नीतिवचन 14:17
जो झट क्रोध करे, वह मूढ़ता का काम भी करेगा, और जो बुरी युक्तियाँ निकालता है, उससे लोग बैर रखते हैं।
दुष्ट क्रोध दो प्रकार के होते हैं, और उन्हें अलग-अलग तरह से निपटाया जाना चाहिए। झट क्रोध करना, मतलब बिना विवेक या बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया करने वाला त्वरित क्रोध मूर्खतापूर्ण है, और ऐसा क्रोध साबित करता है कि क्रोधीत हुआ व्यक्ति अपनी भावनाओं पर कोई क़ाबू नहीं रख सकता। ऐसा व्यक्ति कठिन और तनावपूर्ण होता है, लेकिन उसके इस स्वभाव में सुधार किया जा सकता है और उसमें बदलाव भी लाया जा सकता है। परन्तु, एक और प्रकार का क्रोध है, सुलगती ईर्ष्या और बदले की गहरी भावना जो दूसरे को नुकसान पहुँचाने की साजिश रचती है। परमेश्वर और मनुष्य इस दुष्ट राक्षस से घृणा रखते हैं।
इस नीतिवचन को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से लागू करने से पहले याद रखें कि सब प्रकार का क्रोध पाप नहीं होता। परमेश्वर दुष्टों पर प्रतिदिन क्रोध करता है (भजन 7:11), और वह मूसा पर भी क्रोधित हुआ था (निर्गमन 4:14)। जब इस्राएलियों ने सोने के बछड़े की आराधना कीं तो उस पर मूसा का क्रोध उचित ही था (निर्गमन 32:19)। और यीशु भी धार्मिक कर्मकाण्ड करनेवाले यहूदियों की क्रूरता पर क्रोधित हुआ था (मरकुस 3:5)। उचित उद्देश्य के लिए उचित ढंग से निर्देशित क्रोध अच्छा और पवित्र है। किसी भी अन्य क्रोध को पाप से मुक्त रखा जाना चाहिए और उसे शीघ्र शान्त कर दिया जाना चाहिए (इफि 4:26)।
यह नीतिवचन दो अलग-अलग पापों पर विचार प्रस्तुत करता है। सुलैमान के नीतिवचनों में अक्सर दो चीज़ों की तुलना करने वाले दो उपवाक्य होते हैं। और इस नीतिवचन के दो वाक्य दो खंड समन्वय संयोजन “और” से जुड़े हुए हैं, जो दर्शाता है कि दोनों चीजें एक ही प्रकृति की हैं, विपरीत नहीं। यहाँ पाप की तुलना धर्म से नहीं की जा रही, बल्कि एक पाप की तुलना दूसरे पाप से की जा रही है।
“झट क्रोध” और “बुरी युक्तियों” की तुलना करने पर, हम दो अलग-अलग पाप देखते हैं। एक पाप है आवेगपूर्ण क्रोध – दूसरा है लंबे समय से बुराई की युक्ति बनाना। जब हम “मूढ़ता” और “बैर” की तुलना करते हैं, तब हम बुराई के अलग अलग स्तर और उनके परिणामों को समझ सकते हैं। एक पाप दुर्भावना के बजाए मूर्खता है – तो दूसरा पाप दूसरे में मूर्खता से अधिक द्वेष, या पहले से सोची समझी बुराई की साजिश है।
कुछ लोगों को क्रोध जल्दी आता है (वे असंयमी होते हैं, जो कि पाप ही है)। ऐसे लोग शरीर से तो वयस्क दीखते हैं परन्तु अन्दर से नादान और नासमझ बालक जैसे होते हैं। वे कभी बड़े नहीं होते और न ही कोई आत्म-अनुशासन सीखते हैं। वे कमज़ोर हैं और अपनी भावनाओं पर क़ाबू नहीं रख सकते। आमतौर पर उनके माता-पिता में भी यही दोष होता है। अगर आप उन्हें बिना किसी बात के उकसाए, वे तुरंत विचारों, भावनाओं, शब्दों या कार्यों पर अपना नियंत्रण खो देते हैं। परिणामी आक्रोश उन्हें मूर्ख के रूप में शर्मिंदा करता है, जिसकी कीमत उन्हें अपने मित्रों और रिश्तेदारों को खो कर चुकानी पड़ती है (नीतिवचन 12:16; 22:24; 25:8; 29:22)।
दूसरे खण्ड में जिनकी बात हो रही है, उनके मन काले होते हैं और वे दूसरों से नफ़रत करते हैं और लंबे समय से गुप्त रूप से द्वेष को पालते आते हैं। वे अपनी नफरत को दिखावी मुस्कुराहट, झूठे शब्दों और झूठी दयालुता की आड़ में छिपाते हैं (नीतिवचन 26:24-26)। यह कोई छोटा पाप नहीं है, क्योंकि यह गैर-इरादतन हत्या की तुलना में पूर्व-निर्धारित हत्या के समान है। परमेश्वर और मनुष्य ऐसे दुर्भावनापूर्ण क्रोध से नफरत करते हैं, जिसे ये राक्षस बदला लेने की युक्ति बनाते समय लंबे समय तक पालते और उसका पोषण करते हैं (नीतिवचन 6:16-19)।
