नीतिवचन 14:32
दुष्ट मनुष्य बुराई करता हुआ नष्ट हो जाता है, परन्तु धर्मी को मृत्यु के समय भी शरण मिलती है।
सब मनुष्य अंत में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। परन्तु कोई उसके विषय में बात नहीं करता। मनुष्य अपने आपको काम, राजनीति, खेल जगत, संगीत, नशीले पदार्थों आदि में उलझाकर अपना मन भटकाते हैं। वे इस प्रकार आचरण करते हैं मानो मृत्यु उन्हें कभी ढूँढ़ न निकालेगी। परन्तु जीवन में सबसे निश्चित और अटल बात तो मृत्यु ही है।
सब मनुष्य अंत में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। परन्तु दुष्टों की मृत्यु धर्मियों की मृत्यु की अपेक्षा कहीं अधिक भयानक होती है। मृत्यु दुष्ट मनुष्यों को उनके खिलौनों और उनकी सुरक्षित प्रतीत होने वाली अवस्थाओं से झपटकर छीन लेती है, और उन्हें बिना परमेश्वर और बिना किसी शान्ति-सांत्वना के अनन्तता में डाल देती है। धर्मी शान्ति से लेटता है और स्वर्ग रूपी अपने गन्तव्य के लिए इस जीवन से प्रस्थान करना स्वीकार करता है।
आप एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। आप कैसे मरेंगे? भय का राजा, अर्थात् मृत्यु स्वयं, अभी से आपका पीछा कर रही है। वह आपको हर सम्बन्ध से, हर सहायक से, हर सम्पत्ति से छीनकर अलग कर देगी। आप परमेश्वर के सामने अकेले, असहाय, नंगे, और पाप के दोषी के रूप में खड़े होंगे। दुष्ट इसी प्रकार मरते हैं।
दुनिया धर्मियों की अपेक्षा दुष्टों को अधिक ऊँचा उठाती है। वह मर्लिन मुनरो और प्रिन्सेस डायना जैसे व्यक्तियों का इतना गुणगान करती और उनकी स्मृति का ऐसा महिमामण्डन करती है कि इस नीतिवचन का भेद धुंधला पड़ जाता है। आपके लिए यह भेद देखना आवश्यक है, कहीं ऐसा न हो कि इस दुनिया के झूठ आपको बहकाकर दुष्टों की सी मृत्यु की ओर ले जाएँ, क्योंकि इन दोनों उदाहरणों को मृत्यु ने उनकी सब व्यर्थ शान्तियों से दूर हाँक दिया।
यीशु ने एक धनी मनुष्य की मृत्यु का वर्णन किया, जिसके पास इतना अधिक धन था कि आप समझते कि वह सचमुच सुख, सुकून और ऐशोआराम का जीवन जी रहा है। “परन्तु परमेश्वर ने उससे कहा, ‘हे मूर्ख! इसी रात तेरा प्राण तुझ से ले लिया जाएगा; तब जो कुछ तू ने इकट्ठा किया है वह किसका होगा?” (लूका अध्याय 12, वचन 20) इस धनी मूर्ख को भय के राजा ने जीवन से इस रीति से निकाल बाहर कर दिया कि वह अपने साथ एक पैसा भी न ले जा सका।
दुष्ट अपना स्वर्ग अभी इसी समय पा लेते हैं, क्योंकि उनका भाग इसी जीवन में है (भजन संहिता अध्याय 17, वचन 14)। परमेश्वर उन्हें अच्छी वस्तुएँ, सन्तान, और बड़ी-बड़ी सम्पत्तियाँ लेने देता है। परन्तु तब भी वे प्रायः उदास, टूटे हुए परिवारों में पड़े, एक अस्तव्यस्त जीवन जीते हुए, और शान्ति पाने के लिए नशीले पदार्थों तथा मद्यपान का सहारा लेते हुए पाए जाते हैं। परन्तु दाऊद जानता था कि मृत्यु के पश्चात् जागने पर वह परमेश्वर के स्वरूप को पाकर तृप्त होगा (भजन संहिता अध्याय 17, वचन 15)।
प्रिय पाठक, आप शीघ्र ही मरेंगे। उसके लिए तैयार होने को आपने आज क्या किया है? सुलैमान ने इसके विषय में बार-बार चेतावनी दी (नीतिवचन अध्याय 10, वचन 2; 11, वचन 4 और 19; 12, वचन 28; 13, वचन 14; 14, वचन 12; सभोपदेशक अध्याय 12, वचन 1 से 7)। यीशु और पौलुस, दोनों ने तैयारी करने के महत्त्व की शिक्षा दी (मत्ती अध्याय 7, वचन 21 से 27; 1 तीमुथियुस अध्याय 6, वचन 17 से 19)। दुष्टों की मृत्यु धर्मियों की मृत्यु से अत्यन्त भिन्न होती है। आप कौन हैं? आप कैसे मरेंगे?
