नीतिवचन 14:10

मन अपना ही दु:ख जानता है, और परदेशी उसके आनन्द में हाथ नहीं डाल सकता।

अपने दु:ख और आनन्द को केवल आप ही जानते हैं। दूसरे आपकी परवाह कर सकते हैं या कह सकते हैं कि वे आपको जानते हैं, परन्तु वे वास्तव में कुछ नहीं जानते और न हीं जानना चाहते हैं। और जब आप दूसरों के साथ सहानुभूति रखना और उनकी मदद करना चाहते हैं, आपको धीमा होना चाहिए और गहराई से सोचना चाहिए। अंत में, यीशु ही है जो अपने मित्रों को पूरी तरह से जानता है।

आप अपने आप में एक अद्वितीय व्यक्ति हैं, जैसे राई का हर दाना अलग होता है। दु:ख की गहराई और आनन्द की ऊँचाई जो आप महसूस करते हैं, उसे दूसरे पूरी तरह से नहीं जान सकते और न उसका महत्त्व समझ सकते हैं। आपका मन, आत्मा, दिमाग और विवेक सब मिलकर भावनाओं और विचारों का एक निजी समूह हैं जो केवल आप और आपका सृष्टिकर्ता ही जानते हैं। दूसरे लोग आपकी वास्तविक भावनाओं को न तो खोज सकते हैं और न परिभाषित कर सकते हैं।

आपके प्राण में उठनेवाली पीड़ा और दर्द जो भिन्न भिन्न परिस्थितियों, भय, अपराधबोध या निराशा से उभरते हैं, आपकी ज़िन्दगी के निजी आयाम हैं और उन्हें कोई अजनबी, आपसे बाहर का कोई भी व्यक्ति महसूस नहीं कर सकता या समझ नहीं सकता। जब आप परिस्थितियों, आशा, प्रेम या सफलता से अभिभूत होते हैं, तो न ही कोई अजनबी, आपकी आत्मा से बाहर का कोई भी व्यक्ति आपके मन के आनन्द को समझ सकता है और उसका महत्व जान सकता है।

कोई भी मित्र आपकी भावनाओं को पूरी तरह से नहीं जानता, चाहे वह कितना भी सहानुभूतिपूर्ण क्यों न हो। कोई भी मनोवैज्ञानिक आपके दु:ख या आनन्द या उनके कारणों को नहीं माप सकता। कोई भी पास्टर आपकी शंकाओं या इच्छाओं को पूरी तरह से नहीं समझा सकता। आप इस विश्व में अपने गुणों आत्मा में अकेले हैं। दूसरे की भावनाओं और विचारों को बनाने वाले संयुक्त कारक आपके या किसी और के विचारों से सर्वथा अलग हैं।

यह नीतिवचन मानव अस्तित्व के बारे में सुलैमान का अवलोकन है। पौलुस ने इसकी पुष्टि की, “मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उसमें है?” (1 कुरिन्थ 2:11)। प्रत्येक व्यक्ति एक अद्वितीय व्यक्ति होता है, जिसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों भावनाएँ होती हैं, जो दूसरों के लिए अज्ञात हैं। इस नीतिवचन का चिन्तनात्मक अध्ययन करने पर हम इस सामान्य अवलोकन से तीन सबक सीख सकते हैं।

पहला सबक यह स्वीकार करना है कि दूसरे आपके दुःख या आनन्द को पूरी तरह से नहीं समझ सकते, जिससे आप भ्रम में पड़ सकते हैं या आपको उपेक्षा की भावना महसूस हो सकती है। उन्हें क्षमा करें। परन्तु इसका उलटा भी सच है : आप दूसरों को सही मायने में नहीं जान सकते या उनके साथ सहानुभूति नहीं रख सकते। इसलिए उनकी कड़वी भावनाओं के लिए भी उन्हें माफ़ करें जो उनके रूप या आचरण को बदल देती हैं। हर मनुष्य में विद्यमान इस अद्वितीय व्यक्तित्व के कारण बुद्धि परोपकारी बनने की मंशा रखती है।

