नीतिवचन 13:16

हर एक नीतिज्ञ मनुष्य तो ज्ञान से काम करता है, परन्तु मूर्ख अपनी मूढ़ता का तमाशा बनाता है।

कपोल कल्पना या हक़ीकत? मिथ्या या सत्य? आशावान या पक्की निश्चितता? क्या आपको पक्का यकीन है? प्रत्येक मनुष्य को जीवन में अपनी विचारधारा और चुनावों के लिए एक बुनियाद चुननी ही पड़ती है। यह अटल है। मूर्ख लोग इस संसार को अपने अपने मतों और कल्पनाओं पर विश्वास करवाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं, और उनकी मूर्खता सबको दिखाई देती है। परन्तु बुद्धिमान मनुष्य अपनी विचारधारा, सम्भाषण और कार्यों के लिए चतुराई से ज्ञान को चुनते हैं।

एक अन्य नीतिवचन में सुलैमान ने इसे बड़ी कुशलता से कहा, “ भोला हर एक वचन की प्रतीति करता है, परंतु चतुर सम्भल के चलता है। ” (नीति 14:15)। यही फर्क है। मूर्ख सुनी-सुनाई किसी भी बात पर विश्वास कर लेता है, जबकि चतुर और नीतिज्ञ मनुष्य प्रत्येक बात के विषय में सतर्क और संदेहवादी होता है। उसने यह भी कहा : “ चतुर बुरार्इ को पहले से देख के आप को छिपाता है, परंतु भोले लोग उस में आगे बढ़ जाते हैं और दंड पाते हैं।” (नीति 22:3)। चतुर मनुष्य सोचकर समझते हैं कि क्या होगा, और उससे बचते हैं; मूर्ख अन्धाधुन्द तरीके से उतावली अज्ञानता में होकर तेजी से दौड़ पड़ते हैं, और अपनी इस जल्दबाज़ी के नतीजे में दण्ड पाते हैं। बुद्धि के लिए सतर्कता को अपनाओ।

नीतिज्ञ मनुष्य बुद्धिमान, विवेकी, चौकन्ना होते हैं, और सार्थक परख का उपयोग करते हैं। वे केवल उन्हीं बातों के साथ व्यावहारिक बनने में सतर्क रहते हैं जो सत्य सिद्ध की जा सकती है। वे उस प्रत्येक बात पर जिसे वे सुनते या पढ़तें हैं, अन्धेपन में विश्वास नहीं करते; इससे पहले कि वे इसे करने की सोचे, अवश्य है कि उसे प्रमाण के रूप में स्थापित किया जाए। वे जल्दबाज़ी में निष्कर्षों पर नहीं पहुंचते, न अफवाहों को मानते हैं, न सनसनीखेज़ या संवेदनशील बातों पर भरोसा रखते हैं, और न ही बढ़ा-चढ़ाकर बताई बातों पर विश्वास करते हैं। वे ऐसी चीज़ों के विषय में चर्चा करने से बचते हैं जिनका उन्हें बहुत कम ज्ञान है, न ऐसे कार्यों करते हैं जिनकी उन्हें कोई समझ नहीं, न ही ऐसे लोगों के साथ कोई सरोकार रखते हैं जिन्हें वे जानते नहीं, और न ही बिना तथ्यों के उनके अभिमतों को ग्रहण करते हैं (नीति 14:8)।

