नीतिवचन 13:12

जब आशा पूरी होने में विलम्ब होता है तब हृदय उदास हो जाता है; पर इच्छा की पूर्ति का अर्थ है : जीवन-वृक्ष!

आशा एक अनमोल और अद्भुत चीज़ है। यहां एक उन्नतिकारक और महत्वपूर्ण नीतिवचन है, बशर्ते आप इस पर ध्यान से विचार करेंगे तो। आशा के बिना, मनुष्य हताश हो जाता है और अपनी निराशा से बचने के लिए कुछ भी कर सकता है। पर जब आशा हो तो मनुष्य किसी भी चीज़ को सहन कर सकता है, चाहे उनकी परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हो जाएँ। बुद्धिमान लोग आशा के इस महान मूल्य को समझते हैं।

इस नीतवचन में आशा को लेकर कई सबक दिए गए हैं। क्या आप जानते हैं कि इसे कहां खोजना है? इसे कैसे बनाए रखना है? क्या आप जानते हैं कि जब दूसरे इसे खो देते हैं तो कितना कष्ट होता है? क्या आप जानते हैं कि दूसरों को आशा कैसे देनी है? क्या आप ने अपने लिए आशा पाई है और दूसरों को भी दे पाते हैं? बुद्धि चीजों की ठीक ठीक परख करने और सही निर्णय लेने की शक्ति है – यह जानना कि किसी भी स्थिति में क्या करना है। बुद्धि में आशा के बारे में ये महत्वपूर्ण सबक शामिल हैं।

आशा इच्छा की गई किसी वस्तु को पाने की अपेक्षा है। आप जिस चीज की इच्छा रखते हैं, अगर वह अपेक्षित समय पर प्राप्त नहीं होती है, तो विलम्ब के कारण आपका मन और प्राण दोनों दुखी और उदास हो जाते हैं। लेकिन जब इच्छा की गई वस्तु अंततः मिल जाती है, तो यह आशा जीवन का वृक्ष ठहरती है: आपका मन और प्राण दोनों में उत्साह और नई जान आ जाती है। आशा के ये दोनों पहलू आत्मिक और सांसारिक दोनों क्षेत्र के ही सभी मामलों में सत्य हैं।

यदि आप आश्वस्त हो जाते हैं कि आपकी इच्छाएं समय पर पूरी हो रही हैं, तो आशा एक सुखद सोच बन सकती है। लेकिन यह एक दर्दनाक याद भी बन सकती है, यदि इच्छा की गई बातों को पाने में देरी या कठिनाइयों से निराश हो जाते हैं। भूख इसका उदाहरण है. जब आप समय पर खाते हैं तो यह भोजन स्वादिष्ट लगता है। लेकिन अगर आपको समय पर खाना खाने से रोका जाए तो यह काफी कष्टदायक हो सकता है।

निराशा मानव अनुभव में सबसे विनाशकारी और दर्दनाक भावनाओं में से एक है। इससे हर कीमत पर बचना चाहिए, क्योंकि यह मनुष्य के दृष्टिकोण और काम करने की काबलियत को नष्ट कर देती है। एक बुद्धिमान व्यक्ति केवल ऐसी बातों की आशा करता है जो निश्चित हैं, और वह इस दुनिया की उन व्यर्थ चीजों पर किसी भी प्रकार की इच्छा या आशा रखने से बचता है हासिल न होने पर निराशा या हताशा का कारण बनती हैं। वह मानवीय कमज़ोरियों को समझता है, बहुत अधिक उम्मीदें रखने से बचता है, और संतुष्ट रहना सीखता है (भजन 146:3-5; इब्रानियों 13:5-6)।

