नीतिवचन 13:3

जो अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो होंठ बजाता है उसका विनाश हो जाता है।

आपकी जीभ के वश में जीवन और मृत्यु दोनों हैं (नीतिवचन 18:21)। आपके बात करने का तरीका आपका भविष्य तय करता है। क्या मुँह की बातें सचमुच इतनी महत्वपूर्ण है? हाँ! राजा सुलैमान इस मामलें में आपकी सहायता करने के इरादे से आपका ध्यान अपनी शिक्षा की ओर खिंचना चाहता है। क्या आप अपने प्राण की रक्षा के लिए अपने मुँह की चौकसी कर पाते हैं? या आपका मुँह आपको अपने वश में रखता है? और क्या वह आपके विनाश का कारण बनेगा?

महान पुरुष और कुलीन स्त्रियाँ अपनी मधुर वाणी से तुरंत पहचाने जाते हैं (नीतिवचन 11:16; 22:11; सभो 10:12; लूका 4:22; यूहन्ना 7:45-46)। मूर्खों और ठट्ठा करने वालों की पहचान भी उनके मुँह की बातों से ही होती है (नीतिवचन 10:10,14; 18:6-7; सभो 10:12-14)। आपका वर्तमान और भविष्य दोनों दांव पर है। क्या आप अपने मुँह की चौकसी करने के लिए अपनी वाणी का परिक्षण करेंगे?

क्या आपको मुँह की चौकसी करने के विषय पर एक और नीतिवचन की आवश्यकता है? हाँ! क्यों? क्योंकि आपकी जीभ बेलगाम, उपद्रवी, दुष्ट, घातक जहर से भरी हुई, अधर्म की दुनिया है, और नरक की आग को लेकर जलती रहती है! क्या यह आलोचना आपको बहुत कठोर लग रही है? याकूब को पढ़ें (याकूब 3:2-12)। उसके वचन जीवित परमेश्वर की प्रेरणा से लिखें गएँ थें, वह आपके प्रत्येक शब्द को आपकी जीभ से बाहर निकलने से पहले ही जान लेता है (भजन 139:4)। विश्वास रखों, याकूब ने आपके बारे में ही लिखा है।

अगर आप अपने सिद्ध पुरुष होने का मूर्खतापूर्ण दावा नहीं करते, तो आप जानते हैं कि आप अपनी जीभ के कारण खतरे में हैं। यद्यपि मनुष्यों ने जाति-जाति के सब जंगली पशुओं को अपने वश में कर लिया है, परन्तु कोई भी मनुष्य अपनी जीभ को पूरी तरह वश में नहीं कर सका है। सुलैमान ने अपने बेटे को और हम सब को भी मुँह की वाणी के खतरे के बारे में बार-बार आगाह किया। परमेश्वर चाहता है कि आप जानें कि आपकी जीभ आपकी अपनी नहीं है (भजन 12:4)। आपके से निकला प्रत्येक शब्द उसे प्रसन्न करने पाए।

इस नीतिवचन में प्रयुक्त शब्द मुँह और होंठ वाणी के लिए पर्यायवाची शब्द हैं। आप बात करने के लिए अपने मुँह और होठों का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए बात करने के इन दोनों माध्यमों को वाणी के स्थान प्रयुक्त किया गया है। जो मनुष्य अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपनी वाणी को वश में रखता है; जो मनुष्य अपने होंठ चौड़े खोल के बजाता है, वह अपनी वाणी को वश में नहीं रखता है । अगर आप अपने शब्दों की रक्षा करते हैं तो समझो आप अपने प्राण की रक्षा करते हैं और मुसिबतों से बचे रहेंगे; अपना मुँह चौड़ा खोलकर टपर-टपर करना आपको बर्बाद कर देगा। सबक बिलकुल सरल है; नतीजें भयानक हैं।

आपके मुँह के शब्द या तो आपका कल्याण करेंगे, या आपको हानि पहुँचाएँगे। अनुग्रहसहित और बुद्धिमानिपूर्ण बोल राजाओं को भी आपसे प्रेम करने के लिए उकसाएँगे (नीतिवचन 22:11; 24:26)। मूर्खतापूर्ण कहें गएँ शब्द या बहुत अधिक कहें गएँ शब्द आपको सिर्फ़ एक मूर्ख व्यक्ति के रूप में चिह्नित करेंगे और आप भले मित्रों को खो देंगे (नीतिवचन 9: 6; 14: 7; 17: 27-28; 18: 6)। उपहासपूर्ण और बेईज्ज़ती भरें शब्द बुद्धिमान लोगों को आपसे नफरत करने के लिए उकसाएँगे (नीतिवचन 24:9; 22:10)। उपहासपूर्ण और बेईज्ज़ती से भरी वाणी आपको मुसीबत में डाल देगी, और आप दण्ड भोगेंगे (नीतिवचन 19:25; 20:20; 30:17)। कलहपूर्ण वाणी से आपकी शादीशुदा ज़िन्दगी नरक बन सकती है (नीतिवचन 19:13; 29:21)।

