर के प्रतिनिधि-स्वरुप बोलता है। आपको यह समझना है कि राजा को क्या माना जा रहा है, और वह कैसे इस तरह की सिद्धता को प्राप्त करता है।

पहला, यह नीतिवचन जीवन का अवलोकन नहीं है, या सामान्य रूप से राजनैतिक शासकों के ऐतिहासिक तथ्य नहीं है, क्योंकि सांसारिक राजा इस में वर्णित योग्यता को कार्यरूप में साकार नहीं कर पाएं हैं। यहाँ तक कि दाऊद और सुलैमान, जो राजाओं में सबसे बुद्धिमान थे, उन्होंने भी इस मानक का उल्लंघन किया, हालाँकि समय समय पर वे ईश्वर-प्रेरित बुद्धि से बोलते थे।

दूसरा, यह नीतिवचन परमेश्वर द्वारा अपनी सम्प्रभुता में राजनैतिक शासकों का उपयोग किये जाने की शिक्षा नहीं दे रहा है। जब एक राजा पाप करता है, तो परमेश्वर की गुप्त इच्छा पूरी होती है (नीति. 21:1; व्यवस्था. 29:29; दानि 4:17; यशा. 10:5-15), परन्तु यहाँ इसका यह तात्पर्य नहीं है, क्योंकि यह व्यावहारिक मूल्य को दूर कर देगा और अन्य राजकीय नीतिवचनों के साथ विरोधाभास उत्पन्न करेगा।

तीसरा, यह नीतिवचन शासकों को परमेश्वर के राजदूतों के रूप में सम्मानित करने के विषय में एक अस्पष्ट चेतावनी नहीं है, यद्यपि यह बुद्धि का एक नियम है (रोमि. 13:1-7; 1 पत. 2:13-17), क्योंकि इस नीतिवचन में प्रयुक्त कड़ी भाषा ऐसी सीमित व्याख्या से बढ़कर है, जिसमें कई अपवाद हैं (दानि. 3:16-18; प्रेरितों. 4:19)।

चौथा, यह नीतिवचन यीशु मसीह के विषय में भविष्यवाणी नहीं है, यद्यपि वह एक ऐसा राजा है जो पूरी सिद्धता से सिद्ध धर्मपरायण के इस वर्णन के मानक को पूरा करता है। यदि यह यीशु मसीह के विषय में होता, तो उचित होते हुए भी सुलैमान ने अपने लेखन में घोषित उद्देश्य को छोड़ दिया और एक ऐसे नीतिवचन को शामिल किया जिसमें उपयोगी मूल्यों की कमी थी।

तो फिर इस पाठ का अर्थ और शिक्षा क्या है? यह नीतिवचन “क्या है” का राजनीतिक इतिहास नहीं है, बल्कि “क्या होना चाहिए” के लिए राजनीतिक बुद्धि है, यही बात इसे राजनेताओं के लिए एक अनुदेशपूर्ण आज्ञा का रूप देती है। यह नीतिवचन यहाँ इस अध्याय में और इस पुस्तक में है जिसमें शासकों के सफल कार्यकाल के लिए नियम हैं, ताकि राजाओं को उनके पावन कर्तव्यों को पूरा करने की नसीहत दे कि वे अपने कार्यकाल में बिना समझौते या ग़लती के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करे।

यहाँ किस राजा का जिक्र है? यहां किसी विशेष राजा का उसके नाम के साथ उल्लेख नहीं है, बल्कि यह एक भले और भक्त राजा, एक कुलीन और धर्मी राजा के सुलक्षण का वर्णन है, जो कि सुलैमान ने अपने पुत्र को बनाने की अभिलाषा की। राजा इस नीतिवचन में वर्णित योग्यता को कैसे प्राप्त करता है? अपने हृदय में एक महान उद्देश्य रखने और राज्य करने का प्रशिक्षण लेने के द्वारा!

इस नीतिवचन में शब्द-लोप है जो अपने अर्थ को और भी रहस्यमय बना देता है (नीति 1:6)। यह नीतिवचन केवल धर्मी राजाओं को चित्रित करता है, जिसका अभिप्राय यह है कि “भले राजा के होंठों पर दैवी निर्णय होता है”। शब्द “भले” का ऐसा ही लोप कुछ और स्थानों में देखा जा सकता है (नीति 18:22; 15:10, 23; सभो 7:28)। राजाओं के विषय में अन्य नीतिवचन इस स्पष्टीकरण की पुष्टि करते हैं (नीति 14:35; 16:12-13, 15; 20:8, 26, 28; 22:11; 25:5; 29:4, 14)।

दाऊद और सुलैमान दो बड़े महान राजा थे जो महिमा और प्रतिष्ठा के धनी थे (2 शमू 14:17; 1 राजा 3:28)। फिर भी उन्होंने अपने मुंह से अनुचित बातें की, और उन्होंने न्याय को विकृत किया (2 शमू 11:14-17; 23:3-5; 1 राजा 11:1-11)। सुलैमान के नीतिवचन जिन में से कई राजनीतिक सिद्धांतो से सम्बंधित हैं, उसके पुत्र को शिक्षा और निर्देश देने के लिए लिखे गए थे कि वह इस्राएल का एक विश्वासयोग्य और बुद्धिमान शासक बने। आप इस राजा से भी सबक को सीख सकते हैं।