चूँकि निराशा अत्यंत विनाशकारी और दर्दनाक होती है, इस कारण एक भला मनुष्य अपने आस-पास के लोगों को आशा से भरा रखने के यत्न में रहता है, जैसे कि उसकी पत्नी, बच्चे, कर्मचारी और दोस्त (1 शमू 23:16; भजन 123:2; सभो 4:9-12) ; 2 कुरिन्थ 2:2,6-11; कुलु 4:1; 1 थिस्स 5:11)। सुलैमान, जो अपने बेटे को राज-सिंहासन के लिए प्रशिक्षित कर रहा था, उसने उसे अपने देश वासियों को कैसे आशा से भरा रखना है इस विषय पर ज्ञान की शिक्षा दीं, ताकि वे हतोत्साहित न हो जाएं जो उन्हें विद्रोह करने के लिए मजबूर कर दे (नीति 16:15; 19:6,12; 20:28; 28:16; 29:14)।

यदि आपको नीतिवचन की पुस्तक प्रिय है, तो यकीन करें, यह एक सर्वोत्तम नीतिवचन है। इस नीतिवचन में सुलैमान द्वारा प्रयुक्त तीन रूपकों और एक उपमा को पहचानें। सबसे पहले, आशा उन चीज़ों का एक रूपक है जिनकी आशा की जाती है; आशा अपने आप में किसी बात की स्थगिती या विलंबन नहीं है; बल्कि जिन बातों की आशा की जाती है वे समय पर नहीं मिलतीं। दूसरा, “इच्छा” करना मनभावनी बातों के लिए प्रयुक्त अलंकर है, क्योंकि चीज़ों की इच्छा पहले से ही मौजूद है; यह इच्छित वस्तुएँ ही हैं जो अंततः प्राप्त होती हैं और मन को उल्लासित कर देती हैं। यह बस एक रूपक है।

एक तीसरा रूपक प्रयुक्त हुआ है, और वह है ‘हृदय।’ यह हृदय की भावनाओं और आनंद के लिए दर्शक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है : यह दार्शनिक शब्द उन बातों को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होता है जो उन चीजों को दर्शाता है जो आपको प्रिय हैं। और एक रूपक है, जहां इच्छाओं के साकार होने की तुलना जीवन-वृक्ष से की गई है, जो अपने फल के द्वारा आत्मा को ऊर्जावान और उसमें नई जान डाल सकता है, हालांकि जो इच्छा पूरी होती है वह कोई वास्तविक जीवन-वृक्ष नहीं है।

यह नीतिवचन सुलैमान का एक अवलोकन है, और इसमें निहित शिक्षा की खोज बड़ी सावधानी से करनी ज़रूरी है। हालाँकि कई नीतिवचन अपने पाठ को प्रत्यक्ष रूप में साफ़ साफ़ प्रस्तुत करते हैं, पर इन जैसे नीतिवचनों में जो ज्ञान सिखाया जाता है उसे सीखने और उसका अपने जीवन में व्यवहारिक उपयोग के लिए इस तरह के बुनियादी अवलोकनों को समझना बिलकुल अवश्य है। इस नीतिवचन से आशा के बारे में आप ऐसा क्या सीख सकते हैं जिससे कि आप परमेश्वर और मनुष्यों की दृष्टि में बुद्धिमान बन सकें? याद रखें, परमेश्वर के मुंह से निकले वचनों का दायरा बहुत व्यापक हैं और ये आपको कई तरह के सबक सिखा सकते हैं (भजन 119:96)।

जो लोग अधिकार के स्थान पर बैठे हैं, जैसे पास्टर, कलीसिया के प्राचीन,कलीसिया के व्यवस्थापक, आदि, उन्हें आशा के बारे में दूसरों से अधिक सीखना चाहिए, क्योंकि जो लोग उनकी अगुवाई में हैं, और उनपर भरोसा रखते हैं, वे जीवन की कठिनाईयों से बड़ी आसानी से टूट सकते हैं और निराशा में डूब सकते हैं, अगर उन्हें भविष्य को लेकर पर्याप्त उम्मीदें नहीं दी जाती हैं। अगर प्रतिफल की आशा ही न हो तो अपने कर्तव्यों को पूरा करने पर लगातार ज़ोर देते रहने से आशा ही मिट जाती है। इसके विपरीत आशा से भरा व्यक्ति बड़े आनंदिन मन से अपने कर्तव्यों का पालन करेगा। बुद्धिमान लोग यह सबक सीखते हैं और अक्सर अपने अधीनस्थ लोगों की आशा बन जाते हैं जब वे अधिक उत्कृष्ट प्रबंधक बनने की कीमत को समझते हैं।

