नीतिवचन 15:29

यहोवा दुष्टों से दूर रहता है, परन्तु वह धर्मियों की प्रार्थना सुनता है।

प्रार्थना आपका अधिकार नहीं है। प्रार्थना एक विशेष सौभाग्य है, एक धन्य सौभाग्य। परमेश्वर किसी भी मनुष्य की प्रार्थना सुनने के लिए बाध्य नहीं है, और वह दुष्टों की प्रार्थना का तिरस्कार करता है। परन्तु जैसी कि उस ने प्रतिज्ञा दी, वह धर्मियों की प्रार्थना सुनता है। वह उन्हें कोमलता से, सामर्थशाली रूप में, और तुरन्त उत्तर देता है। यहूदी इस स्वयंसिद्ध सिद्धान्त को ठीक ठीक समझते थें (यूहन्ना 9:31)।

इस नीतिवचन में उल्लेखित दुष्ट वे हैं जो पाप करते रहते हैं, कोई भी पाप, चाहे वह एक ही तरह का पाप क्यों न हो। वे जानते हैं कि वे पाप कर रहे हैं, लेकिन उन्हें परवाह नहीं है। परन्तु वे कबूल नहीं करते और न ही उसे करना छोड़ते हैं। वे परमेश्वर के वचन, उसके सेवकों, उनकी फुसफुसाती अंतरात्मा की आवाज़ को और पवित्र आत्मा की दोषी ठहराने वाली चेतावनियों को नजरअंदाज करते हैं। उन्हें लगता हैं कि वे अपने पाप से बच जायेंगे। उसे छोड़ना या उसका तिरस्कार करना उनकी दृष्टि में इतना महत्वपूर्ण नहीं है। वे अपने पाप को ढोंगी धार्मिकता की आड़ में छिपाते हैं।

आप अपने पाप को अपने माता-पिता, अपने जीवनसाथी, अपने बच्चों, अपने चर्च और अपने पास्टर से छिपा सकते हैं। वे हमेश की तरह आपके साथ दयालुता और स्नेह से पेश आते रहेंगे। आप पाखंड से दोस्तों और परिवार को धोखा दे सकते हैं, लेकिन आप परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकते। यह एक ऐसा फ़र्क है जिसे याद रखा जाना चाहिए, क्योंकि आपका दुष्ट हृदय मूर्खतापूर्ण ढंग से यह मान लेगा कि चूँकि आपके गुप्त पापों के लिए आपको कोई दण्ड नहीं दे रहा है, इसलिए परमेश्वर भी आपको कोई दण्ड नहीं देगा।

यहोवा प्रत्येक मनुष्य के मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है (इब्रानियों 4:12)। उसकी पवित्र नज़र से कुछ भी छिपा नहीं है (इब्रानियों 4:13)। वह विचार, शब्द और कर्म के हर पाप को साफ़ साफ़ देखता और उसे जानता है (नीतिवचन 15:3; भजन 139:1-12)। और वह उनकी अनदेखी नहीं करता। वह उनसे दुखी हो जाता है और अपमानित होता है, और जब तक आप उन्हें कबूल नहीं करते और छोड़ नहीं देते, तब तक वह आपकी प्रार्थना नहीं सुनेगा। उसकी आशिषों के बिना आपका सारा जीवन व्यर्थ है, और अन्त में वह आपको उचित दण्ड देगा।

जब स्थान और जानकारी की बात आती है, तो यहोवा दुष्टों से दूर नहीं निकट ही रहता है, क्योंकि स्वर्ग और पृथ्वी दोनों उस से परिपूर्ण हैं, और कोई भी उस से छिप नहीं सकता (यिर्मयाह 23:24)। लेकिन जब उनकी मदद करने, उन्हें सांत्वना देने, उन्हें आशीष देने और उनके साथ संगति रखने की बात आती है, तो इस मामले में वह उन से कोसों दूर है। वह उनकी दुष्टता देखने से दूर नहीं निकट ही रहता है, परन्तु उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर देने से वह बहुत दूर है। और न्याय के महान दिन, वह उनसे कहेगा कि वे उससे दूर हो जाएं और नरक की उस आग में चले जाएं जिसे उसने उनके लिए युगानुयुग के लिए तैयार किया है (मत्ती 7:23)।

बाइबल के पवित्र परमेश्वर के विरुद्ध पाप इतना अपमानजनक है, खासकर तब जब आप अच्छे से जानते हैं, कि आपके बलिदान भी उसके लिए घृणित हैं (नीतिवचन 15:8)। जब आप उसके वचन के प्रचार के खिलाफ विद्रोह करते हैं, तो वह आपकी प्रार्थनाओं को घृणित मानता है (नीतिवचन 28:9)। जब आप अपने ऐसे पाप को छिपाते हैं जिसे आपने कबूल नहीं किया, वह आपकी आराधना को तुच्छ जानता है (यशायाह 1:10-15; 58:1-11)।

परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह का यह अपराध इतना बड़ा है कि जब आपको उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी तब वह आपकी विपत्ति पर हँसेगा और आपका मज़ाक उडाएगा (नीतिवचन 1:24-31)। यदि आप अभी उसके दोषी ठहराए जाने को और शिक्षा को मानने से इनकार करते हैं, तो बाद में वह भी आपकी विपत्ति पर हंसेगा। ख्रिश्चन पाठक, यह सोचने का साहस भी न करें कि आप उपदेश को हल्के में ले सकते हैं। यह सोचने की हिम्मत भी न करें कि आप अपने गुप्त पाप उससे भी गुप्त रख सकते हैं और विपत्ति में परमेश्वर आप पर तरस खाएगा।