यहां एक राजनीतिक कर्तव्य है। एक राजा को परमेश्वर की सहायता से क्या उद्देश्य रखना चाहिए, इसकी नीति यहां पर दी गई है। और इसी को अंजाम देने के लिए परमेश्वर के लोग शासकों के लिए प्रार्थनाएं करेंगे (एज्रा 6:10; यिर्म 29:7; 1 तिमु 2:1-3)। कल्पना करें, कि यदि इस संसार के सब राजनेताओं ने अपने कर्तव्यों को इसी रीति से पूरा करने का संकल्प किया होता, तो क्या होता -उनके देश न्याय, समृद्धि और शांति में अभूतपूर्व उन्नति करते- किंतु हाय, उनके दिमागों को ऐसी दिव्य शिक्षा के बजाय आधुनिक मानवतावादी गुरुओं की दुराचारी उद्देश्यहीन बकवास और तर्कहीन मूल्यों से कूट-कूटकर भरा दिया गया है; जो वास्तविक बुद्धि से पूर्णतः खाली हैं।

बुद्धि परमेश्वर का भय मानने पर निर्भर करती है (नीति 1:7; 9:10; 15:33), और उसकी शिक्षा परमेश्वर के वचन से ही दी जाती है (भजन 19:7-11; 119:130)। एक बुद्धिमान राजा, जो परमेश्वर के वचन के आगे थरथराता है, उसके मुंह में परमेश्वर का निर्णय होगा, क्योंकि उसके न्याय के कार्य परमेश्वर की इच्छा को प्रतिबिम्बित करते हैं (व्यवस्था 4:5-8; नीति 8:6-21)। इसलिए, परमेश्वर ने इस्राएल के राजाओं को आज्ञा दी कि पवित्रशास्त्र हमेशा उनकी आंखों के सामने रहे (व्यवस्था 17:18-20)। और हमारे देश की न्यायपालिका, राजनेता, और सरकारी अधिकारी यदि बाइबल की इस मांग को पूरा करें तो उन्हें अवश्य ही लाभ होगा।

सब अधिकार परमेश्वर की ओर से ही हैं, उसने ही मानव-शासन के लिए पांच क्षेत्र स्थापित किए हैं – माता-पिता, मालिक, पति, सरकारी अधिकारी, और आपका पास्टर जो आपका आत्मिक शासक है। न्याय करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना प्रत्येक शासक का सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए (रोमि 13:1-7; 1 कुरि 4:1-4; इफि 6:4; याकूब 3:1)। और परमेश्वर द्वारा नियुक्त इन अधिकारियों की अधिनता में रहना प्रत्येक नागरिक का एक नित्यक्रम होना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने के द्वारा वे परमेश्वर का आदर-सम्मान करते हैं, एक सुव्यवस्थित समाज का निर्माण करते हैं, और स्वयं ही शांति को कायम करते हैं।

सरकारी और राजनीतिक शासक जो इस बुद्धि की उपेक्षा करते हैं, उनकी आलोचना करने और गाली-गलौच करने, या उनके कुशासन पर शोक मनाने के बजाय, आपको यह चिंतन करना चाहिए कि आप अपने आधिकारिक भूमिका के सम्बंध में क्या कर रहे हैं? प्रत्येक पुरुष (या स्त्री) जो किसी पद या अधिकार के स्थान पर बैठा है, उसे भी इस रीति से सिद्ध न्याय करना चाहिए कि मानो वह अपने अधिकार-क्षेत्र में साक्षात परमेश्वर का ही प्रतिनिधित्व कर रहा है, फिर चाहे वह भूमिका माता-पिता के रूप में हो, या पास्टर के रूप में। इससे परमेश्वर की महिमा होगी, जो आपकी देखरेख में हैं वह लाभ पाएंगे, और समृद्ध होंगे, और आप उसके प्रतिफल का आनंद लेंगे (नीति 16:20)।

न्याय के इस उच्चस्तरीय मानक को कायम करने का एकमात्र तरीका है बाइबल का गहन और चिंतनशील अध्ययन करना, क्योंकि उसी में सब मसलों के लिए परम और अंतिम हल दिए गए हैं (नीति 22:17-21; भजन 119:128; यशा 8:20; 2 तिमु 3:16-17)। जो मनुष्य परमेश्वर के वचन में प्रशिक्षित होता है, उसके मुंह से परमेश्वर की ही वाणी निकलेगी (रोमि 3:1-2; इब्रा 5:12-14; 1 पतरस 4:11)। यदि कोई मनुष्य परमेश्वर पर अपना पूरा भरोसा व्यक्त करता है, तो वह ऐसे मनुष्य को इस नीतिवचन की बुद्धि देगा (नीति 3:5-6; 16:3; 1 शमू 10:9; 1 राजा 3:5-14; भजन 119:98-100; याकूब 1:5)।

केवल एक ही सच्चा धर्मी राजा है, अर्थात् प्रभु यीशु मसीह (2 शमू 23:1-5; भजन 45:6-7; 89:19-37; यिर्म 23:5-6)। उसके होठों पर परमेश्वर का निर्णय है, और वह न्याय करने में कोई अपराध नहीं करता। वह इस समस्त विश्व पर शासन करता है, और वह इस जगत का न्याय करने जल्द आ रहा है। वह धन्य और एकमात्र अधिपति है। वह घोषणा करेगा, “हे शापित लोगो, मुझ से दूर होकर उस अनन्त अग्नि में जा पड़ो जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है!” (मत्ती 25:41)। पुत्र को चूमो, अर्थात् अपने अपराधों से उद्धार पाने के लिए यीशु मसीह पर विश्वास रखो, कहीं ऐसा न हो कि वह क्रोध से भड़क उठे (भजन 2:10-12)।

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