एक सद्गुणी स्त्री पत्नी के रूप में बहुत कुछ त्याग देती है (उत्पत्ति 3:16; 1 कुरिन्थ 11:9)। कहते है, “पुरुष सुबह से शाम तक मेहनत कर सकता है, लेकिन स्त्री का काम कभी ख़त्म नहीं होता।” वह इस वास्तविकता को कैसे सहन कर सकती है?ऐसे में एक आलोचनात्मक, प्रेम से रहित, या लापरवाह पति उसकी आशा को नष्ट कर सकता है और उसे निराशा में डाल सकता है, भले ही वह चर्च में उससे शादी करते समय कितनी भी आशावान क्यों न हो। यह वैवाहिक दुर्व्यवहार आज एक आम संस्कृति बन गई है। परमेश्वर अपने कई वचनों में पतियों को आज्ञा देता है कि वे इतने विचारशील, क्षमाशील, धैर्यवान और रोमांटिक बनें जिससे कि वे अपनी पत्नियों का हौसला बन सकें (व्यवस्था 24:5; नीति 5:19; सभो 9:9; इफि 5:28-29; कुलु 3:19; 1 पतरस 3:7; आदि देखें)।

किसी भी परिवार में बच्चें माता-पिता की इच्छा से नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा से पैदा होते हैं। बच्चों के आलोचक, उनके प्रति दबंग, कठोर, या अत्यधिक प्रतिबंधात्मक पिता (या माताएं) अपने बच्चों की आशा छीनकर और उन्हें भविष्य के लिए बिना किसी उम्मीद के छोड़ कर उन्हें हतोत्साहित कर सकते हैं। इस प्रकार के दुर्व्यवहार से युवाओं का उत्साह और ज़िन्दादिली उनके दिल और दिमाग से छीन ली जा सकती है। यह चौंकाने वाली बात है कि कुछ माता-पिता सोचते हैं कि उनके बच्चों को पुरस्कार की उम्मीद के बिना ही अनिश्चित काल के लिए अपने माता-पिता की अधीनता में आना चाहिए। परमेश्वर पिताओं (और माताओं) को आदेश देता है कि वे अपने बच्चों की आशा को नष्ट न करें (भजन 103:13-14; इफि 6:4; कुलु 3:21)।

बाइबल के परमेश्वर, यहोवा, ने कुचले हुए मनुष्यों और यहां तक कि जानवरों के लिए भी आशा की सावधानीपूर्वक रक्षा की। उसे धन्य कहो! जो जो देश ख्रिश्चन हैं, उन्हें हमेशा सबसे अधिक आशा रही है, क्योंकि वे आशा के एकमात्र परमेश्वर की आराधना करते हैं। दिहाड़ी मजदूरों को प्रतिदिन भुगतान किया ज़रूरी होता था, इसलिए कि कही ऐसा न हो कि नगद राशी पाने की उनकी आशा नष्ट हो जाए (व्यवस्था 24:14-15)। दाँवते समय चलते हुए बैल का मुँह बान्धने की भी मनाही थी (व्यव 25:4)। माता-पिता की सम्मति से कियें जानेवाले विवाह में हनीमून के लिए पुरे एक वर्ष की छुट्टी होती थीं (व्यवस्था 24:5)। इसराइल में हर सातवें साल खेती के काम से पुरे एक साल की छुट्टी होती थी, यहाँ तक कि नौकरों को भी (लैव्य 25:1-7,20-22)।