सुलैमान जानता था कि बिना सोचे-समझे कहें गए शब्दों के कारण क्या-क्या मुसीबतें आती हैं, इसलिए वह इसके खतरे के बारे में बार-बार सावधानी का इशारा देता है (नीतिवचन 10:31; 12:13,18; 16:23; 17:20; 18:7,21; 20:15; 21:23)। आपके शब्द आपको गंभीर संकट में डाल सकते हैं, इसलिए जब भी आप अपना मुँह खोलें तो बहुत सावधान रहें। आप अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द की चौकसी करके और यह सुनिश्चित करके कि आप जो भी बोलते हैं वह परमेश्वर को भाता है, अपना प्राण बचा सकते हैं। या फिर आप बिना चौकसी कियें और परमेश्वर ने जो विवेक आपको दिया है उसके उपयोग के बिना सिर्फ़ भावनिक आवेग में बोलकर अपना ही विनाश कर सकते हैं।

सबक को गंभीरता से सीखने के लिए, और आपके मुँह में निवास करने वाले खतरे से डरने के लिए, जीभ से किए जानेवाले कुछ पापों पर विचार करें: उलटकर जवाब देना (तीतुस 2:9), अहंकार (1 शमू 2:3), चुगली करना (नीतिवचन 25:23), बड़ाई मारना (भजन 94:4), कड़वी और गन्दी बातें (इफि 4:29-32), बुड़बुड़ाना (गिनती 11:1), कलह (18:6), झगड़ा (रोमियों 1:29), दूसरों को तुच्छ जानना (नीतिवचन 11:12) , माता-पिता का अनादर करना (नीतिवचन 20:20; व्यवस्था 27:16), जबरन वसूली (नीतिवचन 20:14), झूठी साक्षी (निर्गमन 20:16; तीतुस 2:3), चापलूसी करना (भजन 12:3), चापलूसी से प्राप्त उपाधियाँ (अय्यूब 32:21-22), चिकनी -चुपड़ी बातें (नीतिवचन 2:16), मूर्खतापूर्ण बातें (इफि 5:4), बच्चों का कठोरता से पालन-पोषण (कुलुस्सियों 3:21), जल्दबाजी में वादा करना या प्रतिज्ञा को तोड़ देना (सभो 5:1-7), ढोंगपूर्ण आराधना (यशायाह 29:13), पत्नी का अपने पति का अनादर करना (इफि 5:33; 1 पतरस 3:6), उपहास करना (इफि 5:4), परमेश्वर का नाम व्यर्थ में लेना (पूर्व 20:7), झूठ बोलना (नीतिवचन 12:22) , पत्नी का अपने पति को सताना (नीतिवचन 27:15-16), गाली-गलौच करना (मत्ती 5:22), दिखावटी प्रार्थना करना (मत्ती 6:5), परमेश्वर से प्रश्न करना (रोमियों 9:20), रटी-रटाई प्रार्थनाएं (मत्ती 6:7) ), भड़कीला भाषण (कुलुस्सियों 3:8), किसी की बदनामी करना (नीतिवचन 10:18), पास्टर के खिलाफ बोलना (यहेज़केल 33:30; 3 यूहन्ना 1:9-10), प्रतिष्ठित व्यक्तियों की बुराई करना (सभो 10:20; यहूदा 1:8), अपने भाई की बुराई करना (याकूब 4:11), मामले की छानबीन किएं बिना उत्तर देना (नीतिवचन 15:28), किसी कर्ज़ के लिए दूसरों का जमानतदार बनना (नीतिवचन 11:15), गाली देना (याकूब 5:12), झूठ बोलना (नीतिवचन 11:13), मूर्खतापूर्ण और गवार प्रश्न (2 तीमु 2:23), कानाफूसी करना (नीतिवचन 16:28), और चर्च में उपदेश देनेवाली स्त्रियाँ (1 कुरिन्थ 14:34-35; 1 तीमु 2:11-12)।

