नीतिवचन 13:18
कंगाली और लाज उसके लिए है जो उपदेश को नहीं मानता : परन्तु जो दपट को मानता है सो प्रतिष्ठा पाएगा। (केजेवी)
विफलता या सफलता? कंगाली या धन-दौलत? लज्जा या सम्मान? आप इन में से क्या चाहते हैं? निस्संदेह, आप सफलता, धन-दौलत, और सम्मान चाहते हैं। परंतु उन्हें वास्तव में पा लेना उनकी इच्छा करने जितना आसान नहीं है। उन्हें पाने की मौलिक शर्ते हैं, और ज्यादातर मनुष्य उन शर्तों को पूरा नहीं करेंगे। अवश्य है कि वे दपट अर्थात् डांट-फटकार का मूल्य समझे और उपदेश को माने, और अपने को दीन और विनम्र करें।
आप इसी पल अपने भविष्य के लिए एक निर्णय ले रहे हैं। कुछ लोग ढिठाई से कहेंगे कि वे पहले से ही इस नीतिवचन के सबक को जानते हैं, इसलिए वे बीच में ही पढ़ना छोड़ देंगे और अपने मूर्खतापूर्ण कामों में वापस लौट जाएंगे। तो वही कुछ अन्य लोग हैं जो इससे आगे थोड़ा और पढ़ेंगे और जैसे ही लेखक अभिव्यक्त करेगा है कि वे सम्भवतः मूर्ख या ठट्ठा करने वालों में से हैं, वे तुरंत पढ़ना छोड़ देंगे। बहुत थोड़े होंगे जो सम्मान प्राप्त करने के ऐसे अवसर से उत्साहित होंगे और जीवन का प्रतिफल पाने इस शिक्षा के प्रत्येक शब्द को हज़म करेंगे।
ज्यादातर मनुष्य इतने घमण्डी, विद्रोही, या हठीले होते हैं कि वे न तो दपट का मूल्य समझते हैं और न ही उपदेश को मानते हैं। वे चीजों को अपने तरीके से करना चाहते हैं। यदि कोई उनसे कहे कि वे ग़लत हैं, तो उन्हें अच्छा नहीं लगता। वे अपने ही मतों से प्रेम करते हैं। सुलैमान ने बार बार चेतावनी दी कि सुधार पाने, और शिक्षा पाने की आप की तैयारी आपके भविष्य की कुंजी है (नीति 1:24-33; 2:1-5; 3:1-2; 5:9-14; 8:7-8, 36; 9:7-9; 10:17; 12:1; 13:13; 14:12; 15:5, 31-32; 16:25; 18:1-2; 26:12; 28:11)।
यह पाठ बिल्कुल सरल है। आप इस दुनिया में अज्ञानी के रूप में जन्मे। आपका मन और इरादे आपको आपके आदि माता-पिता अर्थात् आदम और हवा से जन्म से ही मिली भ्रष्टता के कारण विकृत हैं। यह संसार अज्ञानता से भरा है, अंधविश्वासों और परम्पराओं से ग्रस्त है। आप पर प्रतिदिन ही नापाक विचारधाराओं, प्रलोभनो, और कामों से प्रहार किया जाता है। अगर कोई गम्भीरता से आपकी मदद न करें तो आप अज्ञानता में अपना ही विनाश कर बैठेंगे। एक ऐसी दुनिया में जो विफल होने के लिए नियत है, यहाँ आपकी कामयाबी के लिए एक तकनीक है। आप अपने लिए ऐसे शिक्षकों को खोजें जिनके पास आप को सिखाने के लिए परमेश्वर का सत्य, और ज्ञान, तथा बुद्धि है, और उनकी डांट-फटकार तथा उपदेश की शरण में जाएं। कितना आसान है। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए स्वर्ग से बुद्धि प्रकट की है। यदि आप बुद्धि के शिक्षकों को ढूंढ लेते हैं, और उनके सुधार और शिक्षा को मान लेते हैं, तो आप अपने को विफलता, कंगाली, और शर्मिंदगी से बचा सकते हैं।