दुष्टों को बहुत कम आशा होती है (इफि 2:12; 1 थिस्स 4:13)। उनकी उम्मीदों का अंत हमेशा निराशा में होता है, क्योंकि वे शैतान, जो निराशा का देवता है, के झूठे भ्रम के पीछे भागते हैं, (इफि 2:1-3; 2 कुरिन्थ 2:6-11)। वह जानता है कि उसके दिन भर गए हैं और उसकी आने वाली पीड़ा निश्चित है (मत्ती 8:29; प्रकाशितवाक्य 12:12)। वह अपने ठगे हुओं को अपने साथ निराश करना चाहता है। इस दुनिया में सभी चीजें निराशाजनक और अस्थायी हैं, जो उनका पीछा करने वालों का ही नुकसान करती हैं (1 युहन्ना 2:15-17)।

दुनिया का हर पाप, फिल्म, गाना या विचार का एक परिणाम है – निराशा, और केवल निराशा (1 कुरिन्थ 15:32;प्रकाशित 9:11)। वे अपने दुखों को कपिल शर्मा की हास्यात्मक बातों और चुटकुलों, शराब और नशीली दवाओं, काल्पनिक फिल्मों, दिमाग को सुन्न कर देने वाला संगीत, रोमांच के चरम खेल और यहां तक कि आत्महत्या के जरिए कम करने की कोशिश करते हैं। परन्तु वे मर जाते हैं और नरक में चले जाने के बाद इस नतीजे पर आते हैं कि उनकी निराशा बिलकुल सही थी (नीति 11:7; अय्यूब 8:13-14; 11:20; 27:8; मरकुस 9:43-48)!

धन पर विचार करें. धन से संतुष्टि नहीं मिलती, क्योंकि जब आप एक मुकाम हासिल कर लेते हैं, तो आपमें अगले मुकाम को हासिल करने का लालच पैदा हो जाता है (सभो. 5:10)। और हाँ, आपसे आपका धन छीनने वालों की तादाद केवल बढ़ती ही जाती है (सभो. 5:11), और लिखा है कि धनवान चैन से सो नहीं सकते (सभो. 5:12)। धन कई कारणों से लुप्त हो जाता है (मत्ती 6:19), और आप मृत्यु के समय अपने साथ एक ढेला भी नहीं ले जा पाएंगे, ओह हो हो (लूका 12:15-21; 1 तीमु 6:7)! जितना अधिक आप कमाओगे, उतना अधिक सरकार आपसे टैक्स वसूलेगी। आखिर आप अपनी आशा भ्रम पर क्यों रखते हो भाई (नीति 23:4-5)? आप जो भी मेहनत करते हैं इसमें आप केवल निराश, हताश और व्याकुल ही होंगे (1 तीमु 6:6-10)। वादा है!

परमेश्वर से जन्मा हर एक व्यक्ति जो इस दुनिया में सुख पाना चाहता है, वह उतना ही दुखी, या इससे भी बदहाली में होगा, क्योंकि उसने अपनी उम्मीदें उन चीजों पर रखी हैं जो उसे संतुष्ट नहीं कर सकती। लेखक सुलैमान ने देखा कि इस संसार में सब कुछ व्यर्थ और आत्मा की झुँझलाहट है (सभो 1:14; 2:11,17)। संतोषसहित परमेश्वर-भक्ति बड़ा लाभ है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की आशा परमेश्वर और स्वर्ग में होती है, जो कि फलद्रुप पवित्रजनों की निश्चित आशा है (उत्पत्ति 15:1; 1 तीमु 6:6; भजन 73:25-26)।