शाऊल की दुष्टता के कारण यहोवा ने उसे छोड़ दिया (1 शमू 16:14)। और यद्यपि उसने दया की भीख माँगी, यहोवा ने उसका न्याय किया और उसका राज्य दाऊद को दे दिया (1 शमू 15:28-30)। वह अपनी प्रार्थनाओं को परमेश्वर द्वारा सुनी जाने के लिए इतना बेतरसा कि वह शमूएल को जादू से प्रकट कराने के लिए एन्दोर में एक भूत–सिद्धि करनेवाली के पास चला गया, जिसने उसे और भी दोषी ठहराया (1 शमू 28:5-20)। लेकिन दाऊद को विश्वास था कि परमेश्वर की उपस्थिति मृत्यु में भी उसकी रक्षा करेगी और वह उसे आशीष देगा (भजन 139:7-10)।

दाऊद ने भी पाप किया। उसने अपना पाप छुपाया और एक दर्दनाक सबक सीखा। उसने सीखा कि वह अपने पापों में लोटते नहीं रह सकता। उसने लिखा, “यदि मैं मन में अनर्थ की बात सोचता, तो प्रभु मेरी न सुनता” (भजन 66:18)। अत: उसने अपना पाप मान लिया, और यहोवा ने उसकी सुनी (भजन 32:5-6)। उसने यह भी लिखा, “परन्तु परमेश्वर ने तो सुना है; उसने मेरी प्रार्थना की ओर ध्यान दिया है” (भजन 66:19)।

इसलिए अपनी अंतरात्मा और जीवन का परीक्षण करना आपका बहुत बड़ा कर्तव्य है। परमेश्वर के मन के अनुसार यह मनुष्य बार बार और ठीक ठीक अपना आत्म-परिक्षण करता था (भजन 19:12-14; 26:2; 139:23-24)। इसलिए, आपको परमेश्वर की ज्योति में और अपने मन में पाप के विषय में उसकी प्रतीति के कारण खुद में जो भी बुराई दिखाई देती है, उसे तुरंत और साफ़ साफ़ मान लें (नीतिवचन 28:13; अय्यूब 33:26-28)। वह आपको क्षमा करने में विश्वासयोग्य है (1 यूहन्ना 1:9)।

पाप के लिए दोषसिद्धि परमेश्वर की विशेष दया है। यह आपके स्वर्गीय पिता की प्रेमपूर्ण बुलाहट है जो आपको अपने पास वापस बुला रहा है। जब आप पाप के लिए दोषसिद्धि महसूस करते हैं, तो आनन्द मनाएं कि परमेश्वर ने सदा के लिए आपका त्याग नहीं किया है, और उस दोषसिद्धि के अवसर का लाभ उठाकर अपने पापों को मान लें और उन्हें छोड़ दें। यदि आप विद्रोह करना जारी रखेंगे, तो वह अपना पितृवत् क्रोध प्रकट करेगा और आपको दंड देगा। लेकिन इससे पहले वह आपसे अपने प्रेमपूर्ण तरस से कहता है, “मेरी ओर फिर लौट आ” (यशायाह 44:22; मलाकी 3:7)।

जो लोग खुद को विनम्र करते हैं और पवित्र जीवन जीते हैं, यहोवा उनके साथ हमेशा अपने छुटकारे और आशिषों के साथ उपस्थित रहता है (2 इति 16:9; भजन 34:15-17; 138:6; याकूब 5:16; 1 पतरस 3:12)। यहोवा परमेश्वर की बात सुनो, और उसके वचन पर विश्वास करो, “जितने यहोवा को पुकारते हैं, अर्थात् जितने उसको सच्चाई से पुकारते हैं, उन सभों के वह निकट रहता है। वह अपने डरवैयों की इच्छा पूरी करता है, और उनकी दोहाई सुनकर उनका उद्धार करता है” (भजन 145:18-19)।

प्रिय पाठक, परमेश्वर आपकी हर प्रार्थना सुने, इसके लिए आपको सिद्ध होने की आवश्यकता नहीं है, ज़रूरत है तो सिर्फ़ अपने सब पाप कबूल करने की और उसकी व्यवस्था के पालन में अपनी असफलताओं को स्वीकार करने की। एलिय्याह को देखो, वह कैसा एक जंगली आदमी था। जब परमेश्वर अपने वचन में उसकी प्रार्थनाओं की शक्ति का विश्लेषण करता है, तो वह यह कहकर हमें सांत्वना देता है कि एलिय्याह भी उन्हीं दु:ख–सुख का भोगी मनुष्य था जिनका सामना हम प्रतिदिन करते हैं (याकूब 5:16-18)। धन्यवाद परमेश्वर!

हमारे प्रभु यीशु की हर प्रार्थना को परमेश्वर पिता ने सुना (यूहन्ना 11:42), क्योंकि वह सदैव वही काम करता था जिससे परमेश्वर प्रसन्न होता था (यूहन्ना 8:29)। उसकी ज़रूरत की सबसे भयावह घड़ी में, हालाँकि क्रूस को टाला नहीं जा सकता था, उसके पिता ने उसे सामर्थ देने के लिए एक स्वर्गदूत को भेजा (लूका 22:43)। और जब आप उसका भय मानते हो, तब यहोवा का दूत आपके चारों ओर छावनी करके आपको बचाता है। (भजन 34:7)

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