नीतिवचन 14:21
जो अपने पड़ोसी को तुच्छ जानता है, वह पाप करता है; परंतु जो दीन लोगों पर अनुग्रह करता है, वह धन्य होता है।
आप दूसरों के साथ जिस तरह से संबंध रखते हैं, वह तीन पक्षों को प्रभावित करता है – स्वर्ग का परमेश्वर, आपके आस–पास के लोग, और आपका अपना जीवन। यदि आप दूसरों के प्रति क्रूर, कठोर, स्वार्थी, या हिंसक हैं तो आप परमेश्वर के विरुद्ध पाप करते हैं, आप उन लोगों को चोट पहुंचाते हैं जिन्हें सहायता की आवश्यकता है, और आप स्वयं भी दुखी रहते हैं। यदि आप दूसरों के प्रति कोमल, दयालु, देने वाले, और सुरक्षात्मक हैं तो आप स्वर्ग के परमेश्वर का आदर करते हैं, दूसरों के हृदयों को सुख पहुंचाते हैं, और स्वयं प्रसन्न रहते हैं। यही इस नीतिवचन का नियम है।
बाइबल की पहली आज्ञा सृष्टिकर्ता परमेश्वर, यहोवा से अपने पूर्ण हृदय, मन, प्राण और शक्ति से प्रेम करना है (व्यवस्थाविवरण 6:4-5; मत्ती 22:36-38)। दूसरी आज्ञा यह है कि अपने पड़ोसी से उतना ही प्रेम करना जितना हम स्वयं से करते हैं (लैव्यव्यवस्था 19:18; मत्ती 22:39)। जब आप अपने पड़ोसी से प्रेम करते हैं तब आप परमेश्वर से प्रेम करते हैं, क्योंकि उसी ने आपके पड़ोसी को बनाया और जब उन्हें आपकी सहायता की आवश्यकता थी, तब उसने उन्हें आपसे मिलाया (नीतिवचन 14:31; 19:17; 1 यूहन्ना 4:20)।
यदि आप अपने पड़ोसियों के प्रति चिन्ताशील, क्षमाशील, ईमानदार, प्रेम से भरें और धैर्यवान हैं, तो परमेश्वर आपको आशीषित करेगा (भजन संहिता 41:1-3; 112:9; लूका 6:27-38)। यदि आप उनके प्रति नुकसानदायक, द्वेषपूर्ण, अभिमानी, सख्त, या प्रतिशोधी हैं तो परमेश्वर आपका न्याय करेगा और आपको दण्ड देगा (व्यवस्थाविवरण 15:7-11; यशायाह 58:7-11)। मसीहत आपको उन सभी लोगों से प्रेम करने के लिए एक उच्चतम प्रेरणा प्रदान करती है, जिनसे आप मिलते हैं, क्योंकि एक धन्य और आशीषित जीवन और एक दुखी और मुसीबत भरे जीवन के बीच का अंतर उनसे उभरनेवाले अटल परिणाम के कारण होता है।
एक ऐसी दुनिया में जहाँ लोभ, लालच, और स्वार्थ का बोलबाला है, यह विश्वास करना या यह कल्पना करना मुश्किल है कि दूसरों से प्रेम करने से आपको स्वयं खुशी मिल सकती है। परंतु यह नीतिवचन यही सिखाता है! और यीशु मसीह और पौलुस दोनों ने इस बात की पुष्टि की: “मैंने तुम्हें सब कुछ करके दिखाया कि इस रीति से परिश्रम करते हुए निर्बलों को संभालना और प्रभु यीशु के वचन स्मरण रखना अवश्य है, जो उसने आप ही कहा है: ‘लेने से देना धन्य है’।” इस नियम पर विश्वास करो, या फिर ऐसे ही जीकर बुरी तरह मृत्यु को प्राप्त करो।
जब एक व्यवस्था-विशेषज्ञ ने यीशु से एक पड़ोसी की परिभाषा पूछी (व्यवस्था-विशेषज्ञ, अर्थात वकील अक्सर ज़िम्मेदारी से बचने के लिए परिभाषाओं में दोष निकालते हैं), तो प्रभु यीशु ने अच्छे सामरी का दृष्टान्त बताकर उत्तर दिया, जिसमें एक सामरी ने एक घायल यहूदी से दोस्ती की और बहुत बड़ा जोखिम लेकर और कीमत चुकाकर उसकी मदद की (लूका 10:25-27)। जबकि यहूदी और सामरी एक दूसरे को नापसंद करते थे, फिर भी उस नेक मनुष्य ने उसके प्रति ऐसे समय दया दिखाई जब खुद उस यहूदी के अपनों ने नहीं की।
यहाँ सुलैमान की मुख्य सीख यही है कि आप किस तरह अपने दीन-दुखी पड़ोसियों को देखते हैं और उनसे कैसा आचरण करते हैं – वह भी ऐसे पड़ोसी जो बदले में आपको कुछ लाभ नहीं दे सकते। दीन लोगों से घृणा करना और उनकी ज़रूरतों को अनदेखा करना, उनके दुर्भाग्य के लिए उन्हें दोष देना, चाहे वह सच हो या नहीं, एक पापमय मानव स्वभाव है। एक मनुष्य जो अपने ऐसे पड़ोसी की सहायता करता है जिसकी दरिद्रता वास्तविक है वह परमेश्वर और मनुष्यों की दृष्टि में और उसके अपने ज़मीर में धन्य कहलाएगा।
आपके पास जो भी है या आप आज जो भी हैं, वह आपको परमेश्वर से मिला है; आपके और दूसरों के बीच भेद करना उसी का निर्णय है (1 कुरिन्थियों 4:7)। इसलिए, स्वयं को दूसरों से ऊपर समझना आपके लिए एक घिनौना द्वेष साबित होगा। अमीर और गरीब, दोनों को परमेश्वर ने ही बनाया है (नीतिवचन 22:2), और गरीबों के प्रति आपका व्यवहार परमेश्वर के साथ आपके संबंध को दर्शाता है (नीतिवचन 14:31)। दीन लोगों की सहायता करके परमेश्वर का आदर करना बुद्धिमानी है।
दूसरों की सहायता करने का सुख न्याय के दिन तक रहता है, जहां परमेश्वर के सबसे ज़रूरतमंद बच्चों से मित्रता रखने वालों को बड़ा प्रतिफल मिलेगा (मत्ती 25:31-46; लूका 14:12-14)। आप ज़रूरतमंदों को देकर न्याय के दिन के लिए एक अच्छी नींव डाल सकते हैं (1 तीमुथियुस 6:17-19)।
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