नीतिवचन 13:1
बुद्धिमान बेटा अपने पिता का उपदेश सुनता है; परंतु निंदक दपट को नहीं सुनता।
अपनी बुद्धि को मापो। इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर दो। क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा सुधारा जाना पसंद करते हैं जिस के विषय में आप जानते हैं कि स्वयं उसमें भी में दोष हैं? नीतिवचन में सुलैमान ने महापुरुषों की इस पहचान पर अक्सर जोर दिया (नीतिवचन 1:5; 8:17; 9:7-9; 12:1; 13:18; 15:5,12,31-32; 23:9; भजन संहिता 32) :8-9).
बेटे अपने पिताओं के साथ रहते हैं और वे उनकी ग़लतियों, अज्ञानता और पापों को देखते हैं। युवावस्था की पापमय मूर्खता से भरे इन पुत्रों को यह पसंद नहीं है कि कोई उन्हें बताए कि उन्हें क्या करना चाहिए, अपने बाप की सुनना तो छोड़ ही दो जिसकी ग़लतियों को वे जानते हैं। इसलिए उन्हें दो कठिन विकल्पों के बीच निरंतर झुझना पड़ता है – समर्पण करे या विद्रोह।
स्वर्ग में एक परमेश्वर है, और उसने कहा है: अपने पिता की आज्ञा का पालन करो और उसका सम्मान करो। इस आज्ञा की ठट्ठा करनेवाले बेटों से वह कैसे निपटता है? मृत्युदंड! सरल, उचित, उत्तम! परमेश्वर और अपने पिता के साम्हने थरथराओ (नीतिवचन 20:20; 30:17; निर्ग 21:15,17; लैव 20:9; व्यवस्था 21:18-21; 27:16)।
नौजवान, परमेश्वर ने 71 करोड़ पुरुषों में से एक पुरुष को तेरा पिता बनने के लिए चुना है। उसने इस मामले में तुम दोनों में से किसी से भी कोई राय नहीं पूछी। यह रिश्ता उसका अपना स्वतन्त्र निर्णय था, और उसने तेरे पिता को तेरे जन्म से पहले ही पिता का पद और 20-40 साल का ज्ञान और अनुभव दिया।
इस संसार के अधिकारी सिद्ध नहीं हैं। कोई भी पिता, पति, मालिक या राजा सिद्ध नहीं होता। वे गलतियाँ करते हैं, और उनमें से कई बारबार। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जो व्यक्ति जिस पद पर बैठा है उस पद की गरिमा के कारण उससे डरना, उसकी आज्ञा मानना, उसका सम्मान करना और उसपर भरोसा करना अनिवार्य है। यह परमेश्वर का विधान है, उसके द्वारा नियत व्यवस्था है। जो कोई भी इस पर बहस करता है, वह एक क्रूर पशु है जिसका विनाश करना आवश्यकता है (2 पतरस 2:10-12; यहूदा 1:8-10; रोमियों 13:1-7)।
आपको अपने पिता की बात क्यों माननी चाहिए? इस पर विचार करें। पिताओं को परमेश्वर चुनता है, उनको वह अनुभव है जो आपके पास नहीं है, वे भावनात्मक रूप से स्थिर हैं, वे संयमी होते हैं, आपको सुरक्षात्मक रूप से प्यार करते हैं, आपके भविष्य को महत्व देते हैं, उनके पास बहुत अधिक ज्ञान है, उन्हें परमेश्वर ने ज़िम्मेदारियाँ सौपी है, मूर्खता के नुकसान और पीड़ा के विषय में जानते हैं, और आपकी माँ के साथ रहते और सोते हैं!
