नीतिवचन 14:3
मूढ़ के मुँह में गर्व का अंकुर है, परन्तु बुद्धिमान लोग अपने वचनों के द्वारा रक्षा पाते हैं।
क्या आपके मुँह की बातें अधिकतर समय अहंकारपूर्ण होती है या अनुग्रहसहित होती है? मुँह की सब बातें इन्हीं दो चरम श्रेणियों में आती हैं। आपके मुँह की बातें इन दो चरम श्रेणियों में से किस श्रेणी में आती है? क्या आपके मुँह की बातें हर समय शालीनता और अनुग्रह से भरी होती हैं? या क्या वे अक्सर अहंकारपूर्ण और दूसरों को आहत करनेवाली होती हैं?
समस्या यह है – आप अपने मुँह की बातों को बोलने से पहले ठीक से परखने में सक्षम नहीं हैं। केवल दूसरे ही सटीक रूप से बता सकते हैं कि आप अपनी बातों में घमंडी हैं या दयालु हैं। सब लोग अपने बोलने के तरीके को सही समझते हैं, लेकिन सुनने वाले ही आपके शब्दों से या तो चिढ़ते हैं या धन्य महसूस करते हैं।
आपको अपने मुँह की बातों के लिए परिणाम भुगतने पड़ते हैं। कठोर और घमण्ड से भरे वचनों के कारण आपको परमेश्वर और मनुष्यों दोनों की ओर से दण्ड दिया जाता है और संकट आते हैं; परन्तु विवेक और अनुग्रह भरे वचनों के कारण आप परमेश्वर और मनुष्यों दोनों की ओर से आशिषे और रक्षा पाते है। क्या आप अपने आप को मुसीबत से बचाने के लिए अपने मुँह पर काबू रखने में सक्षम हैं?
आप अपनी जीभ, जो काबू में रखने की दृष्टि से सबसे कठिन वस्तुओं में से एक है, उसका उपयोग कैसे करते हैं, वह इस बात को तय करता है कि लोग आपके साथ जीवनभर कैसा बर्ताव करेंगे। मृत्यु और जीवन दोनों जीभ के वश में हैं, और यदि आप खुद को किसी चर्चा में शामिल करते हैं, तो आपको या तो जीवन का एहसास होगा या मृत्यु का (नीतिवचन 18:21)। सुलैमान ने मुँह की बातें के परिणामों के बारे में अक्सर चेतावनी दी (नीतिवचन 10:20,31; 15:2; 21:23; 26:28; सभोपदेशक 10:12-14)।
मूढ़ के मुँह में गर्व का अंकुर क्या है? यह एक रूपक है जो सूचित करता है कि कैसे एक मूर्ख के मुँह की अहंकारपूर्ण बातें दूसरों को और खुद को भी चोट पहुँचाता है। उसकी जीभ पीड़ा का हथियार बन जाती है (अय्यूब 5:21; याकूब 3:9-12)। एक मूर्ख अपने मुँह की घमण्ड से भरी बातें को क़ाबू में नहीं रख सकता, और वह जहां भी जाता है दूसरों को और खुद दुःख ही पहुंचाता है (नीतिवचन 12:18; 13:10; 14:16; 18:6-7,21; 21:24; 28:25; 29: 20)।
परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति अपने वचनों के द्वारा सम्मान और रक्षा पाता है। वह अपने मुँह की बातों का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करता है, और वे उसके ऐसे अनुग्रह के लिए उसे चाहते हैं (नीतिवचन 15:4,23; 24:26; 25:11-12)। उसके भले और दयालु वचन सुनकर लोग उसे धन्य कहते हैं, और वह उनका दिल जीत लेता है (नीतिवचन 11:16; 22:11; 31:26)। वह अपने आस-पास के लोगों के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करके अपने प्राण को बहुत से दुःखों से बचाता है (नीतिवचन 6:1-5; 12:13; 15:1; 18:7)।
जब कोई मूर्ख अपने मुंह से गर्व से बातें करता है, तो उसके शब्दों का गर्व दूसरों को उससे नफ़रत करने विवश करता है और सबकी नाराज़ी का कारण बनता है। वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को खो देता है, लेकिन अपनी अज्ञानता के कारण नहीं जानता कि क्यों। जब एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों को आगे बढ़ाने के लिए शालीनता और विनम्रतापूर्वक खुद को छोटा करता है, तो वे उससे प्रेम करने लगते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। ऐसा व्यक्ति बहुत-से कुलीन मित्र और सम्मान पाता है।
क्या आप जानते हैं कि आपके मुँह की बातें अहंकार और अनुग्रह के बीच कहाँ आती है? क्योंकि आपका मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला है, उस में असाध्य रोग लगा है, क्या आप उसका भेद समझ सकते हैं, इस मामले में आप एक निर्बल न्यायी है (यिर्मयाह 17:9; भजन 19:12)। क्योंकि लोगों में अपनी भूलचूक के लिए बहाने बनाने की प्रवृत्ति होती है, इसलिए दूसरें आपके मुँह की बातों को जब परखकर आपको बताते हैं, तो भला है आप उनकी समझ को मान लें। क्या दूसरे लोग आपको कटु, कठोर, घमंडी या व्यंग्यात्मक समझते हैं? या क्या दूसरे आपको सौम्य, दयालु, दूसरों की उन्नति करनेवाले और ज़मीन के इन्सान समझते हैं? अगर आप चाहते हैं कि आपके मुँह से सिर्फ़ दूसरों की उन्नति करनेवाले वचन निकले तो आपको अपने मन में गर्व की गंध को भी कुचलना होगा (नीतिवचन 16:5)।
परमेश्वर का वचन यहाँ स्पष्ट है। सड़े मुँह की दुर्गन्धयुक्त बातों को हटाकर उनके स्थान पर आपको अनुग्रह और लाभदायक मुँह की बातें से बदलना होगा (इफि 4:29)। कड़वाहट, क्रोध, क्रोध, कोलाहल, बुराई और द्वेष का स्थान आपको दया, कोमलता और क्षमा को देना होगा (इफि 4:31-32)। आपके मुँह की बातें हमेशा अनुग्रहसहित, नमकीन, और सलोनी हो (कुलु 4:6)।
प्रभु यीशु मसीह के मुँह से अब तक की सबसे शुद्ध अनुग्रह की बातें निकलती थीं (भजन 45:2; लूका 4:22)। यहाँ तक कि यहूदियों द्वारा उसे पकड़ने के लिए भेजे गए अधिकारी भी उसके मुँह की उत्कृष्ट बातें पर विश्वास नहीं कर सके (यूहन्ना 7:45-46)। स्वर्ग की बुद्धि नरक की बुद्धि से बिलकुल भिन्न है, और वे वचन स्वर्ग की बुद्धि से आ रहे हैं या नरक की बुद्धि से इसका प्रमाण मनुष्यों के मन का रवैया और उनके मुँह की बातें में होता है (याकूब 3:14-18)। परमेश्वर करे, कि इस नीतिवचन की बुद्धि सामर्थ्यशाली रूप से आज ही आपके मुँह की बातें को गर्व से हटाकर विनम्रता में बदल दे।
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