नीतिवचन 14:34

जाती की बढ़ती धर्म से होती है, परंतु पाप से देश के लोगों का अपमान होता है।

यदि यह नीतिवचन सच है तो अमेरिका एक महान राष्ट्र के रूप में बर्बाद होते जा रहा है। इस राष्ट्र का एक बड़ा भाग न केवल धार्मिकता की उपेक्षा करता है, बल्कि घृणा से उसका तिरस्कार भी करता है। यह न केवल पाप करने की अनुमति देता है, बल्कि उसे उग्र उत्साह के साथ बढ़ावा भी देता है। जब तक अमेरिका पश्चाताप नहीं करता और धार्मिकता की ओर नहीं लौटता, तब तक उसकी बर्बादी नहीं रुकेगी, क्योंकि यह नीतिवचन निश्चित रूप से सच है। केवल परमेश्वर ही सच्चा, और हर मनुष्य झूठा ठहरे!

आज भी अमेरिका के निर्वाहन के पीछे दो संभावनाएँ हैं। परमेश्वर उसके धर्मी नागरिकों और उनकी प्रार्थनाओं के कारण उसे बचा रहा है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार वह लूत के परिवार के कारण सदोम को बचाने के लिए तैयार था (उत्पत्ति 18:23-33), या फिर वह वहाँ के मूर्खों को भ्रामक समृद्धि देकर उसे तैयार कर रहा है, ताकी अंत: उसे अधोलोक में गिरा दे (नीतिवचन 1:32; व्यवस्थाविवरण 32:15-25; भजन संहिता संहिता 9:17; 50:21-23)।

परमेश्वर ने फिरौन को ऊँचा उठाया, परंतु यह एक आशीष नहीं थी। यहोवा ने यह केवल इसलिए किया ताकि वह सबसे बड़े राज्य के सर्वोच्च शासक को एक छोटे कीड़े के समान कुचल दे (निर्गमन 9:16; रोमियों 9:17)। निस्संदेह, वह माताएँ जो अपने बच्चों की शिक्षा में शामिल रहना पसंद करती हैं और जो सोचती हैं कि स्कूल में गर्म शाकाहारी भोजन मिलने से अमेरिका एक बेहतर देश बन जाएगा, वे बाइबल के इस गहन सत्य को स्वीकार नहीं करती और न ही समझ पाती हैं।

एक राष्ट्र का उत्थान तब होता है जब उसे ऊंचा उठाया जाता है, जब उसे पद, सम्मान, आंकलन, सामर्थ, या धन-संपत्ति में ऊंचा उठाया जाता है। एक राष्ट्र तिरस्कार तब होता है जब उसकी निंदा की जाती है, उसे बदनाम किया जाता है, उसका तिरस्कार किया जाता है, या उसके अपराधों के लिए उसे शर्मिंदा किया जाता है। एक समय था जब लोग महान और नेक कारणों से अमेरिका के तटों पर उमड़ पड़ते थे। सपनों और अवसरों की स्वर्णिम भूमि के रूप में, अमेरिका की प्रशंसा के गीत दूर-दूर तक गाए जाते थे। परंतु जो कभी बाकी राष्ट्रों के लिए हर्ष और आशा का कारण था, वह आज तेज़ी से एक घृणा का पात्र बनती जा रही है।

एक राष्ट्र जो प्रतिदिन 2 बिलियन डॉलर से बढ़ते जा रहे, 21 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज़ में डूबा हो, वह कितना महान कहलाता है? हॉवर्ड स्टर्न या एमटीवी को मनोरंजन मानने वाले लोग कितने गौरवशाली कहलाते हैं? वह राष्ट्र कितना महान कहलाता है जहां धर्म से अधिक धन पालतू जानवरों पर खर्च किया जाता है? वह राष्ट्र कितना धर्मी कहलाता है जहां दो पुरुषों के बीच विवाह संभव होता है? और जहां दो महिलाओं और एक बच्चे को परिवार के रूप में स्वीकार किया जाता है? ऐसे लोग कितने स्वतंत्र होते हैं, जहां अजन्मे बच्चे को जो दया की गुहार के बावजूद गर्भ में ही एक खिंचाव यंत्र के द्वारा टुकड़ों में मार डाल जाता है, सिर्फ एक मां के एक पल के आनंद और एक लोभी डॉक्टर के कारण।