इस दुनिया से ज्यादा उम्मीद न रखने में ही आपकी बुद्धिमानी है, बल्कि आनेवाले नए जगत से ज्यादा की उम्मीद करें (2 कुरिन्थ 4:16 – 5:9; कुलु 3:1-4)। इसलिए, आपको अगूर के साथ प्रार्थना करनी चाहिए जो धन का लोभी नहीं था (नीति 30:7-9)। अभी आपके पास जो है आपको उसमे ही संतुष्ट रहना चाहिए, ताकि आप धार्मिकता से संतुष्ट रहना जान लें (नीति 16:8; भजन 37:16; फिल 4:11-13; इब्रा 13:5-6)। आप निराशा से बच सकते हैं और हमेशा सुखी रह सकते हैं, यदि आप इस दुनिया की चीजों पर अपनी आशा न रखें (अय्यूब 1:20-22; हब 3:17-19)।

जब कोई विश्वासी निराश हो जाता है, तो उसके पास एक आसान समाधान होता है जिसके विषय में ये दुनिया कुछ नहीं जानती। वह अपने को उस आशा की याद दिला सकता है जो उसे परमेश्वर में है, जैसा कि दाऊद ने हमें दिखाया (भजन 42:5,11; 43:5)। आशा का परमेश्वर हमें वह अनन्त आशा देने में सामर्थी है जो पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से आती है (रोमियों 15:13)। यहां तक कि अपनी मृत्यु के समय भी, वह आनंदमय और शांतिपूर्ण आशा से भरा हो सकता है, क्योंकि वह स्वर्ग और मृतकों के पुनरुत्थान, धन्य आशा के बारे में जानता है जो मसीह यीशु में ही है (नीति 10:28; 14:32; 1 कुरिन्थ 15:19) । विश्वास रखनेवाले के पास आशा है, जो अविश्वासी के पास कभी नहीं होगी – विश्वास के साथ परमेश्वर की प्रतीक्षा करना।

यदि आप अपनी आशा को स्थापित करने के लिए परमेश्वर के वचन का उपयोग करते हैं (रोमियों 15:4), तो अन्य लोग इसका कारण पूछेंगे, क्योंकि उनके पास कोई कारण नहीं है (1 पतरस 3:15)। जब आशा पूरी होने में विलम्ब होता है, तो आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास के द्वारा आशा के विरुद्ध आशा कर सकते हैं (अय्यूब 13:15; विलाप 3:24-26; रोम 4:18-20)। और आप जान सकते हैं कि आपके पास आशा की सर्वोत्तम परिभाषा है – धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना, क्योंकि एक ख्रिश्चन मनुष्य की सबसे बड़ी आशा निश्चित रूप से पूरी होगी (रोम 8:23-25; इब्रानियों 10:36-37)।

विश्वासी, जब तक उनमें जीवन है, कभी हार नहीं मानते, क्योंकि एक जीवित कुत्ता मरे हुए शेर से उत्तम है (सभो 9:4-10)। जब तक परमेश्वर सारी आशा दूर नहीं कर देता, तब तक आशा जीवित होती है, और तब भी आशा है। दाऊद ने अपने बीमार बेटे के लिए पूरे दिल से प्रार्थना की, और जब बच्चा मर गया तो उसने प्रार्थना करना छोड़ दिया, फिर भी उसे पता था कि वह उसे फिर से देखेगा। मृत्यु के बाद भी उसे आशा थी (2 शमू 12:15-23)। पौलुस को यकीन था कि उसकी मृत्यु इफिसुस में ही होगी, लेकिन उसे उस परमेश्वर में आशा थी जो मरे हुओं को जिलाता है (2 कुरिन्थ 1:8-10)।

बाइबल उन मासूम विश्वासियों के गौरवशाली उदाहरणों से भरी हुई है जो केवल प्रभु में अपनी आशा और उम्मीद रखते हैं। क्या सारा ने रजोनिवृत्ति का लम्बा समय बीत जाने के बाद भी एक बच्चे को जन्म दिया और मुस्कुराहट के साथ दूध उसे पिलाया (उत्पत्ति 21:5-8; इब्रानियों 11:11)? याकूब के लिए यूसुफ कितना जीवन का वृक्ष था, जब उसने उसे जीवित और मिस्र के सिंहासन पर एक प्रधानमंत्री के रूप में पाया (उत्पत्ति 45:25-28)? अपने को प्रभु को समर्पित करने के लिए हन्ना के पास कितने बच्चे थे (1 शमू 1:19-28; 2:19-21)? और इस्राएल भी उनके समान था जो बन्धुवाई से छुटकारा पाने का सपना देख रहा था (भजन 126:1-3)।

