नीतिवचन 15:7
बुद्धिमान लोग बातें करने से ज्ञान को फैलाते हैं, परन्तु मूर्खों का मन ठीक नहीं रहता।
सुचना-क्रांति एक महान सुअवसर है। यह बातें करके (या टाइप करके या टेक्स्ट करके) ज्ञान फैलाने का अवसर है। साथ ही, यह एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है, क्योंकि कई लोगों द्वारा इसके मूर्खतापूर्ण उपयोग से परमेश्वर क्रोधित हैं। बुद्धिमान लोग सत्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ताकि उसे वे दूसरों तक पहुंचा सकें, लेकिन मूर्ख केवल व्यर्थ बातों का शोर मचाते हैं। आप परमेश्वर-प्रदत्त इस उपहार का क्या करेंगे, खासकर जब परमेश्वर ने आपको बताया है कि इसका उपयोग कैसे करना है?
आपका मुंह सिर्फ़ खाना खाने के लिए नहीं है। यह ज्ञान फैलाने के लिए भी है। चूँकि आपका मन आपके मुंह को बोलने के लिए विषयवस्तु देता है, इसलिए सब बातों से बढाकर इसकी रक्षा करना आपके लिए ज़रूरी है और वह दूसरों के साथ साझा करने के लिए उत्तम विषयवस्तु से भरा होना चाहिए (नीतिवचन 4:23; 22:17-21)। चूँकि आज के ज़माने में कंप्यूटर और फोन के कीबोर्ड ज़्यादातर बातें करते हैं, इसलिए यह सबक ईमेल और सोशल मीडिया पर भी लागू होता है।
आपकी बातें आपके चरित्र का प्रमाण है, और यह इस बात निर्धारित करता है कि आप इस दुनिया में अपना कौन-सा प्रभाव छोड़ने वाले हैं। बुद्धिमान लोग अपने मुंह का उपयोग ज्ञान फैलाने के लिए करते हैं, लेकिन मूर्खों की वाणी किसी का भला नहीं करती। यदि आप बुद्धिमान हैं, तो आपके शब्दों से दूसरों को लाभ होगा; यदि आप मूर्ख हैं, तो दूसरों का नुकसान ही होगा। आपको अपने लिए ज्ञान चुनना होगा और फिर उसे दूसरों तक भी पहुँचाना होगा।
यहाँ एक सरल प्रयोक्ति है। आपके मुँह को सजाने वाली दो गुलाबी मांसपेशियाँ, अर्थात होंट, ज्ञान नहीं दे सकतीं और न ही आपके सीने में धडकता मुट्ठी के आकार का पंप, अर्थात, दिल। ये शब्द-प्रयोग वाणी के लिए प्रयुक्त पर्यायवाची शब्द हैं – आपका मन शब्दों का निर्माण करता है, और आपके होंठ उनका उच्चारण करते हैं। बुद्धिमान लोग दूसरों की मदद करने के लिए वाणी का उपयोग करते हैं, लेकिन मूर्ख लोग ऐसा नहीं करते, क्योंकि उनके मन और मुँह मूल्यहीन होते हैं।
सबक यह है कि अपने मन को ज्ञान और सत्य से भरें और अपने मुँह (या कीबोर्ड) को इसे दूसरों तक फैलाने के लिए निर्देशित करें। मूर्ख का मन मूर्खता से भरा होता है, इसलिए वह किसी की मदद नहीं कर सकता। उसकी वाणी लकड़बग्घे या कुत्ते के भौंकने या चिल्लाने जैसा होती है, और उसका मन भी इससे बेहतर नहीं होता। मनुष्यों के बीच अंतर का फैसला इस बात से होता है कि वे दूसरों की भलाई के लिए बोलने अपने मन को किन बातों से भरते हैं।
कल्याणकारी बातें बोलने का वरदान एक महान विशेषाधिकार है। विचार करें कि आप ऐसे शब्दों का संचय बना सकते हैं जिन्हें स्वर्ग में परमेश्वर स्वयं सुन सकता है और आनंदित हो सकता है। यही वजह है कि वह बुद्धिमान लोगों की जीभ को उनकी महिमा कहता है (भजन 16:9; 30:12; 57:8; 108:1)। मनुष्य अच्छे शब्द बनाकर अपनी जीभ से महिमा दे सकते हैं। लेकिन मूर्ख लोग गाली देते हैं, मज़ाक उड़ाते हैं और मूर्खतापूर्ण बातें करते हैं। ऐसा न हो!