इसलिए, दूसरों के साथ व्यवहार करते समय बहुत अधिक संवेदनशीलता और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, क्योंकि आप उन भावनाओं के कारण, प्रकृति या गहराई को नहीं जानते हैं जो उन्हें प्रभावित कर सकती हैं। इस प्रकार, बाइबल में परिभाषित प्रेम आवश्यक बन जाता है (1 कुरिं 13:4-7), सुनहरा नियम अपरिहार्य है (लूका 6:31), और एकदूसरे के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखने का अभ्यास किया जाना चाहिए (रोमियों 12:15; इब्रानियों 10:24; 13:3)।

बाइबल में मौजूद कुछ उदाहरणों पर विचार करें। एली ने हन्ना की व्याकुलता को नहीं समझा (1 शमूएल 1:10-16)। गेहजी शूनेमाइट की झल्लाहट को नहीं समझ सका (2 राजा 4:27)। अय्यूब के तीन मित्र अभागे सांत्वनादाता साबित हुएँ (अय्यूब 13:4; 16:2)। प्रभु यीशु के तीन चुने हुए शिष्यों ने उनके सबसे गहरे दुःख की पीड़ा में उन की उपेक्षा की (मरकुस 14:32-42)। और पौलुस को कुरिन्थ के चर्च के सामने अपना बचाव करना पड़ा (2 कुरिंथ 12:15)।

जब दाऊद ने उन्मुक्त होकर परमेश्वर की सार्वजानिक रूप से आराधना कीं तो उसकी पत्नी मीकल ने उसे तुच्छ जाना, क्योंकि उसकी सांसारिक और ठन्डी आत्मा परमेश्वर के प्रति उसके आनंद और प्रेम को नहीं समझ सकी (2 शमूएल 6:16,20)। वह सैन्य नायक के रूप में अपने से प्यार करती थी (1 शमूएल 18:20), परन्तु उसके धार्मिक उत्साह को तुच्छ समझती थी (1 शमूएल 13:14)। अपनी असंवेदनशीलता के कारण उसने अपने पति और रानी के पद को खो दिया (2 शमूएल 6:21-23)। उसे उसकी तीव्र प्रशंसा की भावना का महत्व समझना चाहिए था।

इसलिए दूसरों के बारे में सचेत रहें और उनकी भावनाओं और विचारों के प्रति संवेदनशील रहें, चाहे वे नकारात्मक हों या सकारात्मक। जो दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा है। ध्यान रखें! उस पुरुष पर धिक्कार है जिसकी पत्नी वैवाहिक जीवन में दर्द के कारण बाहरी या आंतरिक रूप से आँसू बहाती है (मलाकी 2:10-16; कुलुस्सियों 3:19; 1 पतरस 3:7)! उस स्त्री पर धिक्कार है जो अपने पति को उसके यौनप्रेम और अंतरंगता से वंचित रखती है (1 कुरिन्थियों 7:1-5)!

उन आलोचनात्मक और दबंग माता-पिता पर धिक्कार है जो अपने बच्चों के ताने मार मारकर घायल कर देते हैं (नीतिवचन 4:3; 31:2; कुलुस्सियों 3:21)! उन असंवेदनशील नियोक्ताओं पर धिक्कार है जो अपने कर्मचारियों का भावनात्मक शोषण करते हैं (नीतिवचन 29:21; व्यवस्थाविवरण 24:14-15; इफिसियों 6:9)! उन पास्टरों पर धिक्कार है जो चर्च के सदस्यों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं (1 थिस्सलुनीकियों 2:7; 1 पतरस 5:3)! उस व्यक्ति पर धिक्कार है जो अपने गरीब मित्रों और गरीब रिश्तेदारों की उपेक्षा करता है (नीतिवचन 21:13; 29:7; अय्यूब 31:13-22)! उस व्यक्ति पर धिक्कार है जो दूसरों को आहत करने की अपनी फ़ितरत पर कभी ध्यान नहीं देता और खुद में सुधार करने में विफल रहता है (मत्ती 5:21-26)!