यदि तू अपने पिता की शिक्षा को ठुकराता है, तो तू एक ठट्ठा करने वाला पुत्र है – जो कि बाइबल में सबसे बुरे नामों में से एक है (नीतिवचन 15:12; 24:9)। तू मूर्ख से भी बुरा है (नीतिवचन 12:1)। तू हारा हुआ एक अहंकारी है (नीतिवचन 26:12)। तू अपने आप को बुद्धिमान समझता है, परन्तु जान ले कि तू एक पाशविक मूर्ख है (नीतिवचन 26:16; 21:24)। इस दुनिया में उभरनेवाली ज्यादातर परेशानियां तेरे ही कारण हैं, और जब तू मर जाता है, तब जाकर यह दुनिया बेहतर होती है और चैन की सांस लेती है (नीतिवचन 22:10; 29:8)।
युवकों को जिन जिन बातों से भागना चाहिए, उनमें ठट्ठा करने वाले के लक्षण बहुत महत्वपूर्ण हैं। परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, और सब ठट्ठा करनेवालों को दण्ड दिया जाएगा (नीतिवचन 15:10; 29:1; 19:25; 21:11; यश 29:20-21)। इस कारण यह धर्मी मनुष्य के जीवन का नियम है कि वह ठट्ठा करनेवालों की मण्डली से भी दूर रहे (भजन 1:1)। ठट्ठा करने वाले सभी युवाओं को अपवित्र और खतरनाक अपराधियों के रूप में चिह्नित किया जाना चाहिए, उनसे बचकर रहना चाहिए और उनका तिरस्कार किया जाना चाहिए।
एली ने अपने अधर्मी पुत्रों, होप्नी और फिनीस को चेतावनी दी और उन्हें डाँटा, परन्तु उन्होंने अपने पिता की बात न मानी, क्योंकि यहोवा ने उन्हें नाश करने की पहले ही मनसा कर रखी थी (1 शमूएल 2:25)। यदि आप उन लोगों के उपदेश को ठुकराने का दुस्साहस करते हैं जिन्हें परमेश्वर ने एक पिता या पास्टर के रूप में आपके पास भेजा है, तो आप एली के अधर्मी पुत्रों के समान उसी दण्ड को पाने से कितने दूर हैं (2 इतिहास 36:16)? परमेश्वर द्वारा भेजे गए दूतों को अस्वीकार करना वास्तव में उसे अस्वीकार करना है (1 शमूएल 8:7; निर्गमन 16:8; लूका 10:16)। खबरदार!
बुद्धि का यह नियम अधिकार और शिक्षकों के अन्य सभी पदों पर भी लागू होता है। युवती, क्या तुम अपने पिता और माता की शिक्षा सुनती हो? विवाहित महिला, क्या आप अपने पति के अनुरोधों को सुनती हैं? कर्मचारी, क्या आप अपने नियोक्ता के निर्देश को सुनते हैं? आप प्रतिदिन एक विकल्प का सामना करते हैं – क्या आप निर्देश सुनेंगे और उसका सम्मान करेंगे, या तिरस्कारपूर्वक इसे अस्वीकार कर देंगे?
मनुष्य इस दुनिया में अज्ञानी और मूर्ख के रूप में आते हैं, और स्वर्ग का महान और दयालु परमेश्वर अपनी बुद्धि से उन्हें माता-पिता, पति, स्वामी, पास्टर और न्यायी प्रदान करता है ताकि वे जीवन में उन्हें सिखा सकें और उनका मार्गदर्शन कर सकें। इन शिक्षकों के बिना, इस दुनिया में अराजकता और खलबली मच जाएगी। आप उनकी शिक्षाओं को कैसे ग्रहण करते हैं? एक बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में, या मूर्ख के रूप में? या इससे भी बदतर, एक उपहास करने वाले के रूप में?
परमेश्वर के जन की शिक्षा, ताड़ना, चेतावनी और डाँट को ग्रहण करना तुम्हारे लिए कितना कठिन है? आप जानते हैं कि वह आपके जैसा ही पापी है, और आप उसके शरीर की कमजोरी को देख सकते हैं। फिर भी वह धन्य और एकमात्र अधिपति, अर्थात् परमेश्वर के राजदूत के रूप में खड़ा होता है और बोलता है, और उसका तिरस्कार करना या उसकी शिक्षा को न मानना दण्ड ले आएगा (1 थिस्स 5:12-13; इब्रा 13:7,17)।
इस मामले में आपके अनुसरण के लिए एक महान उदाहरण है। प्रभु यीशु मसीह को उसके पिता ने सिखाया था, और वह छोटी उम्र में भी हर आज्ञा को सुनने और पालन करने में आनन्दित होता था (यशायाह 50:4-5; लूका 2:49; यूहन्ना 8:29)। जब इसमें अपने स्वयं के जीवन का बलिदान शामिल था, तो उसने आज्ञाकारिता सीखी और दु:ख उठाने के द्वारा सिद्ध बन गया (इब्रानियों 5:7-9)। उसे ही अपना आदर्श बनाओ!
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