फिर भी जो आशा पूरी होती है उस का इससे भी बड़ा उदाहरण है! 4,000 वर्षों तक, परमेश्वर के पुत्रों ने स्त्री के उस वंश के आगमन की प्रतीक्षा की जो उन्हें पाप, मृत्यु और नरक से मुक्ति दिलाने के लिए आनेवाला था। सब राष्ट्रों की आशा पूरी हुई। स्वर्गदूतों ने अपनी घोषणा से गाँव-गाँव को हिला दिया। शिमोन अपनी मृत्यु से पहले उसे देखकर प्रसन्न हुआ। और जब वह महिमा के साथ मरे हुओं में से जी उठा, तो उसके चेलों ने आनन्द के मारे विश्वास न किया। हे ख्रिश्चन मनुष्य, तू आज ही इस जीवित परमेश्वर पर आशा रख।

पाठक, यदि आप विश्वास के द्वारा यीशु मसीह को समर्पित हैं, तो आपके पास एक धन्य आशा, एक अभेद्य आशा, एक गौरवशाली आशा है। आप मृतकों में से पुनर्जीवित होकर स्वर्ग में एक अविनाशी विरासत में ले लिए जायेंगे, जहां यह आशा आपकी प्रतीक्षा कर रही है (1 पतरस 1:3-9; प्रेरितों 23:6; 24:15, 26:6-7; 28:11,20) . क्या आप इस पर विश्वास करते हैं? यदि आपको यह आशा है, तो यह आपके जीवन को शुद्ध और पवित्र करेगी (1 यूहन्ना 3:3)। और यह जीवन के तूफ़ानों में तुम्हारे प्राण के लिए लंगर ठहरेगी (इब्रानियों 6:18-19)। जो कोई उस पर भरोसा करेगा वह लज्जित या निराश नहीं होगा (रोम 10:11; 1 पतरस 2:6)।

बच्चों को बहुत छोटे होने पर ही प्रभु में आशा करना सिखाया जा सकता है (1 शमू 1:28; भजन 22:9; सभोपदेशक 12:1)। अगर वे परमेश्वर की सामर्थ और विश्वासयोग्यता पर अपने जीवन की नींव बनाते हैं, तो वे कभी भी जीवन की कठिनाइयों में अवसाद या निराशा में जाने की ओर प्रेरित नहीं होंगे (भजन 27:13-14; 37:7; 42:5,11; 43:5; 71: 14). यह कैसे साकार होता है? परमेश्वर के वचन से निरंतर शिक्षा पाने के द्वारा विश्वास और आशा को मज़बूत करने के द्वारा ही (भजन 78:1-8; 119:81,114; रोमियों 15:4)।

सच्चा प्रेम दूसरों में आशा पैदा करके और निराशा को दूर करके उन्हें सांत्वना देता है। चूँकि निराशा जीवन की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है, इसलिए आपको दूसरों को आशा खोने से बचाने के लिए अपने सभी व्यवहारों में विश्वासयोग्य होना होगा। परमेश्वर हम सबको विशेषकर यह आदेश देता है कि हम अपने अधीनस्थ लोगों को निराश न करें (कुलु 3:19,21; 1 पतरस 3:7; 2 कुरिन्थ 2:6-11)। अपनी विश्वासयोग्यता से दूसरों को शिक्षा देने के बाद, आपको उन्हें सुसमाचार की धन्य आशा से सांत्वना देनी ज़रूरी है (1 थिस्स 4:13-18; 5:11)।

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