नीतिवचन 15:2
बुद्धिमान ज्ञान का ठीक बखान करते हैं, परन्तु मूर्खों के मुँह से मूढ़ता उबल आती है।
कई बार ऐसा होता है कि हम गलत बात कहते हैं, और कई बार सही बात को गलत तरीके से कहते हैं, या सही बात को गलत समय पर, या गलत व्यक्ति से कह देते हैं। बुद्धि हमें सिखाती है कि हमें क्या कहना चाहिए, कैसे कहना चाहिए, कब कहना चाहिए और किससे कहना चाहिए। सत्य का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। क्या आप जानते हैं कि जो सत्य आप जानते हैं उसे कैसे, कब और किससे कहना है? मूर्ख लोग दिव्य वाणी के इन चार नियमों की परवाह किए बिना बस बड़बड़ाते हैं, फिर भले ही वह सत्य का ज्ञान ही क्यों न हो।
सुलैमान ने अक्सर सिखाया कि मुँह की बातें स्पष्ट दिखाती हैं कि उन्हें बोलनेवाला बुद्धिमान है या मूर्ख है (नीतिवचन 10:18-19; 15:28; 17:27-28; 18:6-7; 29:11; सभोपदेशक 10:11-14) )। बुद्धिमान मनुष्य और या मूर्ख मनुष्य को उसकी वाणी से आसानी से पहचाना जा सकता है, जिसका मूल्यांकन इससे किया जाता है कि बातों की विषयवस्तु क्या है, बोलने का ढंग कैसा है, अवसर क्या है और सुननेवाले लोग कौन हैं। इस नीतिवचन को समझने की कुंजी गुणवाचक विशेषण “ठीक” है। बुद्धिमान मनुष्य ज्ञान की बातें ग्रहणीय रूप से बोलता है, परन्तु मूर्ख बिना यह जाने कि वह क्या कह रहा है, बक-बक करता रहता है।
यह नीतिवचन आपकी सफलता के लिए है। मूर्ख मनुष्य मामूली चीजों के बारे में बहुत अधिक बातें करते हैं, और दूसरों के साथ अपने रिश्तें खराब कर देते हैं और माहौल को गरम कर देते हैं। उन्हें अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने वाली आवाज बुलन्द करना अच्छा लगता है, लेकिन सुननेवालों को बोलने का कोई मौका नहीं देते, इसके परिणामस्वरूप ऐसा समय आता है जब वे सभी दोस्तों और उन्नति के अवसरों को खो देते हैं। हर बार जब वे अपना मुंह खोलते हैं और उनके आस-पास के लोगों को उनके बोलने के बाद परिस्थिति को सम्भालना पड़ता है, तो वे परेशान होकर थक जाते हैं और अन्त में उनसे अपना रिश्ता ही तोड़ देते हैं।
बुद्धिमान लोग तब तक चुप रहते हैं जब तक उनके पास कहने के लिए कुछ मूल्यवान और उन्नतिकारक बात न हो, और वे केवल वही कहते हैं जो आवश्यक है, ठीक ढंग से कहते हैं, सही समय पर कहते हैं, और जिनके लिए आवश्यक है सिर्फ़ उन्हीं से कहते हैं। जब ऐसे बुद्धिमान लोग बोलना शुरू करते हैं तो बाकि सब लोग तुरंत बोलना बंद करते हैं और उनकी सुनने लगते हैं, और उनके वक्ता-कौशल से सीख जाते हैं कि कब, कैसे और कहाँ क्या बोलना है। क्योंकि उनके सभी शब्द लाभदायक और ग्रहणीय हैं, और अन्य लोग उन्हें सुनना भी चाहते हैं, इसलिए उनकी बुद्धिमानिपूर्ण भाषण-शैली के कारण उन्हें अधिकार और प्रभाव के पदों पर पदोन्नत किया जाता है (नीतिवचन 16:13; 22:11)।