परन्तु मुर्ख सुनी-सुनाई और पढ़ी हुईं सभी बातों पर विश्वास करते हैं, विशेषकर तब जब वे बातें उनकी मूर्खतापूर्ण पूर्वधारणाओं के अनुरूप हो। वे अपने अज्ञानी अभिमतों का समर्थन करनेवाले किसी भी स्रोत की खोज में रहते हैं; वे उसे सत्य समझकर उस पर विश्वास रखते हैं, और दूसरों को भी उसके बारे में बताते हैं। उन्हें समझ की सचमुच कोई चाहत नहीं है : वे केवल अपने ही मन की बातों को प्रकट करना और उनका प्रचार करना चाहते हैं (नीति 18:2)। यदि उन्हें कोई बात विश्वसनीय या मनोहर लगे तो वे उस पर तुरन्त विश्वास कर लेते हैं। यदि कोई बात उन्हें सनसनीखेज़ और तहलका मचानेवाली जान पड़े तो वे उसे लेकर सचमुच अति उत्साही हो जाते हैं। वे किसी भी मामले या समस्या को सुने बिना ही उसका प्रत्युत्तर देने लगते हैं (नीति 18:13)। अपने मनोभाव ही उनके लिए तथ्य हैं। कितने शर्म की बात है!

चतुर मनुष्य जवाब देने से पहले समस्या या मसले की जांच-पड़ताल करते हैं, किन्तु मूर्ख अपनी मूर्खता की उल्टी कर देते हैं (नीति 15:28)। चतुर लोग अपनी जानकारी की सभी बातों को प्रकट नहीं करते हैं, किन्तु मूर्ख ऐसी बातें बकते हैं जिनके विषय में वे जानते तक नहीं (नीति 12:23)। चतुर लोग ज्ञान का सही-सही उपयोग करते हैं, किन्तु मूर्ख अपनी मूर्खता को उगल देते हैं (नीति 15:2)। मूर्ख लोग अपने शब्दों और कार्यों से अपनी मूर्खता को प्रतिदिन ही उजागर करते हैं (सभोपदेशक 10:3)। किन्तु कुलीन मनुष्य सब बातों की परीक्षा करते हैं (प्रेरितों के काम 17:11)।

हमें ऐसे पुत्रों की ज़रूरत है जो इस्साकार के पुत्रों के समान हो, जैसा कि बाइबल में दर्ज है, ऐसे मनुष्य “जो समय को पहचानते थे कि इस्राएल को क्या करना उचित है” (1 इति. 12:32)। ये वे मनुष्य हैं जो धर्म से न्याय करते हैं, केवल बाहरी रूप को देखकर नहीं (यूहन्ना 7:24)। ये भले मनुष्य हैं, जो ईश्वरीय ज्ञान से सम्पन्न हैं, और एक दुसरे को समझा सकते हैं (रोमियों 15:14)। यह नीतिवचन उस हर बात का सारांश प्रस्तुत करता है जो उपदेशक सुलैमान अपने पुत्र को सिखाना चाहता था।

सुलैमान ने सभोपदेशक की पुस्तक में मूर्खों का पर्दाफाश किया। उसने इन बकावादियों का वर्णन ऐसे लोगों के रूप में किया जिनकी बात का आरम्भ मूर्खता का और अन्त उपद्रवी पागलपन का है (सभोपदेशक 10:13)। उनके पास शब्दों का भण्डार होता है, भले ही यह कोई नहीं जानता कि कल क्या होने जा रहा है (सभोपदेशक 10:14), और वे कड़े परिश्रम से हताश हो जाते हैं, क्योंकि वे सीधी और सरल बातों को भी नहीं समझ पाते (सभोपदेशक 10:15)।

पौलुस ने हमें बुद्धिमान बनने की और प्रभु की इच्छा को समझने की आज्ञा दी (इफि 5:17)। हमें समझ में बालकों के समान नहीं, बल्कि सयाने मर्द बनना है (1 कुरिं 14:20)। पवित्रजन सभी बातों को परखते हैं (1 थिस्स 5:21)। ज्ञान का एकमात्र स्रोत केवल परमेश्वर का वचन और परमेश्वर का भय मानना है (नीति 1:7)। जो कुछ पवित्रशास्त्र के विपरीत है, वह अज्ञानता है (यशा 8:20)। अवश्य है कि आप परमेश्वर को सच्चा और हर एक मनुष्य को झूठा ठहरने दे (रोमियों 3:4)। बाइबल प्रत्येक विषय पर सत्य है, और इस कारण अवश्य है कि आप हर एक विरोधी बात का द्वेष करें (भजन 119:128)। अपनी ही समझ पर निर्भर रहने के बजाय, अपने पूरे मन से प्रभु पर भरोसा रखें (नीति 3:5-6)। वह चतुर मनुष्य के पथ की अगुवाई करेगा (भजन 37:23)।

