नीतिवचन 14:27

यहोवा का भय मानना, जीवन का सोता है, और उसके द्वारा लोग मृत्यु के फन्दों से बच जाते हैं।

जीवन का सोता मिल गया है! हे प्रिय पाठक, अभी उसमें से पी लें! जो मनुष्य यहोवा का भय मानता है, बह बहुतायत से आशीष पाएगा (भजन 128:1-6)। और जो मनुष्य यहोवा का भय नहीं मानता, वह इस दुष्ट जगत के घातक फन्दों में फँसकर नष्ट किया जाएगा (नीतिवचन 10:27; 22:5; सभोपदेशक 7:17)।

यह सुलेमान के सर्वोत्तम नीतिवचनों में से एक है। इसमें एक अद्भुत प्रतिज्ञा है, एक गम्भीर चेतावनी है, और एक अत्यन्त महिमामय शिक्षा है। इस छोटे-से वाक्य की बुद्धि अद्भुत है। जीवन में आज जहाँ आप पहुँचे हैं, वहाँ तक आने के लिए आपने बहुत कुछ सीखा है; पर यह शिक्षा उन सब से उत्तम है। इस पापी दुनिया में आपको नाश करने या मार डालने के लिए अनेक फन्दे हैं, पर यह पाठ उसने आपकी रक्षा करेगा और आपको बचाएगा।

यहोवा का भय मानना संयमी श्रद्धा और वह पवित्र अभिलाषा है जो परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहती है, और जो पाप तथा आत्म-विश्वास (अपने आप पर भरोसा) को त्याग देती है (नीतिवचन 3:7; 8:13; 16:6)। यही बुद्धि का आरम्भ है (नीतिवचन 1:7; 9:10), क्योंकि जिनमें यह भय नहीं, वे खुद से प्रेम रखने और मनुष्यों की राय में फंसकर नाउम्मीदी से भटकते रहते हैं। यह “बुद्धिमानों की शिक्षा” से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है (नीतिवचन 2:1-22), और वही भी जीवन का सोता है (नीतिवचन 13:14)।

जो पुरुष या स्त्री यहोवा का भय मानते हैं, उनके भीतर संसार में रहने वाले किसी भी मनुष्य की अपेक्षा सबसे बुद्धिमान प्रेरणाएँ और सबसे दृढ़ मकसद होते हैं। वह दैवी मानदण्डों के अनुसार परमेश्वर और भले मनुष्यों की दृष्टि में सफल ठहरेंगे। ऐसे व्यक्ति का जीवन तेजस्वी होगा, और वह उन फन्दों से बच निकलेगा जो दूसरों को मृत्यु और नरक के दुःखद, विकृत, और पीड़ादायक जीवन में फँसा देते हैं।

कौन-सी बात किसी पुरुष को पराई स्त्री के शक्तिशाली आकर्षण से बचा सकती है? क्या उसकी पत्नी? क्या उसकी माता? क्या उसका पास्टर? क्या उसके बच्चे? सच कहूँ तो, कदापि नहीं। यहोवा का भय उसकी सुन्दरता और बहकावे के विरुद्ध सबसे सामर्थ्यशाली ढाल है (सभोपदेशक 7:26)। इसके निकट कोई दूसरी बात आती ही नहीं; क्योंकि केवल परमेश्वर के न्याय का श्रद्धापूर्ण भय और उसे प्रसन्न करने की प्रबल अभिलाषा ही मनुष्य को उसके प्रस्तावों को ठुकराने की सामर्थ्य देती है, जैसे यूसुफ़ ने किया (उत्पत्ति 39:7-9)। उसके छल-प्रपंचों से बचाया जाना मनुष्य को उस नरक और मृत्यु से छुड़ाता है, जिनकी ओर व्यभिचार और परस्त्रीगमन निश्चय ही ले जाते हैं (नीतिवचन 2:18; 5:4-5; 7:27; 9:18)।

