नीतिवचन 13:19
लालसा का पूरा होना तो प्राण को मीठा लगता है, परन्तु बुराई से हटना, मूर्खों के प्राण को बुरा लगता है।
मनुष्य हमेशा आनन्द में रह सकता है, परन्तु अधिकांश लोग आनन्द और सफलता के मार्ग को तुच्छ समझते हैं। मानव-संतुष्टि और आनंद की मज़बूत जड़ धार्मिकता, सत्य और ज्ञान में पाई जाती है। जब कोई मनुष्य इन चीज़ों को प्राप्त कर लेता है, तो यह पृथ्वी पर सबसे सुहानीवनी उपलब्धि होती है। परन्तु अधिकांश मनुष्य इन चीज़ों की पूरी तरह से अधिक उपेक्षा करते हैं और इसके बजाय पाप से प्रेम रखते हैं, यहाँ तक कि वे प्रतिफल क्या होगा यह जानने से भी इनकार कर देते हैं। वे अपनी पापपूर्ण जीवनशैली को छोड़ देने के विचार से घृणा और अनिच्छा प्रकट करते हैं।
यहाँ सुलैमान का एक नीतिवचन है – बुद्धिमान की गुप्त बात – जिसकी व्याख्या की जानी ज़रूरी है (नीतिवचन 1: 6)। यहाँ जो लालसा पूरी हो रही है वह कोई आम लालसा नहीं होती है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो यह बुद्धि को कम समझना होगा, और यह वियोजक समुच्चयबोधक, “परन्तु” से मेल नहीं खाएगा। यहाँ जो लालसा पूरी हो रही है वह मूर्खों की वासनापूर्ण लालच नहीं है, क्योंकि इससे वियोजक का कोई मतलब नहीं रह जाता। यह सच है कि सब मनुष्यों और मूर्खों को अपना लक्ष्य पूरा हो जाने पर या वासनाओं का पूरा हो जाने पर आनंद आता है, परन्तु यहाँ ऐसा नहीं सिखाया जा रहा है।
व्याख्या की कुंजी शब्द “परन्तु” है, जो पहले खंड को दूसरे खंड के बिलकुल विपरीत कर देता है। इस प्रयोग में शब्द “परन्तु” एक वियोजक समुच्चयबोधक है, जो एक दूसरे के विरोध में स्थापित दो उपवाक्यों को जोड़ता है। क्योंकि लालसा का पूरा होना प्राण को मीठा लग रहा है और इसे मूर्खों के प्राण को बुरा लगने के ठीक विपरीत रखा गया है, अत: यह धर्मी की पवित्र लालसा होनी चाहिए (नीतिवचन 10:24; 11:23)। आगे बढ़ने से पहले इस पर सावधानी से विचार करें।
धर्मी की लालसा धार्मिकता, सत्य और बुद्धि में वृद्धि करना होती है (नीतिवचन 4:7; 16:6; 18:1; 23:23)। ये उसके जीवन के लक्ष्य हैं, और जब वे हासिल हो जाते हैं तो वे उसके मन को अत्यधिक आनन्द और लाभ से भर देते हैं (नीतिवचन 3:13,18,35; 4:8-9; 22:4; 29:18)। परमेश्वर के साथ चलने और पवित्र जीवन जीने का आनंद मूर्ख की सतही खुशियों से कहीं अधिक है, तब भी जब वह समृद्धि का आनंद लेता हुआ प्रतीत होता है (नीतिवचन 10:22; भजन 4:6-8; 43:4; 63:3- 5; 1 पतरस 1:8)।
सबसे मीठी उपलब्धि मृतकों में से जी उठना और स्वर्ग में परमपिता परमेश्वर और यीशु मसीह के साथ अपनी अनंत मीरास का आनंद लेना है। यह वास्तव में अब्राहम का एकमात्र लक्ष्य था (इब्रानियों 11:8-16)। भजनकार ने इसे जीवन के सुखों से बेहतर समझा (भजन 17:14-15; 49:6-20; 73:1-26)। और पौलुस ने भी ऐसा ही समझा (फिलि 1:23; 3:8-11; 2 कुरिन्थ 5:6-8)। यह आपके लक्ष्यों में कौन-से नम्बर पर आता है? और आपने इसे पाने के लिए क्या किया है?
सुलैमान ने देखा कि मूर्ख अपने पापों को छोड़ने के विचार से ही घृणा करते हैं। वे उस बड़े प्रतिफल को नहीं देख पाते जिसे वे खो रहे हैं, और वे स्वयं को उन किसी भी सुख से वंचित करने से इनकार करते हैं जिनकी वे लालसाएं करते हैं। वे यह सोचकर स्वयं को धोखा देते हैं कि उनके पाप मीठे और लाभदायक हैं। वे लालच में आ कर पाप का पीछा करते हैं और अंत में अपना ही विनाश कर लेते हैं। वे जो सही है उसे नहीं कर सकते। वे परमेश्वर की खोज नहीं कर सकते हैं और न ही करेंगे, ठीक वैसे जैसे एक हबशी अपना चमड़ा, या चीता अपने धब्बे नहीं बदल सकता (भजन 36:1-4; यशायाह 26:10; यिर्मयाह 13:23; 17:9; रोमियों 1:18-32; 3:10-18; 8:7-8; इफि 4:17-19)।
सबक बिलकुल सरल है। सकेत है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है; और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं। इसमें अभी आत्म-त्याग के कुछ कुर्बानियां देनी पद सकती है, परन्तु बाद में जो मीठा फल मिलता है वह इन कुर्बानियों से कही अधिक बढ़कर है। एक चौड़ा फाटक और सरल मार्ग है जो विनाश को पहुँचाता है; और बहुत से हैं जो उस से प्रवेश करते हैं। (मत्ती 7:13-14)। मूर्ख फिर से मूर्खता की ओर लौट जाते हैं, जैसे कुत्ते अपनी उल्टी के लिए और सूअर फिर से कीचड़ में लोटने के लिए लौट जाता है (नीतिवचन 26:11)।
यदि आप भक्ति की लालसा रखते हैं, तो परमेश्वर ने एक महान कार्य किया है जिससे कि आप उस चीज़ से प्रेम रखने के लिए प्रेरित हो जाएं जिससे कभी आप नफरत करते थे, और उस चीज से नफरत करने के लिए प्रेरित करें जिससे आप कभी प्रेम रखते थें (फिल 2:12-13)। वह आपकी लालसा पूरी करेगा, और यह आपके प्राण के लिए अनमोल मिठास होगी। परन्तु सभी दुष्टों को परमेश्वर की धार्मिकता, सच्चाई और ज्ञान की पेशकश को अस्वीकार करने की उनकी मूर्खता के लिए दंडित किया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा। आठ ऐसी बातें हैं जिन से आप अपने आप को साबित कर सकते हैं कि यह आपके बारे में सच है या नहीं (2 पतरस 1:5-11)।
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