प्रिय मसीही, क्या आप उन बातों को बार बार करते हैं जिन्हें आपने परखा नहीं है? क्या आप मानते हैं कि जो बातें पुस्तकों, पत्रिकाओं या अखबारों में लिखी होती हैं वे अवश्य ही सच हैं? आप कितनी बार “मुझे लगता है…” कहते हैं? क्या आप विचित्र या अलौकिक “नतीजों” के विषय में संदेहवादी हैं? क्या आप “गवाहियों” पर विश्वास करते हैं? क्या आप किसी चीज का उपयोग करने से पहले वह किस प्रकार कार्य करती है, समझने का प्रयत्न करते हैं? क्या आपको लगता है कि मुफ्त में प्रवेश दिलानेवाले सेमिनार और शिक्षा के वर्ग आपको मदद करने के लिए हैं? क्या आप मानते हैं कि “मुफ्त का भोजन” मिलता है, जिसे आपको जाकर केवल खाने की आवश्यकता है? क्या आप जानते हैं कि आंकड़े झूठ नहीं बोलते, परन्तु झूठे लोग मूल्यांकन कर सकते हैं? क्या एक लोकप्रिय भीड़ आप पर अपने सच होने का प्रभाव डालती है? क्या आप पर अपनी सरकार या किसी ऐसी संस्था उसके विरोध में, जिसे आप पसंद नहीं करते, फैलाई गई “जानकारी” का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है?

क्या एक धर्म-विशेष के कट्टरपंथी लोग धर्मनिरपेक्ष लोगों की तुलना में अधिक सच बोलते हैं? धार्मिक कट्टरवादी क्या है? बड़े शर्म की बात है कि हमारे देश के कट्टरपंथी समुदाय धर्मनिरपक्षों का शिकार करते हैं, क्योंकि एक बहुमत सनसनीखेज़ अफवाहों को बड़ी बेशर्मी से हज़म है। याद रहे, राजनीतिक या आर्थिक अटकले लगाना या मात्र अनुमान से निष्कर्षों पर पहुंचना मसीहियों का काम नहीं है। उन्हें ऐसी बातों का सामना ज्ञान के साथ करना है – अर्थात् वह ज्ञान जो परमेश्वर के वचन में पाया जाता है, या जिसे सच्चाई के रूप में स्थापित किया जा चुका है। फाजिल धर्मी मसीही लोग स्वयं को, और अपने धर्म को मूर्ख बनाते हैं जब वे समय समय पर इस संसार का अमुक-अमुक दिन अन्त होने की भविष्यवाणी करते हैं। आज संसार जगत के अन्त की झूठी भविष्यवाणियां करनेवालों का मज़ाक उड़ाता है, जिस में वे अपने को सही ठहराते हैं। प्रिय मसीही, ज्ञान की मांग करें!

यदि कोई बात “इतनी अच्छी दिखे कि सच लगे,” तो यह वैसा ही है – “इतनी अच्छी कि सच लगती है।” उस पर विश्वास न करें। आप ने किसी नई सच्चाई की खोज नहीं की है, बल्कि आप ने अपने कमज़ोर दिमाग के लिए एक प्रलोभन और अन्य निर्बुद्धियों के लिए ठोकर का पत्थर खोज निकाला है। हर मिनट में एक बुद्धू पैदा होता है, और आपको उस में से एक नहीं होना है। आपको ज्ञान-सहित व्यवहार करना है, और परमेश्वर ने आपको वह सब जिसकी आपको ज़रूरत है, पवित्रशास्त्र में दे रखा है (2 तीमुथियुस 3:16-17), और आज्ञा दी है कि सब बातें परखी जाएं (1 थिस्स 5:21)।