किस तरह की संस्कृति एक युवा महिला को अपने बालों को बैंगनी रंग में रंगने, सफ़ेद आई शैडो लगाने, जीभ और शरीर के अन्य अंगों में स्टड पहनने, काले चमड़े और ज़ंजीरों वाले कपड़े पहनने, अराजक संगीत और गीत सुनने, और अपने प्रेमी के साथ सार्वजनिक स्थानों में एक पालतू जानवर की तरह व्यवहार करने की अनुमति देती है? यह स्वतंत्रता नहीं है। यह पागलपन है। यह कोई व्यक्तिगत पसंद नहीं है। यह परमेश्वर और अधिकारियों के विरुद्ध एक विद्रोह है। उसके पास इस प्रकार के कोई भी अधिकार नहीं हैं। बल्कि उस पर परमेश्वर और प्रकृति के प्रति कुछ ज़िम्मेदारियाँ हैं।

कनान के सात मूर्तिपूजक राष्ट्रों की दुष्टता ने, जो कि आज के अमेरिका के कुछ हिस्सों के समान ही खराब थे, परमेश्वर को उनके विषय में यह कहने पर मजबूर कर दिया, “और उनका देश भी अशुद्ध हो गया है: इस कारण मैं उस पर उसके अधर्म का दण्ड देता हूँ, और वह देश अपने निवासियों को उगल देता है” (लैव्यव्यवस्था 18:25)। उसने अपने लोगों, अर्थात इस्राएल को चेतावनी दी कि उनके साथ भी ऐसा हो सकता है, “तुम मेरी सब विधियों और मेरे सब नियमों को समझ के साथ मानना; जिससे यह न हो कि जिस देश में मैं ऐसा न हो कि जिस देश में मैं तुम्हें लिए जा रहा हूँ वह तुम को उगल दे” (लैव्यव्यवस्था 20:22)।

अमेरिका का पतन क्यों हो है? एडम स्मिथ, जिन्होंने 1776 में “राष्ट्रों की धन-संपत्ति की प्रकृति और कारणों पर एक जांच” नामक पुस्तक लिखी थी, इसका उत्तर नहीं जानते थे। परंतु सुलैमान, जो अब तक का सबसे बुद्धिमान राजा और राजनीतिक विश्लेषक था, इसका उत्तर जानता था। यह नीतिवचन जीवित और सच्चे परमेश्वर का प्रेरित ज्ञान है: धार्मिकता एक राष्ट्र को महान बनाती है; वहीं पाप राष्ट्रों को नष्ट और शर्मिंदा करता है। मनुष्य जितना चाहे अनुमान लगा सकते हैं और उपदेश दे सकते हैं, परंतु परमेश्वर ने ऐसा कह दिया है, और उसका नियम ही अंतिम है।

इस पुराने नीतिवचन को रोकने का कोई तरीका नहीं है। किसी भी राष्ट्रपति या कार्यकारी का हस्तक्षेप अमेरिका के पतन को नहीं रोक सकेगा। कोई भी कानून इस डूबते जहाज़ को बचा नहीं सकेगा। और कोई भी अदालती आदेश सर्वोच्च परमेश्वर के हाथ को नहीं रोक पाएगा। जब तक अमेरिका पश्चाताप नहीं करता, वह नीचे, नीचे, और नीचे गिरता जाएगा। शिक्षा के लिए अधिक धन देने से, जेलों में सुधार करने वाला कानून लागू करने से, या नाइकी द्वारा पृथक बस्तियों में बास्केटबॉल के मैच प्रायोजित करने से यह समस्या हल नहीं होंगी (नीतिवचन 19:21; 21:30)।