जैसा सुलैमान के बहुत से नीतिवचनों में होता है, वैसे ही यहाँ भी दो समानान्तर उपवाक्य “परन्तु” के विरोधसूचक प्रयोग से आमने-सामने रखे गए हैं। इन दोनों उपवाक्यों की तुलना करने से स्पष्ट होता है कि “नष्ट हो जाना” या “हाँक दिया जाना” मृत्यु का ही बोध कराता है। दुष्ट मनुष्य, चाहे अपनी दुष्टता में कितना ही निश्चिन्त क्यों न हो, मृत्यु के द्वारा पृथ्वी पर से उखाड़ फेंका जाएगा। परन्तु धर्मी आशा सहित और सान्त्वना के साथ मरता है, क्योंकि मृत्यु उससे कहीं उत्तम किसी बात का द्वार है।
दुष्ट और धर्मी कौन हैं? दुष्ट वे हैं, जिनका घमण्ड उन्हें परमेश्वर के विषय में गम्भीरता से विचार करने नहीं देता (भजन संहिता अध्याय 10, वचन 4; 14, वचन 1)। वे जीवन में परमेश्वर के मार्ग के स्थान पर उस मार्ग को चुनते हैं जो लोकप्रचलित और भीड़ को प्रिय है (मत्ती अध्याय 7, वचन 13 से 14)। उन्हें इस बात की कोई चिन्ता नहीं होती कि बाइबल उनकी अधिकांश सोच और आचरण को दोषी ठहराती है, क्योंकि उन्होंने अपना जीवन उसी के लिए समर्पित कर दिया है जिसे यह दुनिया मान्यता देती है।
धर्मी जानते हैं कि उनका एक सृष्टिकर्ता है। वे जीवन में परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं, और वे जानते हैं कि मृत्यु के बाद उन्हें उसके सामने लेखा देना होगा (सभोपदेशक अध्याय 12, वचन 13 से 14)। वे बाइबल के दिखाए हुए मार्ग अनुसार जीने का चुनाव करते हैं, चाहे वह लोकप्रिय न भी हो, क्योंकि वे जानते हैं कि वही अनन्त जीवन की ओर ले जाता है (मत्ती अध्याय 7, वचन 13 से 14)। वे जगत से प्रेम नहीं रखते, क्योंकि वे जानते हैं कि जगत परमेश्वर का शत्रु है (1 यूहन्ना अध्याय 2, वचन 15 से 17; याकूब अध्याय 4, वचन 4)।
दुष्ट अपने जीवन को लेकर बड़े निश्चिन्त और आत्मविश्वासी होते हैं। वे यह मान बैठते हैं कि वे हमेशा जीवित रहेंगे (भजन संहिता अध्याय 49, वचन 6 से 13)। उनके लिए सबसे भयानक विचार मृत्यु का विचार है, और वे उसे अनदेखा करने तथा जितना हो सके टालने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु परमेश्वर ने कहा है, “चाहे हाथ पर हाथ मिलाया जाए, तौभी दुष्ट निर्दोष न ठहरेगा” (नीतिवचन अध्याय 11, वचन 21)। मृत्यु के साथ होने वाले युद्ध से किसी को छुट्टी नहीं, और दुष्टता मनुष्य को उससे बचा नहीं सकती (सभोपदेशक अध्याय 8, वचन 8)।
मृत्यु दुष्टों को नष्ट कर देती है। “पृथ्वी पर से उसका स्मरण मिट जाएगा, और बाजार में उसका नाम कभी न सुन पड़ेगा। वह उजियाले से अन्धियारे में ढकेल दिया जाएगा, और जगत में से भी भगाया जाएगा।” (अय्यूब अध्याय 18, वचन 17 से 18)। यह सब बहुत शीघ्र होता है, “इस से पहले कि तुम्हारी हांडियों में काँटों की आँच लगे, हरे व जले, दोनों को वह बवण्डर से उड़ा ले जाएगा।” (भजन संहिता अध्याय 58, वचन 9)।