ख्रिश्चन भाई, इस से बेहतर सबक है! हालाँकि कोई दूसरा व्यक्ति आपकी आत्मा से जुड़ नहीं सकता, परन्तु एक मित्र है जो जुड़ सकता है। यीशु मसीह, देहधारी परमेश्वर, आपकी सभी कमज़ोरियों को महसूस करता है, और वह खुद उन सब परीक्षाओं से गुजरा जिनका आप सामना करते हैं (इब्रानियों 4:12-15)। वह आपके सबसे बुरे समय में आपकी मदद कर सकता है (इब्रानियों 2:18), और वह आपको ऐसी शांति दे सकता है जो समझ से परे है (फिलिप्पियों 4:7)।

एकमात्र सच्चा आनंद जिसे मनुष्य अनुभव कर सकता है, वह है जिसे परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा उद्धार प्रप्थर व्यक्ति को वरदान के रूप में देता है (गलातियों 5:22-23; रोमियों 15:13; सभोपदेशक 5:20)। इस आनंद में कोई मूर्खतापूर्ण मुस्कुराहट या झाग नहीं है, क्योंकि यह ऐसा आनन्द है जिसमें परमेश्वर स्वयं सीधे आपकी आत्मा से वार्तालाप करता है जिसे कोई और नहीं समझ सकता। आपको अपने बच्चे के रूप में अपनाने की उसकी इस मुहर में आपकी आत्मा को उनके प्रेम से भरना शामिल है (रोमियों 5:5; 8:15-16)।

परमेश्वर के साथ चलने वाले लोग आर्थिक कंगाली में भी नृत्य से झूम सकते हैं (हब 3:17-19), और जब उन्हें अपमानित किया जाता है या उनका सताव किया जाता हैं तब भी वे जेल की काल कोठरी में भी भजन गा सकते हैं (प्रेरितों 16:22-25)। वे आंतरिक प्रोत्साहन पा सकते हैं, तब भी जब मित्र उन्हें पत्थर मारना चाहते हैं (1 शमूएल 30:6)। परमेश्वर की उपस्थिति और मानव हृदय के साथ उसका संवाद किसी भी चीज़ पर विजय प्राप्त कर सकता है (भजन 27:1-6; 46:1-5; 73:23-28)।

परमेश्वर के वचन के बारे में इब्रानियों 4:12 पर विचार करें। अधिकांश लोग अपनी गलतफहमी में यह मानते हैं कि यह लिखित वचन, बाइबल के बारे में बोलता है। परन्तु इस वचन में बाइबल में लिखित के बारे में नहीं कहा जा रहा है, और संदर्भ साबित करता है कि यह यीशु मसीह के बारे में कह रहा है (इब्रानियों 4:13-14)। वह आपके प्राण और आत्मा को, और गाँठ–गाँठ और गूदे–गूदे को अलग करके आर–पार छेदता है और मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है। उसके पास जाओ (इब्रानियों 4:15-16)।

क्या आपको चिंताएँ हैं? यह नीतिवचन सिखाता है कि दूसरे उन्हें नहीं जान सकते। परन्तु अगर आप अपनी चिंताओं को परमेश्वर पर डाल देते हैं, तो वह आपकी परवाह कमज़ोर इन्सानों की तरह नहीं करता (1 पतरस 5:7)। क्या आप बोझ तले दबे हुएँ हैं? दूसरे ज़्यादा बोझ उठाने में मदद नहीं कर सकते। परन्तु वह आपके प्राण को विश्राम देने में सामर्थी है (मत्ती 11:28-30)। वही है जो आपका बहुतायत का आनंद और आपका सबसे बड़ा प्रतिफल हो सकता है (उत्पत्ति 15:1; भजन 43:4)। आप दिन या रात के किसी भी समय उससे बातें कर सकते हैं, और वह हमेशा सुनेगा और आपकी सहायता करेगा (भजन 62:8; 142:2)।

जब आप निराश और थकें-मांदे होंगे, तब परमेश्वर स्वयं आपका मित्र होगा (भजन 61:2; 142:3)। वह आपके सभी आँसुओं को एक बोतल में रखता है : वह उनमें से एक को भी नहीं छोड़ता, चाहे अंदर हो या बाहर (भजन 56:8)। आप अपना पूरा मन उसके सामने उंडेल सकते हैं (भजन 62:8)। चूँकि वह आपकी आत्मा के दु:ख में आपकी मदद कर सकता है, और वह स्वर्गीय आनंद प्रदान कर सकता है, तो आपको और किसकी आवश्यकता है (भजन 73:25-26)? अपने सुख या आनन्द के लिए दूसरों पर भरोसा न करें, क्योंकि केवल वही वास्तव में आपको जानता है और आपसे सच्चा प्रेम करता है।

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