कौन-सी बात आपके वैवाहिक जीवन को सुखी और समृद्ध बनाए रखेगी? पति-पत्नी दोनों ने यहोवा का भय मानने से! जो पति यहोवा का भय मानता है, वह अपनी पत्नी से उस कोमल प्रेम के साथ प्रेम करेगा जैसा उसके सृष्टिकर्ता ने ठहराया है। जो पत्नी यहोवा का भय मानती है, वह अपने पति से उस श्रद्धापूर्ण सेवा-भाव के साथ प्रेम करेगी जो घर में शान्ति बसाता है। और जो दोनों यहोवा का भय मानते हैं, वे सृष्टिकर्ता की विधि के अनुसार दाम्पत्य-संगति रखेंगे, और परामर्शदाता की बुद्धि से समस्याओं का समाधान करेंगे! इसलिए जीवनसाथी चुनने में, सब बातों से बढ़कर, यहोवा के भय को ही प्रधान स्थान देना अत्यन्त आवश्यक होता है (नीतिवचन 31:30)। जीवनसाथी चुनने में इस बात की उपेक्षा करना आपके अगले पचास वर्ष की ज़िन्दगी को नरक बना देगा और मृत्यु की कीमत चुकानी पड़ सकती है, इसे याद रखना।

जीवन का सोता, अर्थात भलाई की वह निरन्तर धारा जो जीवन को भरपूर बनाती है, परिस्थितियों पर निर्भर नहीं। क्योंकि यहोवा के भय के साथ रुखी-सुखी रोटी भी, क्लेश के साथ बहुत-से खजाने से उत्तम है (नीतिवचन 15:16)। हे प्रिय पाठक, क्या परमेश्वर का भय मानना अपने आप में एक खजाना नहीं (यशायाह 33:6)? लोग शारीरिक दीर्घायु के लिए जीवन के सोते की खोज में परिश्रम करते हैं; पर वह सफल जीवन जो परमेश्वर और मनुष्यों दोनों को प्रसन्न करे, उससे कहीं बड़ा लक्ष्य है, और उसकी राह इसी नीतिवचन में आपके सामने रखी है!

ख्रिश्चन माता-पिता, अपने बच्चों को सिखाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है। यदि पढ़ना भी इस वरदान से टकराए, तो पढ़ने को भी पीछे रख दीजिए। यहोवा का भय उनके लिए किसी भी शैक्षिक उपलब्धि, किसी भी शारीरिक व्यायाम, और किसी भी मनोरंजन से कहीं अधिक लाभदायक सिद्ध होगा। इसे “मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य” और जीवन के निर्णायक उद्देश्य के रूप में सिखाया जाना चाहिए (भजन 34:11; सभोपदेशक 12:13-14; इफिसियों 6:4)।

इस भय को एक भक्त पिता के द्वारा स्थापित किया जा सकता है, जब वह स्वयं इसकी एक जीती-जागती मिसाल बनता है, और प्रत्येक बच्चे के प्रति इसकी माँगों को दृढ़ता से लागू करता है। यदि आप अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, तो आज ही समय निकालकर उन्हें उसके न्यायों के विषय में सचेत करें, उन्हें उसकी विधियों पर चलना दिखाए, और उनके सामने उसकी प्रतिज्ञाएँ रखें। उन्हें यह भी साफ़ साफ़ बताएं कि यहोवा का भय माने बिना जीवन कितना व्यर्थ और कष्टों से भरा होता है, और उसका भय मानने से जीवन कितना शान्तिपूर्ण और समृद्ध होता है।

जीवन में मूर्खता, निराशा, और पीड़ा का मूल कारण यहोवा के भय का न होना है, और दुष्ट लोग तो उसे जानते ही नहीं (भजन 10:4; 36:1; रोमियों 3:18)। उद्धार के अनुग्रह से ही मनुष्यों की प्यासी आत्मा को जीवन का यह सोता दिया जाता है (यिर्मयाह 32:40); और फिर इसे सिखाया भी जाना चाहिए, जैसे दाऊद और सुलेमान ने अपने बच्चों को सिखाया (भजन 34:11; नीतिवचन 2:1-5)।

हमारा प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का भय ऐसे मानता था जिसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता, यहाँ तक कि जब वह क्रूस की यातना और मृत्यु का सामना कर रहा था तब भी; और उसी भय के द्वारा उसने अनन्त जीवन का ऐसा सोता स्थापित किया, जिससे परमेश्वर के चुने हुए लोग अपने पापों की मजदूरी, अर्थात मृत्यु, से बचाए जाएँ (इब्रानियों 5:7-9; यूहन्ना 4:14; रोमियों 6:23; 2 तीमुथियुस 1:9-10)। जो लोग उससे प्रेम रखते हैं, वे ऐसी कलीसिया खोजेंगे जहाँ परमेश्वर की आराधना पूर्ण श्रद्धा और भक्तिपूर्ण भय के साथ की जाती है (इब्रानियों 12:28-29)।

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