भक्तिपूर्ण विषयवस्तु क्या है? यह नीतिवचन कहता है कि बुद्धिमान लोग ज्ञान का बखान करते हैं। वे व्यर्थ राय नहीं देते, जैसा कि मूर्खों को अच्छा लगता है। वे उत्तर देने से पहले मन में सोचते हैं (नीतिवचन 15:28)। वे सत्य के निश्चित वचनों की लालसा रखते हैं (नीतिवचन 22:17-21)। वे जानते हैं कि पवित्रशास्त्र के विपरीत बातें बोलना विनाशकारी है (8:20 है)। वे अपने सुननेवालों की उन्नति करना चाहते हैं (इफि 4:29)। इसलिए आप भी केवल तभी बोलें जब आपके पास कहने के लिए सत्य हो (नीतिवचन 16:23), सुनने वालों के लिए महत्वपूर्ण हो (नीतिवचन 29:11); और अपनी बात को कम से कम शब्दों में रखें (नीतिवचन 17:27-28)।
भक्तिपूर्ण तरीका क्या है? यह नीतिवचन बताता है कि बुद्धिमान लोग ठीक बखान करते हैं, जिसका अर्थ है उचित रीति से, सही, बिलकुल सटीक। अनुग्रहसहित कही गई बातें सबके लिए ग्रहणीय होती हैं (नीतिवचन 22:11; सभो 10:12)। प्रभु यीशु इसी प्रकार बातें करता था (भजन 45:2; लूका 4:22), और यह एक आज्ञा भी है (कुलु. 4:6)। कृपापूर्ण वाणी सुखद, मनमोहक, शिष्ट, नम्र, भली, मनभावनी, और आभारपूर्ण होती है। प्रत्येक शब्द ऐसा कहें कि लोग आपसे प्रेम करने लगे (नीतिवचन 22:1; 24:26; 25:11)।
ठीक ठीक समय क्या है? बुद्धिमान व्यक्ति बोलने से पहले सुनता है (याकूब 1:19)। वह बात करने से पहले यह सुनिश्चित करता है कि वह स्थिति को जानता है (नीतिवचन 15:23; 18:13; यूहन्ना 7:24)। वह अपने श्रोताओं के अनुरूप अपनी बोलने की विषयवस्तु को बदलता है (नीतिवचन 25:20; 1 कुरिन्थ 9:19-23)। वह अपने से ज्ञानी मनुष्य को पहले बोलने देता है (अय्यूब 32:4-7)। वह जानता है कि बोलने में जल्दबाज़ी उसे मूर्ख से भी बदतर बना देती है (नीतिवचन 29:20), खासकर परमेश्वर के घर में (सभो 5:1-7)। बोलने में धीमें बनों! पहले सुनो, फिर सोचो, और सबका होने के बाद ही बोलो!
भक्तिपूर्ण श्रोता कौन-से होते हैं? सही समय पर अनुग्रहसहित बोले गए सत्य के वचनों को सुनने के लिए हर कोई पात्र नहीं होता। मूर्खों को पहली डांट-फटकार के बाद नजरअंदाज करें (नीतिवचन 26:4-5)। जो आपकी सलाह का मज़ाक उड़ाता है ऐसे व्यक्ति से पूरी तरह बचें (नीतिवचन 9:7-8)। प्रभु यीशु ने यह बुद्धिमान नियम सिखाया (मत्ती 7:6)। उपद्रवियों को चेतावनी दो, संतों को उपदेश दो, कमज़ोरों को सांत्वना दो, पापियों को डाँटो और बच्चों को शिक्षा दो (लैव्य 19:17; 1 थिस्स 5:14; इब्रा 10:25)।
ज्ञान और सत्य मनमर्जी से बोलने की इजाज़त नहीं देते। आप परमेश्वर द्वारा दिए गए ज्ञान और सत्य को कैसे उपयोग में लाते हैं, इसके लिए बुद्धि और भक्ति के नियम हैं। सब कुछ, जिसमें भाषण भी शामिल है, इस रीति से किया जाए कि मसीह यीशु के नाम को कलंक न लगे (1 कुरिन्थ 10:31-33; इफि 4:15)।
नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।