ऐसे शिक्षक कहां पाए जाते हैं? वहां, जहां परमेश्वर के सुरक्षित रखे हुए वचन से शिक्षा दी जाती है। चालाकी या स्कूल-कॉलेज की शिक्षा पवित्र बाइबल का स्थान नहीं ले सकती। बाइबल से बाहर कोई ज्योति या समझ है ही नहीं (यशा 8:20; 1 कुरिं 1:19-20; 3:19-20; 1 तिमु 6:3-5, 20-21)। अगर आप अपने सम्पूर्ण मन से परमेश्वर के सत्य की खोज करते हैं, तो वह ज़रूर आपके लिए कोई शिक्षक भेजेगा (अय्यूब 33:19-26; प्रेरितों 8:26-35; 10:1-6; 18:24-28)।
जब आप एक बार ऐसा शिक्षक पा लेते हैं, तो उसके बाद आपकी सफलता के आड़े एक और बाधा है – आपकी अपनी व्यर्थ की विचारधारा, कल्पनाएं और अभिमत। जो मनुष्य अहंकार में यह सोचने का दुस्साहस करता है कि वह सही है, तो वह मूर्ख से भी अधिक गया-गुजरा है। वह ठट्ठा करनेवाला है, और परमेश्वर ऐसे मनुष्य को अंधा करके उसे दण्ड देगा (नीति 9:7-9; 26:12; यहेज 14:1-11)। मूर्ख व्यक्ति सीखने की दृष्टी से अत्यंत आलसी और विचलित मन का होता है, परंतु उपहास करने वाला शिक्षा पाने से ही इनकार करता है।
सीखने और उन्नति पाने के लिए बदलाव ज़रूरी है। या तो आपको इन ग़लत विचारधाराओं को जो अब तक आपने सीखी है, सुधारना होगा, या अपने आविष्कार में नए ज्ञान को जोड़ना होगा। ग़लत विचारधाराओं को सुधारने में फटकार को मानना आवश्यक है, तो आविष्कार में ज्ञान को जोड़ने के लिए उपदेश के द्वारा नए विचारों को ग्रहण करना आवश्यक है। अहंकार, विद्रोह, और हठीलापन मनुष्य को इन दोनों में से किसी भी विकल्प को चुनने नहीं देंगे। अधिकांश मनुष्य असफल हैं, वे इस जंग को हार जाते हैं।
एक सच्चा शिक्षक आपकी विचारधाराओं और कल्पनाओं का शत्रु होता है (2 कुरिं 10:4-6)। अवश्य है कि वह आपके मन के गढ़ों को ढा दें, क्योंकि वहीं पर आपकी झूठी कल्पनाएं और अवधारणाएं निवास करती हैं। अवश्य है कि वह उन्हें वहां से हटाकर उनका स्थान सत्य और बुद्धि को दें, जिन्हें आपने पहले कभी न तो सुना है और न ही ग्रहण किया है। हालांकि शिक्षक और छात्र का यह रिश्ता प्रेम से भरा होता है, फिर भी शिक्षा की प्रक्रिया निश्चित ही दो-तरफ़ा संघर्ष है।
आपका जन्म एक मूर्ख पीढ़ी में हुआ है। आज अपने-अपने विचारों को साझा करना एक नई शिक्षा-प्रणाली बन गई है। अज्ञानी छात्रों, जिनके दिमाग में कुछ ही दिनों पहले विचारों की खिचड़ी थी, उन से समलैंगिक विवाहों, मृत्युदंड, जीवन का मूल जैसे विभिन्न विषयों पर उनके मत पूछे जाते हैं। परंतु वास्तविक शिक्षा प्रणाली में अपने छात्रों से उनकी राय या उनके अभिमत नहीं पूछे जाते – वास्तविक शिक्षा प्रणाली परमेश्वर के परम-सत्य और बुद्धि को ही एकमात्र विचारधारा के रूप में स्थापित करती है।
आज की कलीसियाएं (चर्च) वर्तमान समय की स्कूलों से बेहतर नहीं हैं। अब लोग खरा उपदेश नहीं सहते हैं – अर्थात् वह धर्मशिक्षाएं जिन्हें मसीही विश्वास और आचरण के लिए परमेश्वर के परम मानकों की शिक्षा देने रचा गया है। इसके स्थान पर वे ऐसे शिक्षकों की भीड़ जमा करते हैं जो कथा-कहानियों से उनका मन बहलाकर मनोरंजन करें और उनके कानों की खुजली मिटाए – ऐसी शिक्षाएं जो उनके देह-स्वभाव और मूर्खतापूर्ण अटकलों और परिकल्पनाओं के साथ मेल खाती हो (2 तिमु 4:3-4)।