इस संसार में इतने सारे धर्म क्यों हैं? क्योंकि अधिकतर लोग धर्म के दावों को परखने या उनका खण्डन करने के लिए चतुराई से प्रयास किए बिना ही अपने पालकों, पुजारियों, मौलवियों, और शिक्षकों पर विश्वास कर लेते हैं। गौर करें कि किस प्रकार परमेश्वर ने मूर्तिपूजा का तथा अपने धर्म के झूठ का परिक्षण न कर पाने के लिए मूर्तिपूजकों का उपहास किया (यशा 44:9-20; हब 3:18-20)। कुलीन बिरीयावासियों ने तो प्रेरित पौलुस द्वारा कही बातों को पवित्रशास्त्र में खोजकर और परिक्षण करके देखा (प्रेरितों के काम 17:11)। धार्मिक झूठ पर केवल वे लोग विश्वास रखते हैं जो डरपोक, अज्ञानी हैं, या समिक्षारूपी प्रश्न पूछने में आलसी हैं।

कभी सोचकर देखा है कि मसीही धर्म में इतने सारे सम्प्रदाय क्यों हैं? क्योंकि पास्टर लोग और व्यक्ति जो मसीही होने का दावा करते हैं, उन्होंने प्रेरितीय सत्य के लिए दृढ़ता से संघर्ष नहीं किया, और न ही उन्होंने बाइबल के सत्य में होनेवाले किसी भी नवीनीकरण, बदलाव या उसके इन्कार के विरोध में उग्रता से सामना किया। पवित्रशास्त्र में परमेश्वर का प्रकाशन परम और अन्तिम है, और उसकी शिक्षाओं से होनेवाले किसी भी समझौंते का प्रबलता से इन्कार किया जाना चाहिए, फिर झूठ चाहे कितना ही लोकप्रिय या प्रभावशाली क्यों न हो।

परमेश्वर के जन को चाहिए कि वह अन्य किसी भी उद्यमि की तुलना में अपने आप को सत्य के वचन में अधिकृत सिद्ध करने के लिए तल्लीन हो जाए (2 तीमुथियुस 2:15; तीतुस 1:9)। कई पास्टरों और शिक्षकों ने बाइबल प्रचार के खरे उपदेश के स्थान पर मनोरंजन और दंतकथाओं को जगह दी है (2 तीमुथियुस 4:1-4)। उनके दैहिक नतीजों के रूप में उनकी मूर्खता को इसी नीतिवचन के अनुसार खुल्लम-खुल्ला उजागर किया जाएगा (2 तीमुथियुस 3:6-9)। परमेश्वर का प्रत्येक जन ज्ञान-सहित व्यवहार करने की अपनी ज़िम्मेदारी को थरथराते और कांपते हुए निभाए।

प्रभु यीशु मसीह ने बड़ी चतुराई से ज्ञान का उपयोग कर विषयों को सम्बोधित किया; उसे ऊंचा किया गया और उसकी बढ़ाई की गई, और अति महान किया गया (यशा 52:13)। उसमें तीव्र समझ थी और धार्मिकता से न्याय करने उस में ज्ञान का आत्मा निवास करता था (यशा 11:1-5)। उसने उन यहूदी अधिकारियों के अव्यवहारिक और चालाकी से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए, जो उससे नफ़रत करते थे, और उसने उनसे ऐसे प्रति-प्रश्न पूछे जिनसे उनकी अज्ञानता और ढ़ोंग उजागर हुआ (लूका 2:41-47; 20:1-8, 20-47)। उसने हमेशा ही ज्ञान के साथ बातों को सुलझाया। वह आपके लिए मिसाल है, इस कारण, आप अपने जीवन में जिन जिन परिस्थितियों का सामना करोगे, उन से निपटने के लिए उसके नक़्शे-कदम पर चले।

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