राजनीतिक और सामाजिक परियोजनाएँ व्यर्थ और ख़तरनाक होती हैं। वे समस्या को ही समझ नहीं पाते। उनके द्वारा कोई भी मूल्यवान उपलब्धि हासिल नहीं होती, बल्कि समस्या के वास्तविक समाधान से लोगों का ध्यान हटाकर और अधिक नुकसान करवाते हैं। जब तक मनुष्यों की आशा एक दूसरे से ही है, तब तक उनका पतन होता रहेगा, क्योंकि एक मनुष्य में कोई आशा नहीं होती। केवल यहोवा और धार्मिकता ही राष्ट्रों को बचा सकते हैं। यहाँ समस्या चरित्र और नैतिकता की है, जिन दोनों का अमेरिका ने तिरस्कार कर दिया है।

आप किसी राष्ट्र की महिमा या अपमान को कैसे मापते हैं? एक समय था जब अमेरिका भी उतना ही महान था जितना कि इजराइल मूसा, दाऊद और सुलैमान जैसे लोगों के अधीन हुआ करता था। दोनों ही राष्ट्र बुद्धि, न्याय, शांति, नैतिकता, विनोदपूर्ण आविष्कारों, धन-संपत्ति, सामर्थ, सम्मान, उचित्र सरकार, उत्कृष्ट व्यवस्था और परमेश्वर की उपस्थिति के लिए जाने जाते थे (नीतिवचन 8:12-21)। परंतु जिस प्रकार इजराइल निंदनीय बन गया है, उसी प्रकार अमेरिका भी निंदनीय बन गया है। अब यह मूर्खता, अपराध, भय, अति, कलह, कर्ज़ों, निर्धनता, कमज़ोरी, सत्तावादी सरकार, कानूनी अव्यवस्था और पतित धर्म के लिए जाना जाता है।

किसी राष्ट्र के उत्थान या अपमान के क्या कारण होते हैं? जब एक राष्ट्र परमेश्वर यहोवा का भय मानेगा और उसके पवित्रशास्त्र का पालन करेगा, तो वह राष्ट्र शीघ्र और निश्चित रूप से उत्थान पाएगा, क्योंकि वे ब्रह्मांड में सार्वजनिक और निजी ज्ञान के लिए एकमात्र विवरणिका का पालन कर रहा होगा। जब एक राष्ट्र पाप करेगा और उसे बढ़ावा देगा, तो वह एक अपमान और शर्म की बात होगी, क्योंकि पाप की परिभाषा चरित्र के बजाय भ्रष्टता का चुनाव करना होता है (व्यवस्थाविवरण 4:5-8)। इसका स्पष्टीकरण बहुत सरल है। सच्चे परमेश्वर ने यह घोषणा की थी कि, “दुष्ट अधोलोक में लौट जाएँगे, तथा वे सब जातियाँ भी जो परमेश्वर को भूल जाती हैं” (भजन संहिताा 9:17)।

क्या अमेरिका धर्मी है या फिर वह पापी है? आज अधिकांश सार्वजनिक स्थानों पर प्रार्थना और परमेश्वर की दस आज्ञाओं का विद्रोह किया जाता है; परंतु समलैंगिकता, कुरान और हैरी पॉटर जैसी चीज़ों का बचाव और प्रचार किया जाता है। सार्वजनिक स्कूलों में बाइबल की तुलना में मीन कैम्फ और द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज जैसी पुस्तकें अधिक लोकप्रिय हैं। यह राष्ट्र श्रमिक संघों, विकास, समलैंगिक विवाह, प्रति वर्ष दस लाख अजन्मे बच्चों की हत्या, जादू टोना, अराजकता और व्यभिचार को बढ़ावा देने वाले अश्लील मनोरंजन, विद्रोही बच्चों, समलैंगिक पास्टर, अराजक संगीत, बिना किसी गलती के तलाक देने आदि की अनुमति देता है और इनका बचाव करता है।