आज आप अपनी बातों से दूसरों को कैसे प्रभावित करेंगे? क्या आप उनका ज्ञान बढ़ाएँगे? या आप उनके कानों को व्यर्थ शोर से भर देंगे और उन्हें कोई लाभ नहीं पहुँचाएँगे? परमेश्वर ने आपको उसकी स्तुति करने और दूसरों का भला करने के लिए एक मन और होंठ दिए हैं। उसने आपके मन को ज्ञान से भरने के लिए बाइबल भी दीं है, ताकि आपके पास बोलने के लिए अद्भुत वचन हों (नीतिवचन 22:17-21; भजन 119:146; II तीमुथियुस 3:16-17)।
सावधानी से चुने गए और बुद्धिमानी से बोले गए वचन सुंदर होते हैं, जिसके लिए परमेश्वर और मनुष्य दोनों आपको उच्च सम्मान देंगे और अनुग्रह करेंगे (नीतिवचन 12:14,18; 15:23; 16:13,24; 22:11; 24:26; 25:11)। बुद्धिमान लोग ऐसे वचनों का उपयोग बहुतों का आत्मिक, और मानसिक पोषण करने के लिए करते हैं (नीतिवचन 10:21; 11:30)। वे अपने आस-पास के लोगों के लिए जीवन के वृक्ष होते हैं, लेकिन मूर्ख पाप और मृत्यु के जाल हैं (नीतिवचन 15:4)। आप कितने लोगों का आत्मिक, और मानसिक पोषण करते हैं?
मूर्ख बहुत बोलते हैं, लेकिन उनके शब्द सिर्फ़ शोर होते हैं (सभोपदेशक 5:3; 7:6; 10:12-14)। परमेश्वर बकबक के तथाकथित वरदान को बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि यह शोरगुल सरासर बकवास या उससे भी बदतर होता है। इसलिए उसने मूर्खतापूर्ण बातें और मज़ाक को व्यभिचार और गंदगी के बराबर पाप कहकर उसकी भर्त्सना की (इफिसियों 5:3-10)। यीशु ख्रिस्त के हर शिष्य को ऐसी सभी बातों को अस्वीकार करना चाहिए। न्याय का दिन आ रहा है!
ज्ञान क्या है? ज्ञान कोई तुच्छ तथ्य नहीं होते है; यह दूसरों के बारे में समाचार नहीं है; यह आकस्मिक वार्तालाप नहीं है; यह महत्वहीन बकबक नहीं है; यह सांसारिक प्रवचन नहीं है; यह मौसम का पूर्वानुमान नहीं है। ज्ञान वह सूचना और सलाह है जिससे परमेश्वर की महिमा होती है और व्यक्ति को पाप से छुड़ाकर स्वर्ग और पवित्रता की ओर ले जाती है। यह सत्य और बुद्धि है उचित रीति से व्यावहारिक लागूकरण किया जाता है।
या संसार झूठे और मूर्खतापूर्ण शोर से भरा पड़ा है – बोला गया शोर, छपा हुआ शोर और पढ़ा हुआ शोर। आज वे बुद्धिमान पुरुष और महिलाएँ कहाँ हैं जो कभी ज्ञान, सत्य, बुद्धि और समझ की घोषणा किया करते थें? वे कहाँ हैं जो परमेश्वर में घमण्ड करेंगे और उसकी स्तुति करेंगे (भजन 34:1-3; 145:1-12)? वे कहाँ हैं जिनके पास दूसरों के प्रश्नों के लिए सत्य के वचनों से तैयार किएँ हुएं उत्तर होते थे (नीतिवचन 22:17-21)?
हर ख्रिश्चन विश्वासी ज्ञान सिखा सकता है। उन्हें सिखाना भी चाहिए। प्रेरित ने इब्रानी विश्वासियों को उनकी अज्ञानता और शिक्षक बनने और खरी शिक्षा देने की एक निरंतर बनी रहनेवाली कमी के कारण फटकार लगाई। अब समय आ गया था कि वे दूसरों को सिखा सकें, लेकिन उन्होंने अपनी शिक्षा और बोलने की क्षमता को बरबाद कर दिया था (इब्रानियों 5:12-14)। बोलने से पहले, आपको सुनना, मनन करना, अध्ययन करना और सत्य को लागू करना आवश्यक होता है।
हमारे धन्य प्रभु यीशु मसीह के पास विद्वानों की जीभ थी और वे जीवन देनेवाली बातें बोलना जानते थें (यशायाह 50:4)। उन्होंने अपने बोलने के हुनर का इस्तेमाल कई लोगों को सांत्वना देने, पोषण करने, चेतावनी देने और डांटने के लिए किया (यशायाह 61:1-3)। उनकी वाणी ने उनके मित्रों को आनन्दित किया और उनके शत्रुओं को भ्रम में डाल दिया (मत्ती 7:28-29; 22:46; मरकुस 12:37; लूका 4:22; यूहन्ना 7:46)। क्या आप उनके जैसा बोलना सीखेंगे (इफिसियों 4:29; कुलुस्सियों 4:6)?
प्रिय पाठक, आज अज्ञानता का बोलबाला है और दूसरों को आपकी ज़रूरत है। क्या आप आज अपने मुँह से परमेश्वर के ज्ञान को फैलाएँगे? या आप शोरगुल और मूर्खता से हवा भर देंगे? यीशु मसीह की इस चेतावनी को याद रखें: “परन्तु मैं तुम से कहता हूँ कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन वे हर एक उस बात का लेखा देंगे ” (मत्ती 12:36)।
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