यदि ऊपर सूचीबद्ध पाप आपको चुप कराने के लिए पर्याप्त नहीं थे, तो हमारे प्रभु यीशु मसीह के शब्दों पर विचार करें, ” हे सांप के बच्चों, तुम बुरे होकर क्योंकर अच्छी बातें कह सकते हो? क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुंह पर आता है। भला, मनुष्य मन के भले भण्डार से भली बातें निकालता है; और बुरा मनुष्य बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है। और मै तुम से कहता हूं, कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे। क्योंकि तू अपनी बातों के कारण निर्दोष और अपनी बातों ही के कारण दोषी ठहराया जाएगा” (मत्ती 12:34-37)। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति कितना धार्मिक होने का दावा करता है, उसे इस बात से मापा जाता है कि वह अपनी जीभ पर कितनी शिद्दत से लगाम लगाता है (याकूब 1:26)।

अपने शब्दों को कम करें। आप आदतन अब तक जितनी मात्रा में बातें करते आएं हैं अब से आधें से भी कम बोलें। आप जो कहना चाहते हैं उसे कुछ ही शब्दों में कहें। बुद्धि का उपयोग करके अपनी बात को कम से कम शब्दों में कहने से आप अपनी वाणी को सीमित कर देते हैं और इससे मुसीबत की सम्भावना भी कम हो जाती है, क्योंकि अधिक बोलने में यक़ीनन पाप होता ही है (नीतिवचन 10:19)। यदि आवश्यक हो तो ही बोलें। अपने मुँह से एक भी बेकार का शब्द न निकलने दें। लोग तुरन्त जान लेंगे कि आप बुद्धिमान हैं, भले ही आप असल में मूर्ख हो (नीतिवचन 17:27-28)। इससे आपकी ही इज्ज़त बढ़ेगी।

शान्त रहें। सुनने में तत्पर और बोलने में धीमे रहें (याकूब 1:19)। दूसरों को आहत करने वाले शब्द बोलने से पहले सोचें (नीतिवचन 12:18; रोमियों 3:13; कुलुस्सियों 4:6)। किसी मसले पर अपनी प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करने से पहले उस मसले को ठीक से सुनें (नीतिवचन 18:13; 25:8-10)। धर्मीजन अपनी प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करने से पहले मामले की जड़ से छानबीन करते हैं (नीतिवचन 15:28)। हर बार जब आप अपना मुँह खोलें (या कोई ईमेल या टेक्स्ट टाइप करें) तो होश में रहकर विचार करें। हर बात के लिए आभारी रहें (इफि 5:3-7)।

अनुग्रह के सद्गुण को अपना अविचलित लक्ष्य बनाएं (सभोपदेशक 10:12; कुलुस्सियों 4:6)। मनभावने वचन बोलें (नीतिवचन 16:24)। याद रखें कि कैसे दाऊद के शुद्ध मन और मनभावने वचनों ने योनातान और इज़राइल के मनों को जीत लिया था (नीतिवचन 22:11; 1 शमू 18:1-5)। याद रखें कि कैसे दानिय्येल में बसनेवाली उत्तम आत्मा ने मादी राजा दारा को जीत लिया था (नीतिवचन 17:27-28; दानिय्येल 6:3)। जो स्त्री अनुग्रहसहित बोलती है उसकी हमेशा इज्ज़त होती है (नीतिवचन 11:16; 31:26)। यीशु मसीह के आदर्शों पर चलें (भजन 45:2; लूका 4:16-22)।

यशायाह ने परमेश्वर की महिमा को देखने पर जैसी प्रार्थना कीं वैसी ही प्रार्थना करें । “हाय! हाय! मैं नाश हूआ; क्योंकि मैं अशुद्ध होंठ वाला मनुष्य हूं, और अशुद्ध होंठ वाले मनुष्यों के बीच में रहता हूं; क्योंकि मैं ने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आंखों से देखा है” (यशायाह 6:1-5)! दाऊद के समान प्रार्थना करें : “हे यहोवा, मेरे मुख का पहरा बैठा, मेरे हाठों के द्वार पर रखवाली कर” (भजन 141:3)। और यह भी,” मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करने वाले” (भजन 19:14)।

दाऊद के समान ही, परमेश्वर का भय मानें और अपने मुँह से पाप न करें (भजन 4:4)। परमेश्वर से कहें कि वह सारा दिन आपका मुँह उसकी स्तुति के शब्दों से भर दे (भजन 71:8)। याद रखें कि यीशु मसीह फिर से आ रहा है कि इस दुनिया का उसकी गंदी वाणी, मूर्खतापूर्ण बातों और उपहास के पाप के लिए न्याय करे; पौलुस ने परमेश्वर की सन्तानों को उपदेश देते हुए यह उलाहना दीं कि वे अपनी जीभ का उपयोग ऐसी बातों के लिए करने के बजाए परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिए करें (इफि 5:3-6)।

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