इस राष्ट्र का मसीही धर्म अधिकांश रूप से उस पतन की ओर बढ़ चुका है जिसके विरुद्ध पौलुस ने तीमुथियुस को चेतावनी दी थी (2 तीमुथियुस 3:1 – 4:4)। वे स्वार्थी, अपवित्र, भले लोगों का तिरस्कार करने वाले लोग हैं, जो परमेश्वर से अधिक सुख और आनंद से प्रेम करते हैं, जो धार्मिकता का केवल दिखावा करते हैं, जो मूर्ख स्त्रियों पर जोर डालते हैं, और जो उचित शिक्षा के बजाय मनोरंजन और कहानियों को चुनते हैं।

इसका इलाज क्या है? दुष्टता का खंडन, पापों का पश्चाताप, हृदयों का पुनरुद्धार, आचरण में सुधार, और बाइबल आधारित मसीही धर्म की पुनर्स्थापना! अमेरिका को बेहतर स्कूलों, आर्थिक सुधार, अधिक शिक्षकों, विशेष रूप से एनइए से कुछ भी और, अधिक स्वतंत्रता, अधिक आनंद, यूनीसेफ, आवारा पशुओं के लिए अधिक आश्रय, या ऐसे अन्य हास्यास्पद विचारों की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका को पहले कि तुलना में आज और अधिक बाइबल पढ़ने की और उसका पालन करने की आवश्यकता है।

अमेरिका सहित, किसी भी राष्ट्र को यदि वास्तव में समृद्ध होना है, तो उसके सत्ताधारियों और लोगों को बाइबल में सिखाई गई उचित जीवनशैली, सत्य और बुद्धि को स्वीकार करना होगा। उन्हें अधिकार के सभी पाँच क्षेत्रों में ऐसा करना होगा, अर्थात माता-पिता, पति, मजिस्ट्रेट, नियोक्ता और पादरी। उन्हें सभी संबंधों में और जीवन के सभी हिस्सों में इसे लागू करना होगा। भले ही बहुत अपूर्ण रूप में ही क्यों न किया जाए, परंतु ऐसा करने से प्राकृतिक और अलौकिक दोनों समस्याओं के समाधान में तत्काल सुधार होगा (2 राजाओं 17:24-41)।

प्रिय मसीही पाठक, आप अपने राष्ट्र को बचाने के लिए क्या करेंगे? आपको धार्मिकता से जीना चाहिए, दुष्टों के विरुद्ध खड़े होना चाहिए (नीतिवचन 28:4), अपने राष्ट्र के लिए प्रार्थना करनी चाहिए (यिर्मयाह 29:7), और अपने राष्ट्र में व्याप्त नैतिक पतन और गिरावट के सभी क्षेत्रों में संयम बनाए रखना चाहिए (यहेजकेल 22:30)। जैसे कि परमेश्वर ने अब्राहम के साथ सहमत होकर, लूत के धार्मिक परिवार के लिए पूरे सदोम को बचाने का निर्णय लिया, ठीक वैसे ही पवित्र जीवन जीने वाले और उत्साहपूर्वक प्रार्थना करने वाले मसीही, पूरे राष्ट्र की शांति को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं (1 तीमुथियुस 2:1-3; दानिय्येल 4:27)।

लेकिन उसके बजाय लोग “गॉड ब्लेस अमेरिका” गीत इस तरह गाते हैं जैसे कि उन्हें आशीषित करना परमेश्वर पर एक कर्ज़ है। अमेरिका को पूरे ब्रह्मांड के ज्ञान के एकमात्र स्त्रोत के पास लौटना होगा, जो कि बाइबल के पवित्र वचनों में घोषित सृष्टिकर्ता परमेश्वर की इच्छा है। अमेरिका को पवित्रशास्त्र पर ही टीके रहना चाहिए, अर्थात यीशु मसीह के सीधे द्वार और संकीर्ण मार्ग पर, और दुष्टों के पीछे लगकर अधोलोक में नहीं जाना चाहिए। संयमित समझौता धार्मिकता नहीं कहलाती है; यह प्रकल्पित पाप है!