“वह धनी होकर लेट जाए परन्तु वह गाड़ा न जाएगा; आँख खोलते ही वह जाता रहेगा। भय की धाराएँ उसे बहा ले जाएँगी, रात को बवण्डर उसको उड़ा ले जाएगा। पुरवाई उसे ऐसा उड़ा ले जाएगी, और वह जाता रहेगा, और उसको उसके स्थान से उड़ा ले जाएगी। क्योंकि परमेश्वर उस पर विपत्तियाँ बिना तरस खाए डाल देगा, उसके हाथ से वह भाग जाना चाहेगा। लोग उस पर ताली बजाएँगे, और उस पर ऐसी सुसकारियाँ भरेंगे कि वह अपने स्थान पर न रह सकेगा।” (अय्यूब अध्याय 27, वचन 19 से 23)।
परन्तु धर्मी को मरते समय आशा होती है, क्योंकि उसके भले कामों में अनन्त जीवन का प्रमाण प्रकट होता है (मत्ती अध्याय 25, वचन 31 से 40; 1 थिस्सलुनीकियों अध्याय 1, वचन 2 से 4; प्रकाशितवाक्य अध्याय 14, वचन 13)। वे जानते हैं कि मृत्यु उन लोगों के शरीर की केवल अस्थायी नींद है जो सदा जीवित रहेंगे (प्रेरितों के काम अध्याय 7, वचन 60; 13, वचन 36)। उनके शरीर बस कब्र में पड़े रहते हैं, और पुनरुत्थान के उस महान परिवर्तन की बाट जोहते हैं (अय्यूब अध्याय 19, वचन 25 से 27; भजन संहिता अध्याय 49, वचन 15; 73, वचन 24)।
धर्मी यीशु मसीह पर विश्वास रखते हैं और उससे प्रेम करते हैं, जो उनके स्थान पर मरा, ताकि मृत्यु का उन पर फिर कोई अधिकार न रहे (यूहन्ना अध्याय 5, वचन 24; 10, वचन 26 से 29; 11, वचन 25 से 26)। वे जानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा पर चलना उनके उद्धार का प्रमाण है, न कि किसी पापी की प्रार्थना का अपने होटों से केवल उच्चारण (मत्ती अध्याय 7, वचन 21 से 23)। वे अपने विश्वास के साथ बहुत से भले काम जोड़ते हैं, ताकि उनका अनन्त जीवन के लिए चुना जाना निश्चय होता जाए (2 पतरस अध्याय 1, वचन 5 से 11; याकूब अध्याय 2, वचन 14 से 26)।
मृत्यु धर्मियों के लिए दया है, और वे यह जानते हैं (यशायाह अध्याय 57, वचन 1 से 2)। वे मानते हैं कि कूच करके मसीह के साथ रहना कहीं उत्तम है (फिलिप्पियों अध्याय 1, वचन 23)। वे जानते हैं कि मृत्यु एक धन्य घटना है और परमेश्वर की दृष्टि में बहुमूल्य है (भजन संहिता अध्याय 116, वचन 15; प्रकाशितवाक्य अध्याय 14, वचन 13)। वे विश्वास करते हैं कि उनकी मृत्यु का दिन उनके जन्म के दिन से अच्छा है (सभोपदेशक अध्याय 7, वचन 1)। यही आशा है, महिमामय आशा, और यह केवल धर्मियों के पास होती है।
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