कौन-सी बात आपको अपने शिक्षको अर्थात् अपने माता-पिता और पास्टर की सुनने से रोकती हैं? क्या आप इतने घमंडी हैं कि सुधार को ग्रहण नहीं कर सकते? इतने हठीले हैं कि अपनी ग़लतियों को मान नहीं सकते? क्या आप इतने विद्रोही स्वभाव के हैं कि किसी और की सलाह के द्वारा अपने को बदल नहीं सकते? ये सब ठट्ठा करने वालों की पहचान और उनके चिन्ह हैं। अगर आप तुरंत पश्चात्ताप करके अपने को परमेश्वर के वचन के सामने नम्र और दीन नहीं करेंगे तो कंगाली और लज्जा ही आपकी अंतिम नियति है।
क्या आप चर्च में सोते हैं? अगर आपका पास्टर उम्र में आप से छोटा है, तो क्या आप कुढकुढाते हैं कि वह आपको सिखाता है? क्या आप झूठी कलीसियाओं की परम्पराओं से संतुष्ट हैं? क्या आप अपने शहर की किसी तेजी से बढ़ती कलीसिया में जाते हैं ताकि अपने पास्टर के उपदेश को टाल सके? ये मूर्ख के चिन्ह हैं! जब तक कि आप तुरंत पश्चात्ताप करके अपने को परमेश्वर के वचन के सामने दीन और नम्र नहीं करते, तब तक कंगाली और अप्रतिष्ठा ही आपकी अंतिम नियति बनी रहेगी।
प्रभु यीशु ने पहाड़ी उपदेश का जब समापन किया तो उसने इस सबक को स्पष्ट कर दिया। उसने कहा, कि उसके उपदेश को सुनना परंतु उसके अनुसार न करना अपने जीवन का निर्माण रेत पर करने के समान है। समय और अनंतकाल का तूफान आपको बहा ले जाएगा (मत्ती 7:24-27)। परंतु बुद्धिमान मनुष्य उसकी शिक्षा को सुनेगा, और अपने जीवन का निर्माण चट्टान पर करेगा। वह समय और अनंतकाल, दोनों ही में मजबूती से स्थिर खड़ा रहेगा।
मान-सम्मान आप की पहुंच में है। परमेश्वर ने सदृश्य सृष्टि में सच्ची बुद्धि का परिचय दिया (भजन 19:1-6; रोमि 1:20)। बाइबल में उसने इसका विस्तार से वर्णन (व्यवस्था 29:29; भजन 19:7-11; 2 पतरस 1:19-21)। उसने अपनी गुप्त बुद्धि की शिक्षा देने प्रचारकों को आपके पास भेजा (1 कुरिं 2:1-16; 1 तिमु 3:16)। यदि मनुष्य अपने को दीन करें, तो सत्य उनके लिए उपलब्ध है (यशा 66:2)। यदि वे नम्र नहीं होंगे, तो वह उनके मनों को पलटकर उन्हें विनाशकारी कृतियों पर छोड़ देगा ताकि वे आपस में एक दूसरे के साथ घिनौनी लैंगिक विकृतियां करें (रोमि 1:21-28)। कितने शर्म की बात है!
इस नीतिवचन के प्रकाश में अपना परीक्षण करें। यदि आप शिक्षा को सुनते हैं, परंतु अपने जीवन में उसका व्यवहारिक उपयोग करने से पहले ही उसे भुला देते हैं, तो आप एक मूर्ख मनुष्य हैं। आप तय कंगाली और लज्जा की ओर बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं। यदि आप सुधार को सुनकर कुढ़कुढाते हैं, तो आप एक ठट्ठा करनेवाले व्यक्ति हैं। आप बड़ी तेजी से तय कंगाली और लज्जा की ओर बढ़ रहे हैं। दपट को शरण जाना और शिक्षा तथा निर्देश को मानना बुद्धि है, क्योंकि शिक्षा और उन्नति का माध्यम ये ही हैं। परमेश्वर तथा सब भले मनुष्य ऐसे व्यक्ति का सम्मान करेंगे।
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