क्या अमेरिका के लिए कोई दीर्घकालिक आशा बची है? यदि वह गहराई से और शीघ्र पश्चाताप करे, तो शायद हाँ। परमेश्वर ने सुलैमान से कहा, “तब यदि मेरी प्रजा के लोग जो मेरे कहलाते हैं, दीन होकर प्रार्थना करें और मेरे दर्शन के खोजी होकर अपनी बुरी चाल से फिरें, तो मैं स्वर्ग में से सुनकर उनका पाप क्षमा करूंगा और उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा” (2 इतिहास 7:14)। परंतु इस्राएल भी इस हद तक आगे बढ़ गया कि उसने उद्धार खो दिया, चाहे उसके लिए कोई भी प्रार्थना क्यों न कर रहा हो (यिर्मयाह 15:1; यहेजकेल 14:14)। इससे संबंधित टिप्पणियाँ नीतिवचन 1:26 और नीतिवचन 29:1 में देखें।

क्या अमेरिका के लिए कोई दीर्घकालिक आशा बची है? यदि वह पश्चाताप करने से इनकार करता है, और यदि वह मानव इतिहास के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है, तो बिल्कुल भी नहीं। अमेरिका इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि पवित्रशास्त्र की किसी भी ज्ञात भविष्यवाणी के स्थान को सुनिश्चित कर सके, परंतु बाइबल इन अंतिम दिनों के समय में नवीनीकरण और पुनरुद्धार को भयानक रूप से दर्शाता है। वास्तव में, शैतान को हालातों को और भी बदतर बनाने के लिए छोड़ा जा रहा है, परंतु धन्य और एकमात्र सामर्थशाली परमेश्वर जल्द ही दुष्टों का अंत करने और अपने चुने हुए लोगों को उनसे और इस संसार से बचाने के लिए आने वाला है (2 थिस्सलुनीकियों1:5-10; 1 तीमुथियुस 6:13-16; प्रकाशितवाक्य 20:7-15)।

यीशु मसीह के अद्भुत पुनःआगमन तक, जिसका मसीही लोग बड़ी उत्सुकता से इंतज़ार करते हैं, वह अपने अनुग्रह से विश्वासियों को विशिष्ट और एक पवित्र राष्ट्र का नागरिक बनाएगा, ताकि “जिसने तुम्हें अंधकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो” (1 पतरस 2:9)। विश्वासी लोग यीशु मसीह के आत्मिक राज्य के सदस्य हैं, जो इस भ्रष्ट संसार का नहीं है (यूहन्ना 8:23; 18:36)। उन्हें अपने राजा की यथासंभव सिद्ध तरीके से सेवा करनी चाहिए और उसके शानदार आगमन की प्रतीक्षा पूर्ण हृदय से करनी चाहिए (तीतुस 2:11-15)।

भजन संहिता लिखने वाला यह जानता था कि यदि धर्मी लोग दुष्टों से अलग हो जाएं, तो उनके लिए अभी ही आशा है। उसने लिखा है, “तू मुझको उबार और परदेशियों के वश से छुड़ा ले, जिन के मुंह से व्यर्थ बातें निकलती हैं, और जिनका दाहिना हाथ झूठ का दाहिना हाथ है। जब हमारे बेटे जवानी के समय पौधों का समान बढ़े हुए हों, और हमारी बेटियाँ उन कोनेवाले खंबों के समान हों, जो महल के लिए बनाए जाएँ, जब हमारे खत्ते भरे रहें और उन में भांति भांति का अन्न रखा जाए, और हमारी भेड़-बकरियाँ हमारे मैदानों में हज़ारों हज़ार बच्चे जनें; जब हमारे बैल खूब लदे हुए हों, जब हमें न विघ्न हो और न हमारा कहीं जाना हो, और न हमारे चौकों में रोना-पीटना हो, तो इस दशा में जो राज्य हो वह क्या ही धन्य होगा! जिस राज्य का परमेश्वर यहोवा है, वह क्या ही धन्य है!” (भजन संहिता 144:11-15)।

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