किसी भी प्रकार का अनुचित क्रोध पाप ही है (मत्ती 5:22)। लेकिन कमज़ोरी एक अलग बात है; इरादतन द्वेष दूसरी बात है! उतावला क्रोध अपमानजनक होता है; परन्तु साजिशपूर्ण द्वेष नफरती है और घृणा का विषय है! झट से क्रोध करनेवाले व्यक्ति पर भरोसा नहीं किया जा सकता और वह शांति के लिए ख़तरा है; परन्तु जो बुरी युक्तियाँ निकालता है उस से बचकर रहना चाहिए, और उससे वैसे ही बचकर रहना ज़रूरी है जैसे स्वयं शैतान से बचकर रहा जाता है (यूहन्ना 8:44)। मूसा और हारून ने मूर्खतापूर्ण क्रोध किया और इस कारण वे कनान में प्रवेश नहीं कर पाएँ (गिनती 20:10-12), लेकिन महान परमेश्वर ने हामान और उसके दस बेटों को यहूदी नरसंहार करने की उसकी दुर्भावनापूर्ण दीर्घकालिक रणनीति और साजिश के लिए फांसी पर लटका दिया (एस्तेर 3:5-15; 7:9; 9) :13-14)।
इस नीतिवचन का सबक क्या है? अपनी आत्मा पर क़ाबू रखें- शीघ्र क्रोध और लम्बे समय तक पनपनेवाले क्रोध दोनों पर क़ाबू रखें। दूसरे लोग आपको क्यों भड़काते हैं? आपने तो खुद ही अपने असंख्य अपराधों से स्वर्ग के परमेश्वर को क्रोधित किया है, और आप अपराधों को जारी भी रखते हो। यदि उसने कभी अपना क्रोध या पाप के प्रति घृणा आपके विरुद्ध कर दी, तो यह आपके जीवन को नष्ट कर देगा और आपको नरक में डाल देगा। अपने पड़ोसी को माफ कर दो। अपने शत्रु को क्षमा कर दो। आप क्रोधित आत्मरक्षा के योग्य नहीं हैं। इसके अच्छा तो यह होगा कि आप उन्हें खुद को लूटने ही दें (मत्ती 5:38-48; 1 कुरिन्थ 6:7)।
कुलीन लोग अपनी आत्माओं और भावनाओं पर काबू रखते हैं; उनकी भावनाएं उन पर शासन नहीं करतीं, और वे क्रोध करने में धीमे होते हैं (नीतिवचन 14:29; 15:18; 16:32; याकूब 1:19-20)। वे पराक्रमी और बहादुर पुरुष हैं (नीतिवचन 19:11)। दूसरों के कार्य उन्हें प्रभावित नहीं करते। स्वार्थी लोग क्या सोचते हैं, इसके बावजूद अपना संयम या नियंत्रण खोने में कोई सम्मान, मर्दानगी या ताकत नहीं है। जो मनुष्य गुस्से से विकृत, टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं, वे कमज़ोर मनुष्य होते हैं, जिनका जीवन असफल होता है (नीतिवचन 25:28; सभो 7:9)।
क्या और भी सबक हैं? दूसरों की गतिविधियों और हरकतों पर समझदारी से विचार करें। कुछ लोग बिना कुछ सोचे-समझे तुरंत भाप उड़ा देते हैं, लेकिन नुकसान अक्सर कम ही होता है; वे शीघ्र ही सामान्य स्थिति में लौट आते हैं, और उन्हें उनकी मूर्खतापूर्ण ग़लती दिखाई जा सकती है। आपको भविष्य में उन्हें फिर से सुधारना पड़ सकता है, लेकिन उन्हें बदला जा सकता है। परन्तु जो इतनी जल्दी अपना क्रोध शांत नहीं करते, वे गहरे और अधिक घृणित आवेग को पाल सकते हैं जो उन्हें दुष्टतापूर्ण युक्तियों और साजिशों की ओर ले जाता है (नीतिवचन 12:2; 24:8; रोमियों 1:30)।
ऐसे बच्चे की पहचान करना और उन्हें सुधारना आसान है जो उकसावे के कारण तुरंत क्रोधित हो जाता है बजाय उस बच्चे के जो अन्दर से विद्रोही है और बात को अंदर ही दबाए रखता है, जहां वह कठोर हो जाता है और दीर्घकालिक आक्रोश में बदल जाता है। बच्चों को अपने माता-पिता के फैसलों पर प्रश्न करना, परिवार से अलग रहना या मूड खराब होने पर चुप रहने का कोई अधिकार नहीं है। जो माता-पिता इन संकेतकों को फलने-फूलने देते हैं या अनदेखा करते हैं, उन्हें जल्द ही एक ऐसे खतरनाक राक्षस का सामना करना पड़ सकता है जो परिवार की परवाह नहीं करेगा।
बुद्धि चीजों को ठीक ठीक परखने और सही निर्णय लेने की शक्ति है, जो क्रोध को दृष्टि पर पर्दा डालने, आत्मा को परेशान करने, मन को भ्रमित करने, भावनाओं को भड़काने या हृदय को कठोर करने की अनुमति नहीं दे सकती। अपने और दूसरों के क्रोध से घृणा करें। क्रोध को उन दुर्लभ मामलों के लिए सुरक्षित रखें जहां परमेश्वर या सत्य पर हमला किया जाता हो, न कि वहां जहां आपको थोड़ा आर्थिक नुकसान होता है, या अपमानित किया जाता हैं। अपनी आत्मा पर दृढ़ता से शासन रखो; दूसरे आपके साथ क्या करते हैं, उसे नज़रअंदाज़ करें; स्वर्ग का परमेश्वर उत्तम बदला लेने की युक्ति बनाएगा!
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